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  • पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, बेलदार को 3 महीने में देना होगा बकाया वेतन और अन्य लाभ

    पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, बेलदार को 3 महीने में देना होगा बकाया वेतन और अन्य लाभ

    चंडीगढ़
     हरियाणा वन विभाग के बेलदार छोटू राम स्वामी को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से राहत मिली है। विभाग ने उनकी सेवाएं समाप्त कर दी थीं, लेकिन श्रम न्यायालय ने बर्खास्तगी को अवैध ठहराकर बहाली का आदेश दिया था।

    नियमितीकरण का लाभ पाने के लिए स्वामी को अलग से अदालत जाना पड़ा। हाई कोर्ट ने कहा कि सरकार की नीति के तहत पात्र कर्मचारियों को नियमित किया गया है, तो समान स्थिति वाले कर्मचारी को इस लाभ से वंचित नहीं रखा जा सकता।

    जस्टिस हरकेश मनुजा ने हरियाणा सरकार की नियमित दूसरी अपील खारिज कर स्वामी के नियमितीकरण के पक्ष में दिए गए फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने बकाया वेतन और अन्य देय लाभ तीन महीने में देने का निर्देश दिया।

    छोटू राम स्वामी को 1984 में हरियाणा वन विभाग में दैनिक वेतन पर बेलदार नियुक्त किया गया था। विभाग ने 1 अगस्त 1999 को उनकी सेवाएं समाप्त कर दीं। उन्होंने श्रम न्यायालय, रोहतक में इसे चुनौती दी। 10 जून 2011 को श्रम न्यायालय ने बर्खास्तगी अवैध ठहराते हुए बहाली, निरंतर सेवा का लाभ और 19 फरवरी 2002 के मांग नोटिस की तारीख से 50 प्रतिशत पिछला वेतन देने का आदेश दिया। 24 अप्रैल 2012 को उन्हें सेवा में वापस लिया गया।

    स्वामी का कहना था कि वह हरियाणा सरकार की 1996 की नियमितीकरण नीति के तहत पात्र थे, लेकिन उनसे कनिष्ठ कुछ दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को नियमित करने के बावजूद उन्हें लाभ नहीं मिला। सरकार ने कहा कि बेलदार का कोई स्वीकृत स्थायी पद नहीं था और अन्य कर्मचारियों को अदालत के आदेशों के अनुपालन में नियमित किया गया था।

    हाई कोर्ट ने पाया कि नीति के तहत तीन वर्ष या अधिक की निरंतर सेवा और 31 जनवरी 1996 को सेवा में होना जरूरी था। स्वामी 1984 से कार्यरत थे और तय तारीख पर सेवा में थे। श्रम न्यायालय ने उन्हें निरंतर सेवा का लाभ दिया था। विभाग उनकी सेवा में तय सीमा से अधिक अंतराल का ठोस अभिलेख पेश नहीं कर सका। अदालत ने कहा कि अवैध बर्खास्तगी की अवधि को नियमितीकरण की पात्रता के खिलाफ नहीं गिना जा सकता।

    कोर्ट ने साफ कहा कि यदि बकाया वेतन, भत्ते और छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित अन्य लाभ जारी नहीं हुए हैं, तो प्रमाणित आदेश मिलने के तीन महीने में भुगतान करना होगा। देरी होने पर वास्तविक भुगतान तक नौ प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा।

  • झारखंड के जंगलों में अफीम की खेती रोकने की तैयारी, वन विभाग ने बढ़ाई तकनीकी निगरानी

    झारखंड के जंगलों में अफीम की खेती रोकने की तैयारी, वन विभाग ने बढ़ाई तकनीकी निगरानी

     रांची
    राज्य के जंगलों में अफीम की खेती रोकने के लिए वन विभाग ने शुरुआती चरण से ही निगरानी तेज कर दी है।

    अक्टूबर-नवंबर में अफीम के पौधे लगाने के लिए खेत तैयार किए जाते हैं। विभाग ने ज्योग्राफिक इंफार्मेशन सिस्टम (जीआईएस) से तस्वीरें लेकर वन भूमि पर अतिक्रमण का आकलन किया है। इसमें कमी देखी गई है।

