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  • अरावली पर मंडराया मरुस्थलीकरण का खतरा, अजमेर समेत कई इलाकों में तेजी से घट रहीं चट्टानें

    अरावली पर मंडराया मरुस्थलीकरण का खतरा, अजमेर समेत कई इलाकों में तेजी से घट रहीं चट्टानें

    अजमेर
     शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में अरावली की छोटी चट्टानें तेजी से खत्म हो रही हैं। आवासीय और व्यावसायिक निर्माण के चलते मैदानी इलाकों में 50 प्रतिशत तक चट्टानें नष्ट हो चुकी हैं।

    इससे जैव विविधता और मिट्टी की उर्वरा क्षमता प्रभावित हो रही है। करीब 2.5 से 3.2 अरब वर्ष पुरानी अरावली राजस्थान और हरियाणा से होते हुए दिल्ली तक लगभग 700 किलोमीटर में फैली है। अजमेर, ब्यावर, उदयपुर, देवगढ़ और पाली-सिरोही के मैदानी क्षेत्रों में मौजूद छोटी चट्टानें मिट्टी का कटाव रोकने और उसकी उर्वरा क्षमता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती रही हैं। पिछले 30-35 वर्षों में इन पर संकट बढ़ा है।

    खनन से भी अरावली को नुकसान
    अजमेर, ब्यावर, उदयपुर-राजसमंद, सावर, सिरोही, चित्तौड़गढ़, नागौर और पाली सहित कई क्षेत्रों में खनन से अरावली को नुकसान पहुंच रहा है। सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी की 2024-25 की रिपोर्ट के हवाले से दावा किया गया है कि अवैध खनन से करीब 35 प्रतिशत हिस्सा बर्बाद हो चुका है। कई जगह अरावली खोखली हो चुकी है।

    छोटी चट्टानें क्यों जरूरी
        मिट्टी का कटाव रोकने में सहायक।
        मिट्टी की नमी और उर्वरा क्षमता बनाए रखने में मददगार।
        मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बनाए रखने में सहायक।
        रेत, गाद और चिकनी मिट्टी का संतुलन बनाए रखने में भूमिका।
        उपजाऊ मिट्टी के जरिए फसल उत्पादन में मददगार।
        भूजल के पुनर्भरण में सहायक और प्राकृतिक फिल्टर के रूप में उपयोगी।

    बढ़ रहा रेतीले टीलों का दायरा
    25-30 साल पहले तक क्षेत्र में रेत के छोटे टीले थे। अब पुष्कर-नागौर सीमा और अजमेर शहर के आसपास माकड़वाली-होकरे, कायड़, जनाना रोड और सीकर रोड पर इनका विस्तार हो रहा है। जिले में रेतीले टीलों का दायरा 20 किलोमीटर तक फैलने का दावा है। चाचियावास, नसीराबाद और ब्यावर-उदयपुर मार्ग पर भी कई जगह टीले बढ़ रहे हैं।

    पर्यावरण पर असर
    चट्टानों को काटकर निर्माण करने से मिट्टी की उर्वरा क्षमता प्रभावित हुई है। चट्टानी क्षेत्रों के 40 प्रतिशत प्राकृतिक झरने बंद हो चुके हैं। गोंदा, खेजड़ी, देशी बबूल, बेर और थोर जैसे पौधों का अस्तित्व भी खतरे में है। कई जगह जमीन खोखली हो चुकी है।

    चट्टानें काटकर निर्माण

    अजमेर के वैशाली नगर, हरिभाऊ उपाध्याय नगर, शास्त्री नगर, एलआईसी कॉलोनी, आंतेड़, कृष्णगंज, पंचशील और लोहागल सहित कई इलाकों में पहले करीब 70 प्रतिशत क्षेत्र में चट्टानें थीं। निर्माण कार्यों के लिए ब्लास्टिंग कर इन्हें हटाया गया। अब यहां करीब 30 प्रतिशत चट्टानें ही बची हैं। इसी तरह हाथीखेड़ा, बोराज, ब्यावर और किशनगढ़ में भी चट्टानों को नुकसान पहुंच रहा है।

    विशेषज्ञ की राय: बढ़ सकता है मरुस्थलीकरण
    छोटी चट्टानें प्राकृतिक ठोस संरचनाएं हैं। इनमें मौजूद खनिज मिट्टी की उर्वरा क्षमता बढ़ाने और अपरदन रोकने में सहायक होते हैं। चट्टानों की कमी से प्राकृतिक असंतुलन बढ़ रहा है। इनका संरक्षण नहीं हुआ तो मिट्टी का कटाव और मरुस्थलीकरण बढ़ सकता है।
    -प्रो. सुब्रोतो दत्ता, रिमोट सेंसिंग एवं पर्यावरण विभाग, एमडीएस विश्वविद्यालय

