Tag: Makhana

  • मखाना-लीची की वैश्विक पहचान, फिर भी बिहार के निर्यात में कृषि उत्पादों की हिस्सेदारी बेहद कम

    मखाना-लीची की वैश्विक पहचान, फिर भी बिहार के निर्यात में कृषि उत्पादों की हिस्सेदारी बेहद कम

     पटना
    निर्यात के मोर्चे पर बिहार की स्थिति कभी अच्छी रही नहीं। औद्योगिक आधार नहीं होना इसका प्रमुख कारण है। दूसरा कारण व्यवस्थागत सुस्ती है। अगर ऐसा नहीं होता तो कृषि और वानिकी के कई उत्पाद विदेशी बाजार में आज धूम मचा रहे होते।

    इस श्रेणी में अलबत्ता मखाने का नाम लिया जाएगा, जो कि राजनीति का सुपर फूड हो गया है। यही कारण है कि निर्यात का सारा ढिंढोरा मखाने तक सिमट जा रहा। वास्तविकता यह है कि बिहार के कृषि व सहवर्ती उत्पाद और निर्यात में मखाने की मात्रा एक प्रतिशत भी नहीं।

    2025-26 में बिहार से 18713.10 करोड़ रुपये के उत्पाद निर्यात किए गए। उसमें सर्वाधिक निर्यात पेट्रोलियम उत्पाद का हो रहा। फल और सब्जी की हिस्सेदारी 2.5 प्रतिशत से भी कम रही। मखाना और लीची इसी ढाई प्रतिशत के अंश हैं।

    मखाना और लीची की पहचान बिहार से जुड़ी
    मखाना और लीची की पहचान बिहार से जुड़ी हुई है। इनके अलावा भी कृषि-वानिकी के कई और उत्पाद हैं, जिनके उत्पाद में बिहार बादशाह है। मक्का, सिंघाड़ा, लौकी, मशरूम आदि इसी श्रेणी में हैं। प्रसंस्करण, वैल्यू एड, विपणन और निर्यात आदि की समुचित व्यवस्था नहीं होने से उत्पादकों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल रहा।

    ऐसा तब जबकि बिहार की निर्यात प्रोत्साहन नीति भी है। वाणिज्यिक प्रतिस्पर्द्धा की कमतर स्थिति के कारण यह नीति बहुत प्रभाव नहीं छोड़ पा रही। इसके अलावा व्यवस्था को लालफीताशाही की आदत-सी हो गई है।

    बिहार की हिस्सेदारी आधा प्रतिशत के आसपास
    बहरहाल देश के कुल निर्यात में बिहार की हिस्सेदारी आधा प्रतिशत के आसपास झूल रही। पिछले एक दशक से यही स्थिति बनी हुई है। इससे आगे निकलने के प्रयास में जब कभी विफल हुए, तो सीधा बहाना लैंड-लॉक्ड राज्य होने का रहा। तब हम हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की उपलब्धि को भूल गए, जो लैंड-लाक्ड होने के बावजूद निर्यात में बिहार से कोसों आगे हैं।

    हालांकि, अब सरकार के स्तर से इसके लिए पहल हो रही, लेकिन वर्षों की जड़ता को तोड़ने की चुनौती बनी हुई है। अभी सिडबी की ओर से जगत साह बिहार के उद्यमियों-व्यापारियों को निर्यात के तौर-तरीके सिखा रहे। उनका कहना है कि उद्योग-उत्पाद के लिए रॉ-मेटेरियल चाहिए होता है। हम भूल जाते हैं कि निर्यात भी वस्तुत: रा-मेटेरियल ही है। बिहार को यही हुनर सीखना होगा।

    दो की धूम
    मखाना: देश का 80 प्रतिशत मखाना बिहार मेंं होता है। प्रतिवर्ष लगभग 40,000 टन प्रोसेस्ड मखाना का उत्पादन है। मिथिला मखाना को जीआइ टैग प्राप्त है। देश से मखाना का कुल निर्यात लगभग 25,130 टन है। यह अमेरिका, यूएई, कनाडा, आस्ट्रेलिया, नेपाल और ब्रिटेन आदि देशों को निर्यात होता है।