    पिछले वर्ष वनक्षेत्र बताई गई कुछ जमीन का विश्लेषण करने पर वह रैयती भूमि पाई गई थी। फिलहाल ड्रोन फुटेज और मानवीय पहल से वन क्षेत्र की निगरानी हो रही है।

    इससे वन भूमि की अवैध कटाई कर खेत बनाने और अफीम उगाने पर रोक लगाने में मदद मिली है। वन एवं पर्यावरण विभाग स्थानीय पुलिस और प्रशासन के साथ मिलकर अफीम की खेती को शून्य स्तर पर लाने का प्रयास कर रहा है। वन भूमि से सटे रैयती क्षेत्र में भी खेती की आशंका होने पर संबंधित एजेंसियों को सूचना दी जा रही है।

    18 जिलों में निगरानी, खेती सिमटी
    विभाग अफीम की खेती वाले 18 जिलों में निगरानी कर रहा है। 2024-2025 में खेती घटकर 5 हजार एकड़ रह गई थी, जबकि पहले यह 25 हजार एकड़ से अधिक क्षेत्र में होती थी।

    इस वर्ष शुरुआत से निगरानी बढ़ाने के कारण खेती कुछ सौ एकड़ तक सीमित रहने की संभावना है। इसके बाद पुलिस, प्रशासन और केंद्र सरकार की एजेंसियां सैटेलाइट तस्वीरों की मदद से तैयार पौधों को भी नष्ट करेंगी।

    अफीम की खेती रोकने के लिए विभाग ने तकनीकी निगरानी बढ़ाई है। जीआइएस मैपिंग से वन भूमि पर अतिक्रमण की जानकारी मिलती है और कार्रवाई की जाती है। पिछले साल कुछ रैयती भूमि को भी वनभूमि बताया गया था। हमारा प्रयास है कि अफीम की खेती शून्य स्तर पर पहुंचे।
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    श्रीकांत वर्मा, वन प्रमंडल पदाधिकारी, रांची

     

  • कूनो में मृत चीतों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर पर्दा, RTI के तहत जानकारी देने से वन विभाग ने किया इनकार

    कूनो में मृत चीतों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर पर्दा, RTI के तहत जानकारी देने से वन विभाग ने किया इनकार

    श्योपुर

    चीता पुनर्वास परियोजना के तहत कूनो नेशनल पार्क में बसाए गए चीतों की मौत होने पर वास्तविक कारण पता नहीं चल पाता है। कई चीते संदिग्ध परिस्थतियों में भी मृत पाए गए, लेकिन मौत हादसे से हुई या बीमारी से, इसका पता नहीं चल पाया।

    पोस्टमार्टम रिपोर्ट की जानकारी सूचना का अधिकार अधिनियम (आरटीआई) में मांगे जाने पर जानकारी साझा करने से वन विभाग ने यह कह कर इन्कार कर दिया कि यह राष्ट्रीय विषय है।

    वन विभाग बोला-रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की जा सकती

    विभाग से वन्य जीव कार्यकर्ता अजय दुबे ने आरटीआई में जानकारी मांगी थी, जिन्हें जबाव मिला कि आरटीआई एक्ट की धारा 8(1)(ए) के तहत रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की जा सकती। यह धारा उन जानकारियों को छूट देती है, जिनके सार्वजनिक होने से भारत की संप्रभुता और अखंडता, सुरक्षा, रणनीतिक या आर्थिक हितों या किसी विदेशी देश के साथ संबंधों पर बुरा असर पड़ सकता है।

    अब तक शावकों सहित 28 चीतों की मौत हो चुकी है

    गौरतलब है कि 17 सितंबर 2022 से शुरू हुई चीता परियोजना में अब तक शावकों सहित 28 चीतों की मौत हो चुकी है। 2026 में ही अब तक सात चीतों की मौत हुई है। 12 अक्टूबर को मृत मिले आशा चीता के शावक की मौत को लेकर भी सिर्फ इतना ही सामने लाया गया है कि वह मां के साथ नहीं दिखी। ढूंढने पर उसका शव मिला।

    मौत बीमारी से हुई या किसी हादसे से, अब भी रहस्य

    यह रहस्य ही बना हुआ है कि शावक की मौत बीमारी से हुई या किसी हादसे से। शव किस हालत में मिला, इसकी जानकारी भी नहीं मिल सकी है।