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  • E20 के नाम पर पेट्रोल में ज्यादा मिलावट का आरोप, लैब टेस्ट के बाद कर्नाटक सरकार का खुलासा

    E20 के नाम पर पेट्रोल में ज्यादा मिलावट का आरोप, लैब टेस्ट के बाद कर्नाटक सरकार का खुलासा

     बेंगलुरु
    E20 पेट्रोल को लेकर विवाद खत्म होता नहीं दिख रहा है. सरकार और तेल कंपनियों का दावा है कि पेट्रोल में सिर्फ 20 परसेंट इथेनॉल मिलाया जा रहा है. कर्नाटक सरकार ने तेल कंपनियों के पेट्रोल में तय सीमा से ज्यादा इथेनॉल मिलने का दावा किया है. हाल में कर्नाटक सरकार ने अलग-अलग पेट्रोल पंप से सैंपल लेकर पेट्रोल का टेस्ट कराया है। 

    इन टेस्ट में किसी भी पेट्रोल पंप से लिए गए सैंपल में 20 परसेंट इथेनॉल वाला पेट्रोल नहीं मिला. यानी सभी पेट्रोल पंप पर जो पेट्रोल बिक रहा, उनमें इथेनॉल की मात्रा ज्यादा है. राज्य सरकार के मुताबिक, इंडियन ऑयल (IOCL), हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL), भारत पेट्रोलियम (BPCL), नायरा और शेल जैसी कंपनियों के पेट्रोल पंपों से कुल 63 सैंपल लिए गए थे। 

    इनकी जांच में सात जिलों के सैंपल में इथेनॉल की मात्रा 20 परसेंट से ज्यादा मिली है. कुछ मामलों में ये मिलावट 31.2 परसेंट तक पहुंच गई है. कर्नाटक सरकार ने कहा है कि वो इन टेस्ट रिपोर्ट्स को केंद्र सरकार को भेजेगी. राज्य सरकार ने बताया कि तेल कंपनियों से पेट्रोल में इथेनॉल की सही मात्रा को लेकर साफ जवाब नहीं मिलने पर उन्होंने ये टेस्ट कराए हैं।  

    तेल कंपनियों ने नहीं दिया साफ जवाब
    कर्नाटक सरकार ने बताया कि राज्य के अलग-अलग हिस्सों से तमाम तेल कंपनियों के पेट्रोल पंप से कुल 63 सैंपल इकट्ठा किए गए. शुरुआत में इन सैंपल को संबंधित तेल कंपनियों की लैब में भेजा गया. सरकार ने इन कंपनियों से एक सवाल किया था कि इन सैंपल में इथेनॉल की मात्रा कितनी है। 

    कर्नाटक सरकार का कहना है कि इस संबंध में किसी भी तेल कंपनी ने इथेनॉल की मात्रा को लेकर साफ जवाब नहीं दिया. इसके बाद राज्य सरकार ने कुछ सैंपल को प्राइवेट लैब में भेजा. सात जिलों से लिए गए सैंपल की जांच में इथेनॉल की मात्रा 20 परसेंट से ज्यादा पाई गई है। 

    कौन बेच रहा कितनी मिलावट वाला पेट्रोल?
    राज्य सरकार की ओर से दी गई जानकारी के मुताबि
    क, आईओसीएल के पेट्रोल में 31.2 परसेंट से ज्यादा इथेनॉल पाया गया है. वहीं एचपीसीएल के पेट्रोल में 30.5 परसेंट, बीपीसीएल में 26.5 परसेंट, नायरा के पेट्रोल में 26.1 परसेंट और शेल के पेट्रोल में 25.5 परसेंट तक इथेनॉल पाया गया है। 

    पेट्रोल में इथेनॉल की ज्यादा ब्लेंडिंग से गाड़ियों को कई तरह से नुकसान हो सकते हैं. इससे ना सिर्फ माइलेज गिरेगा बल्कि मेंटेनेंस भी बढ़ेगा. कर्नाटक सरकार का दावा है कि अगर इथेनॉल ब्लेंडिंग के कारण गाड़ियों का माइलेज 10 परसेंट तक घटता है, तो हर साल लगभग 62,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है। 