    लीची: देश में लीची के कुल उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से तनिक अधिक है। इसी कारण बिहार को लीची का ''राजधानी'' कहा जाता है। प्रतिवर्ष 3,00,000 टन से कुछ अधिक लीची का उत्पादन होता है। शाही लीची को जीआई टैग मिला हुआ है। भारत से प्रतिवर्ष 5000 से 7000 टन लीची निर्यात की जाती है।

    जीआई टैग प्राप्त बिहार के उत्पाद
    मधुबनी पेंटिंग, मिथिला मखाना, शाही लीची, जर्दालु आम, कतरनी चावल, मगही पान, सिलाव का खाजा, मिर्चा धान, भागलपुर सिल्क , सुजनी कढ़ाई, खटवा (एप्लिक वर्क), सिक्की घास उत्पाद, मंजूषा कला, बावन बूटी साड़ी एवं फैब्रिक, पत्थरकट्टी स्टोन क्राफ्ट, पिड़िया चित्रकला

    निर्यात (करोड़ रुपये में)
    वित्तीय वर्ष     बिहार
    (करोड़ रुपये)     भारत
    (करोड़ रुपये)     देश के निर्यात में बिहार की हिस्सेदारी
    2021-22     17,219.63     31,47,021.49     0.55%
    2022-23     20,895.04     36,21,549.88     0.58%
    2023-24     16,760.79     36,18,952.27     0.46%
    2024-25     17,283.18     37,03,412.02     0.47%
    2025-26     18,713.10     39,03,730.60     0.48%

    बिहार से निर्यात में हिस्सेदारी
        पेट्रोलियम उत्पाद : 55.48%
        भैंसा का मांस : 10.18%
        चावल (बासमती से इतर) : 6.63%
        ग्रेफाइट, विस्फोटक आदि : 5.03%
        चावल से इतर अनाज : 4.01%
        रेलवे परिवहन उपकरण : 3.48%
        दवा फार्मूलेशन, बायोलॉजिकल्स : 2.01%
        ताजा सब्जियां : 1.37%
        टायर-ट्यूब : 1.13%
        ताजा फल : 0.96%

    कमी के कारण
        बंदरगाहों के काफी दूर होने से परिवहन लागत अधिक
        अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप आधारभूत संरचना नहीं
        स्थानीय स्तर पर इंपोर्ट-एक्सपोर्ट कोड की कमी
        उच्च मूल्य के औद्योगिक-तकनीकी उत्पाद वाले बड़े उद्योग कम
        मूल्य संवर्द्धन (वैल्यू एडिशन) का अभाव

    अपेक्षित पहल
        बिहार निर्यात प्रोत्साहन नीति का प्रभावी क्रियान्वयन
        एयर कार्गो और ड्राई पोर्ट का विकास
        मेगा फूड पार्क्स और फूड प्रोसेसिंग क्लस्टर बनें
        निर्यातकों के लिए प्रशिक्षण और जागरुकता
        सप्लाई चेन के जोखिमों को कम करना

    प्रोत्साहन की व्यवस्था
    बिहार निर्यात प्रोत्साहन नीति राज्य के उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप ढालकर वैश्विक बाजारों तक पहुंचाने और निर्यात को गति देने के लिए बनाई गई है। इसके अंतर्गत कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण हस्तशिल्प और जीआइ टैग वाले उत्पादों को विशेष प्राथमिकता देने की व्यवस्था है।

    एक्सपोर्ट हब: हर जिले को एक ‘एक्सपोर्ट हब’ के रूप में विकसित करना, जिससे स्थानीय उत्पादों को वैश्विक पहचान मिल सके।

    बुनियादी ढांचा: विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) और निर्यात पैक हाउस जैसी आधुनिक लाजिस्टिक्स व बुनियादी सुविधाओं का विकास।

    राहत अनुदान: बंदरगाह या एयर कार्गो टर्मिनल तक पहुंचने वाले पात्र उत्पादों के लिए फ्री आन बोर्ड मूल्य का एक प्रतिशत तक (सात वर्षों के लिए प्रति वित्तीय वर्ष 20 लाख रुपये तक) निर्यात सब्सिडी। पिछले वर्ष की तुलना में 50% से अधिक निर्यात वृद्धि प्राप्त करने वाली इकाइयों के लिए वृद्धिशील फ्री आन बोर्ड मूल्य पर अतिरिक्त एक प्रतिशत प्रतिपूर्ति (प्रति वर्ष 10 लाख रुपये तक)।