  • राजस्थान में अरावली को भारी नुकसान, अवैध खनन और निर्माण से बिगड़ रहा पर्यावरणीय संतुलन

    राजस्थान में अरावली को भारी नुकसान, अवैध खनन और निर्माण से बिगड़ रहा पर्यावरणीय संतुलन

    अजमेर
     शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में अरावली पर्वतमाला की छोटी चट्टानें संकट में हैं। आवासीय और व्यावसायिक निर्माण के चलते मैदानी इलाकों में 50 प्रतिशत से अधिक चट्टानें खत्म हो चुकी हैं। इससे जैव विविधता पर असर पड़ रहा है। करीब 2.5 से 3.2 अरब वर्ष पुरानी अरावली पर्वतमाला राजस्थान और हरियाणा से होते हुए दिल्ली तक करीब 700 किलोमीटर में फैली हुई है। अजमेर, ब्यावर, उदयपुर, देवगढ़ और पाली-सिरोही के मैदानी क्षेत्रों में छोटी चट्टानें हैं। ये चट्टानें मिट्टी के कटाव को रोकने और उसकी उर्वरा क्षमता बनाए रखने में काफी सहायक रही हैं। बीते 30-35 वर्षों में हालात खराब हो गए हैं।

    चट्टानें काटकर निर्माण
    अजमेर में वैशाली नगर, हरिभाऊ उपाध्याय नगर, शास्त्री नगर, एलआईसी कॉलोनी, आंतेड़, कृष्णगंज, पंचशील और लोहागल सहित कई इलाकों में पहले 70 प्रतिशत तक चट्टानें थीं। आवासीय और व्यावसायिक निर्माण के चलते चट्टानों को ब्लास्टिंग से हटाया गया। अब इन इलाकों में केवल 30 प्रतिशत चट्टानें ही बची हैं। इसी तरह हाथीखेड़ा, बोराज, ब्यावर और किशनगढ़ सहित अन्य इलाकों में भी चट्टानों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है।

    पर्यावरण को पहुंचा नुकसान
    चट्टानों को काटकर आवासीय और व्यावसायिक निर्माण जारी है। इससे मिट्टी की उर्वरा क्षमता को नुकसान पहुंचा है। चट्टानी इलाकों के 40 प्रतिशत प्राकृतिक झरने बंद हो चुके हैं। गूंदा, खेजड़ी, देसी बबूल, बेर और थोर जैसे पौधे खत्म हो रहे हैं। कई जगह जमीन खोखली हो चुकी है।

    धीरे-धीरे बढ़ रहे टीले
    25-30 साल पहले तक यहां रेत के छोटे-छोटे टीले थे। अब पुष्कर-नागौर सीमा सहित अजमेर के शहरी क्षेत्रों के निकट माकड़वाली, होकरा और कायड़ में रेतीले टीलों का दायरा जिले में 20 किलोमीटर तक फैल चुका है। चाचियावास, नसीराबाद और ब्यावर-उदयपुर मार्ग पर भी कई जगह टीले बढ़ रहे हैं।

    अरावली को कर रहे छलनी
    अजमेर, ब्यावर, उदयपुर, राजसमंद, सावर, सिरोही, चित्तौड़गढ़, नागौर और पाली सहित अन्य इलाकों में अवैध खनन के कारण अरावली का 35 प्रतिशत हिस्सा बर्बाद हो चुका है। केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) की 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार, कई जगह अरावली खोखली हो चुकी है।

    यों जरूरी हैं छोटी चट्टानें
        मिट्टी का कटाव रोकने में मददगार।
        मैदानी इलाकों में तापमान संतुलित रखने में सहायक।
        मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों का संरक्षण।
        रेत, गाद और चिकनी मिट्टी का संतुलित मिश्रण बनाए रखने में सहायक।
        भूमि की उर्वरता और नमी बनाए रखने में मददगार।
        उपजाऊ मिट्टी फसल उत्पादन में सहायक।
        मिट्टी भूजल के लिए प्राकृतिक फिल्टर का कार्य करती है।

    इनका कहना है…
    छोटी चट्टानें प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली ठोस संरचनाएं हैं। इनमें कई खनिजों के अलावा मिट्टी की उर्वरा क्षमता बढ़ाने और अपरदन रोकने की जबरदस्त क्षमता होती है। चट्टानों की कमी ही प्राकृतिक असंतुलन बढ़ा रही है। इनका संरक्षण नहीं किया गया तो मिट्टी का अपरदन और मरुस्थल का फैलाव बढ़ेगा।
    प्रो. सुब्रोतो दत्ता, रिमोट सेंसिंग एवं पर्यावरण विभाग, एमडीएस विश्वविद्यालय