    इसके अलावा, सरकार ने गाड़ियों की सर्विसिंग और मेंटेनेंस से जुड़े खर्च के कारण करीब 39,000 करोड़ रुपये के नुकसान का भी दावा किया है. कर्नाटक सरकार के मंत्री रिजवान अरशद ने केंद्र सरकार से इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की है. उनका कहना है कि केंद्र को एक स्पॉयलेज फंड बनाना चाहिए, जिससे तय सीमा से ज्यादा इथेनॉल मिले पेट्रोल का इस्तेमाल करने वाले वाहन मालिकों को मुआवजा या रिफंड दिया जा सके। 

     

  • पुरानी गाड़ियों को मिले E10 का विकल्प! मुख्य आर्थिक सलाहकार नागेश्वरन ने बताया क्यों जरूरी है लो-एथेनॉल पेट्रोल

    पुरानी गाड़ियों को मिले E10 का विकल्प! मुख्य आर्थिक सलाहकार नागेश्वरन ने बताया क्यों जरूरी है लो-एथेनॉल पेट्रोल

       नई दिल्ली
       
    E20 पेट्रोल को लेकर देश भर में घमासान मचा हुआ है. सड़क से लेकर संसद और सोशल मीडिया तक इस बात की चर्चा हो रही है कि, इस फ्यूल के चलते वाहनों का माइलेज कम हो रहा है, गाड़ियों के कंपोनेंट खराब हो रहे हैं. तमाम लोग लो इथेनॉल ब्लेंडेड फ्यूल जैसे E5 और E10 पेट्रोल के ऑप्शन की मांग कर रहे हैं. इस बीच पहली बार सरकार में बैठे किसी व्यक्ति ने E10 फ्यूल की वापसी की बात की है। 

    E20 को लेकर अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि आपकी गाड़ी का इंजन चलेगा या नहीं, सवाल यह है कि पेट्रोल बचाने की इस मुहिम में कहीं देश की खेती, पानी और खाने का हिसाब तो नहीं बिगड़ रहा. और इस सवाल को हल्के में इसलिए नहीं लिया जा सकता, क्योंकि इसे उठाने वाले कोई सोशल मीडिया का आलोचक नहीं, बल्कि भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन (V Anantha Nageswaran) हैं। 

    नागेश्वरन ने छपे अपने लेख में E20 से आगे E27 या E30 की तरफ बढ़ने से पहले साफ तौर पर 'फूड-वर्सेस-फ्यूल ट्रेड ऑफ', यानी खाने और फ्यूल के बीच होने जंग का पूरा हिसाब लगाने की जरूरत बताई है. यानी जिस E20 को अब तक पेट्रोल का विकल्प, तेल आयात घटाने का हथियार और पर्यावरण के फायदे की कहानी के तौर पर देखा जा रहा था, उससे आगे बढ़ाने से पहले विचार करना जरूरी है. असल सवाल यह है कि मक्का पेट्रोल की टंकी भरेगा या फिर लोगों का पेट. क्योंकि इंजन की बहस के बीच असली लड़ाई उस जमीन और पानी की है, जिसे एक बार फ्यूल की तरफ मोड़ दिया तो वापस खाने की तरफ लाना इतना आसान नहीं होगा। 

    अनंत नागेश्वरन की सलाह है कि, सरकार को पुराने वाहनों के लिए E10 फ्यूल को वापस लाना चाहिए. जिसमें 90 प्रतिशत शुद्ध पेट्रोल और 10 प्रतिशत इथेनॉल की ब्लेंडिंग हो. लेकिन इससे पहले वो E20 फ्यूल को लेकर फैले डर की भी बात करते हैं. उनका कहना है कि, इन दिनों E20 पेट्रोल को लेकर सोशल मीडिया पर खूब चर्चा हो रही है एक डर तेजी से फैल रहा है. दावा किया जा रहा है कि इससे माइलेज कम हो रहा है और गाड़ियों के कंपोनेंट खराब हो रहे हैं. हालांकि, ये सभी दावे पूरी तरह सही नहीं हैं. इसके पीछे वो कुछ टेस्ट का हवाला देते हैं। 

    क्या E20 से इंजन खराब हो रहा है?
    नागेश्वरन के अनुसार, इथेनॉल में पेट्रोल के मुकाबले एनर्जी कम होती है. एक लीटर इथेनॉल से मिलने वाली ऊर्जा पेट्रोल की करीब दो-तिहाई होती है. इसलिए E20 से गाड़ी एक लीटर फ्यूल में थोड़ी कम दूरी तय कर सकती है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इंजन में खराबी आ गई है. चूंकि E20 में इथेनॉल की मात्रा 20 फीसदी होती है, इसलिए कुल एनर्जी में कमी करीब 6 से 7 फीसदी के आसपास रहती है. सोशल मीडिया पर बताए जा रहे 30 फीसदी तक के आंकड़े सही नहीं हैं। 