     

  • ऑस्ट्रेलिया में मचेगी मिथिला के मखाने की धूम! दरभंगा से भेजी गई 1800 KG की पहली बड़ी खेप, किसानों में खुशी

    ऑस्ट्रेलिया में मचेगी मिथिला के मखाने की धूम! दरभंगा से भेजी गई 1800 KG की पहली बड़ी खेप, किसानों में खुशी

    दरभंगा

    बिहार के प्रसिद्ध जीआई टैग प्राप्त मिथिला मखाना ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है. पहली बार बिहार से ऑस्ट्रेलिया के लिए समुद्री मार्ग के जरिए 18 मीट्रिक टन मखाना निर्यात किया गया है. खास बात यह है कि इस खेप के लिए मखाना सीधे दरभंगा के किसानों से खरीदा गया, जिससे उन्हें बाजार मूल्य की तुलना में लगभग 18 प्रतिशत अधिक लाभ मिला. कृषि निर्यात के क्षेत्र में इसे बिहार के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है. विभागीय अधिकारियों का मानना है कि इस पहल से न सिर्फ मिथिला मखाना की वैश्विक पहचान मजबूत होगी, बल्कि स्थानीय किसानों की आय बढ़ाने और कृषि उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने का नया रास्ता भी खुलेगा। 

    ऑस्ट्रेलिया रवाना हुई 18 मीट्रिक टन की खेप
    केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने बताया कि जीआई टैग प्राप्त मिथिला मखाना की 18 मीट्रिक टन खेप पहली बार समुद्री मार्ग से ऑस्ट्रेलिया भेजी गई है. उन्होंने इसे भारतीय कृषि निर्यात के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया. यह खेप कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) के सहयोग से तैयार की गई और निर्यात की प्रक्रिया पूरी की गई। 

    किसानों को मिला बेहतर मूल्य
    इस निर्यात की सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि मखाना सीधे दरभंगा के किसानों से खरीदा गया. इससे किसानों को बाजार में मिलने वाली सामान्य कीमत की तुलना में करीब 18 प्रतिशत अधिक आय प्राप्त हुई. कृषि क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि जब किसानों को सीधे वैश्विक बाजार से जोड़ने की व्यवस्था मजबूत होगी, तो बिचौलियों पर निर्भरता घटेगी और किसानों को बेहतर आर्थिक लाभ मिलेगा। 

    सात कंटेनरों में भेजा गया मखाना
    बिहार कृषि विभाग के अनुसार लगभग 18 मीट्रिक टन मखाना सात कंटेनरों में पैक कर ऑस्ट्रेलिया भेजा गया. इस खेप को पटना के बिहटा स्थित इंटीग्रेटेड यूनिट ऑफ इर्रेडिएशन कम पैकहाउस से बिहार के कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया. विभाग ने इसे बिहार की कृषि निर्यात क्षमता को नई पहचान दिलाने वाला कदम बताया है। 

    आधुनिक सुविधाओं ने बढ़ाई गुणवत्ता
    कृषि विभाग का कहना है कि बिहार में विकसित की जा रही आधुनिक सुविधाओं जैसे इर्रेडिएशन, गुणवत्ता परीक्षण, पैकेजिंग और लॉजिस्टिक्स ने कृषि उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इन्हीं सुविधाओं की मदद से मिथिला मखाना को वैश्विक बाजार की गुणवत्ता आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार किया गया। 

    अब अन्य कृषि उत्पादों के लिए भी खुलेगा रास्ता
    अधिकारियों का मानना है कि मखाना निर्यात की यह सफलता भविष्य में बिहार के अन्य कृषि उत्पादों के लिए भी नए अवसर पैदा करेगी. यदि इसी तरह गुणवत्ता, प्रोसेसिंग और निर्यात ढांचे को मजबूत किया गया तो राज्य के फल, सब्जियां, अनाज और अन्य पारंपरिक उत्पाद भी अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच सकते हैं।