    दिलचस्प बात यह है कि E20 के इस्तेमाल से कार्बन मोनोऑक्साइड और बिना जला हाइड्रोकार्बन जैसे पॉल्यूटेड पाटिकल्स कम हो सकते हैं. इंजन की लाइफ और सस्टेनेबिलिटी को लेकर भी अब तक टेस्ट में कुछ भी डराने वाली बात सामने नहीं है. अमेरिका में ओक रिज़ नेशनल लेबोरेटरी ने उन 86 वाहनों को E20 ब्लेंडेड फ्यूल के साथ तकरीबन 1 करोड़ किलोमीटर तक चलाकर टेस्ट किया जो E20 फ्यूल के कम्प्लायंट नहीं थें. हैरानी की बात है कि, इस टेस्ट में किसी भी वाहनों के कंपोनेंट में कोई एक्स्ट्रा वियर एंड टियर यानी घिसावट देखने को नहीं मिली. भारत में भी ARAI, पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट और Indian Oil के टेस्ट से मोटे तौर पर यही नतीजा सामने आए हैं. इसलिए हर E20 वाहन में इंजन खराब होने का दावा आंकड़ों से साबित नहीं होता। 

    पुराने दोपहिया वाहनों की चिंता असल वजह
    यहां एक बड़ा अपवाद जरूर है. भारत में करीब 7.5 से 8 करोड़ पुराने दोपहिया वाहन ऐसे हैं, जो BS4  स्टैंडर्ड से पहले के हैं और इनमें कार्ब्युरेटर का इस्तेमाल होता है. पुराने कार्ब्युरेटर इथेनॉल ब्लेंड में मौजूद एक्स्ट्रा ऑक्सीजन के हिसाब से फ्यूल की मात्रा को अपने आप एडजस्ट नहीं कर सकते. ऐसे में इंजन को जरूरत के मुकाबले कम फ्यूल मिल सकता है जिससे इंजन गर्म हो सकता है। 

    पुराने वाहनों में लगे रबर सील भी एक अलग समस्या हैं. अगर ये सील इथेनॉल के लिए तैयार नहीं हैं, तो लंबे समय तक इथेनॉल के संपर्क में आने पर खराब हो सकते हैं. हालांकि इन्हें इथेनॉल-फ्रेंडली सील से बदलना बहुत महंगा काम नहीं है. समस्या यह है कि भारत में 7.5 से 8 करोड़ पुराने दोपहिया वाहनों को एक-एक करके अपग्रेड करना आसान नहीं होगा. अगर आज से काम शुरू भी हो जाए, तो पूरे बेड़े को बदलने में कई साल लग सकते हैं। 

    पुराने वाहनों के लिए E10 क्यों जरूरी है
    नागेश्वरन के अनुसार, मूल नीति में इस समस्या का रास्ता भी रखा गया था और पुराने वाहनों के लिए कम इथेनॉल वाला पेट्रोल उपलब्ध रखने की बात कही गई थी. लेकिन धीरे-धीरे लो इथेनॉल ब्लेंडेड फ्यूल पेट्रोल पंपों से गायब हो गया. ऐसे में E20 के साथ E10 जैसे कम ब्लेंड वाला पेट्रोल भी उपलब्ध कराया जाना चाहिए. इससे पुराने वाहन मालिकों को राहत मिलेगी और लोगों के बीच E20 को लेकर बना डर भी कम होगा. खास बात यह है कि इससे कुल इथेनॉल की खपत बढ़ाने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी. पुराने वाहनों के लिए कम ब्लेंडेड फ्यूल वाला विकल्प रखा जा सकता है और दूसरी तरफ नए वाहनों में E20 का इस्तेमाल भी जारी रखा जा सकता है। 

  • E20 पेट्रोल पर बढ़ी चिंता, ‘एथेनॉल के लिए अनाज का इस्तेमाल भारी न पड़े’—सरकार को चेतावनी

    E20 पेट्रोल पर बढ़ी चिंता, ‘एथेनॉल के लिए अनाज का इस्तेमाल भारी न पड़े’—सरकार को चेतावनी

    नई दिल्ली

    केंद्र सरकार की एथेनॉल-ब्लेंडेड फ्यूल की नीति पर कई विशेषज्ञों ने गंभीर चिंता व्यक्त की है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस नीति से न केवल पर्यावरण और भूजल स्तर पर गहरा असर पड़ेगा, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा और कृषि व्यवस्था भी खतरे में पड़ सकती है। इसके साथ ही, विशेषज्ञों ने सरकार को सलाह दी है कि एथेनॉल वाले पेट्रोल की कीमतें कम की जानी चाहिए, क्योंकि इससे गाड़ियों का माइलेज घट रहा है और इंजनों के कलपुर्जों के जल्दी खराब होने से उपभोक्ताओं पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है।

    सोमवार को 'इंडियन वीमेंस प्रेस कॉर्प्स' द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में इन अहम मुद्दों पर चर्चा की गई। इस परिचर्चा में दिल्ली साइंस फोरम के वैज्ञानिक व सामाजिक कार्यकर्ता डी रघुनंदन, कृषि और खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय के पूर्व सचिव सिराज हुसैन, और नीति आयोग के पूर्व सदस्य रमेश चंद शामिल थे।

    'भोजन' की बजाय 'ईंधन' वाली खेती की ओर बढ़ रहा देश
    दिल्ली साइंस फोरम के डी रघुनंदन ने कहा कि एथेनॉल फ्यूल नीति ने भारतीय कृषि क्षेत्र की दिशा ही बदल दी है। अब हमारी खेती 'भोजन-उन्मुख' से 'ईंधन-उन्मुख' हो गई है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि एथेनॉल बनाने के लिए मक्के का भारी इस्तेमाल हो रहा है। इसका नतीजा यह है कि जो भारत पहले दुनिया को मक्के का निर्यात करता था, आज उसे अपनी घरेलू मांग पूरी करने के लिए मक्के का आयात करना पड़ रहा है। रघुनंदन ने इसे एक "विघटनकारी नीति" करार दिया, जो पानी के अत्यधिक दोहन और कृषि के पारंपरिक पैटर्न को बिगाड़ रही है।

    चावल-चीनी के सरप्लस से निपटने की कोशिश
    नीति आयोग के पूर्व सदस्य रमेश चंद ने बताया कि हाल के वर्षों में सरकार ने चावल और चीनी के सरप्लस (जरूरत से ज्यादा) उत्पादन से निपटने के लिए ही एथेनॉल फ्यूल को बढ़ावा दिया है। उन्होंने कहा कि सरकार ने चावल और चीनी की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर की है, जो अंतरराष्ट्रीय और खुले बाजार की कीमतों से ज्यादा है। ऐसे में यह बचा हुआ स्टॉक न तो देश के अंदर खप पा रहा है और न ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में खरीदा जा रहा है।

    चंद ने जोर देकर कहा कि देश में धान की खेती वाले एक बड़े हिस्से को मक्के की खेती से रिप्लेस करने की सख्त जरूरत है। धान की खेती में बहुत ज्यादा पानी लगता है और इससे मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैस भी भारी मात्रा में निकलती है।

    भारत की तुलना ब्राजील से करना गलत
    पूर्व सचिव सिराज हुसैन ने स्पष्ट किया कि भारत के एथेनॉल प्रोग्राम की तुलना ब्राजील से नहीं की जा सकती। ब्राजील सालाना 45 मिलियन टन चीनी का उत्पादन करता है और उसमें से 36 मिलियन टन एक्सपोर्ट कर देता है। वहां की आबादी काफी कम है और खेती के लिए जमीन का बहुत बड़ा हिस्सा मौजूद है।

    हुसैन ने चेतावनी देते हुए कहा, "कई स्टडीज बताती हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में भारत के कृषि उत्पादन में 25 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है, इसलिए ब्राजील से हमारी तुलना करना बिल्कुल गलत है।"

    E20 फ्यूल बंद करने की उठी मांग
    रघुनंदन ने सरकार को सुझाव दिया कि उसे 20% एथेनॉल वाले 'E20' फ्यूल का इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए और वापस 'E10' (10% एथेनॉल) पर लौट जाना चाहिए। उन्होंने साफ कहा कि वर्तमान में एथेनॉल के इस्तेमाल का खामियाजा सिर्फ पर्यावरण और आम उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ रहा है, जबकि किसानों को इसका कोई लाभ नहीं मिल रहा है। अगर E20 बंद होता है, तो नुकसान सिर्फ उन लगभग 400 डिस्टिलरीज को होगा जिन्होंने एथेनॉल बनाने का सेटअप लगाया है। सरकार चाहे तो उन्हें आसानी से इसका मुआवजा दे सकती है।