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  • पितृ पक्ष में चीटियों को आटा-चीनी खिलाने से क्या होता है? जानें धार्मिक मान्यताओं से जुड़े रहस्य

    पितृ पक्ष में चीटियों को आटा-चीनी खिलाने से क्या होता है? जानें धार्मिक मान्यताओं से जुड़े रहस्य

    हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का समय पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनकी तृप्ति के लिए बेहद समर्पित माना जाता है. इस दौरान लोग पिंडदान, तर्पण और दान-पुण्य के जरिए अपने पितरों को याद करते हैं. पितृ पक्ष में दान और जीवों की सेवा का विशेष महत्व बताया गया है, जिनमें से चीटियों को आटा या चीनी डालना एक बेहद महत्वपूर्ण उपाय माना जाता है. क्या आपने कभी सोचा है कि विशेष रूप से इन दिनों में चीटियों को भोजन कराना क्यों जरूरी माना गया है? गरुड़ पुराण और धार्मिक मान्यताओं में इससे जुड़े कई गहरे रहस्य और कारण बताए गए हैं. आइए जानते हैं कि पितृ पक्ष के दौरान चीटियों की सेवा करने से पितृ क्यों प्रसन्न होते हैं.

    गरुड़ पुराण में जीव सेवा का महत्व
    हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथों, विशेषकर गरुड़ पुराण में यह स्पष्ट रूप से बताया गया है कि मनुष्य के द्वारा किए गए कर्मों का प्रभाव केवल इंसानों पर ही नहीं, बल्कि समस्त जीव-जंतुओं पर भी पड़ता है. ऐसा माना जाता है कि मृत्यु के बाद आत्माएं विभिन्न योनियों में भटकती हैं. चीटियां और अन्य सूक्ष्म जीव भी सृष्टि का एक अहम हिस्सा हैं. पितृ पक्ष में चीटियों को आटा डालने से चींटी जैसे छोटे जीवों की भूख शांत होती है, जिससे उनका आशीर्वाद अदृश्य रूप से हमारे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लेकर आता है.

    – चीटियों को खिलाने से दूर होते हैं दोष
    ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, चीटियों का संबंध राहु-केतु और शनि जैसे ग्रहों से भी जोड़ा जाता है. जब कोई व्यक्ति नियमित रूप से या विशेषकर पितृ पक्ष में चीटियों को शक्कर मिला हुआ आटा डालता है, तो उसके कई प्रकार के ग्रह दोष और बाधाएं शांत होने लगती हैं. इससे जीवन में आ रही अड़चनें दूर होती हैं.

    – ऋणों और पापों से मुक्ति का मार्ग
    धर्मग्रंथों में कहा गया है कि अनजाने में हमसे कई छोटे-छोटे जीव-हत्या के पाप हो जाते हैं, जिन्हें 'पंच महायज्ञ' या जीव सेवा के माध्यम से संतुलित किया जाता है. चीटियों को भोजन कराने से चींटी ऋण और अन्य सूक्ष्म जीवों के प्रति कर्ज से मुक्ति मिलती है. इसे चींटी सेवा या 'कीड़ी नगर' डालना भी कहा जाता है, जो पुण्य का बड़ा काम माना गया है.

    – पितरों की तृप्ति और उनका आशीर्वाद
    ऐसी धार्मिक मान्यता है कि पितृ पक्ष में हमारे पूर्वज किसी न किसी रूप में हमारे आसपास या जीवों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं. जब हम चीटियों या अन्य बेजुबान जानवरों को अन्न दान करते हैं, तो उससे मिलने वाला पुण्य सीधा हमारे पितरों तक पहुंचता है. इससे पितृ तृप्त होते हैं और अपने वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं.

    चीटियों को आटा डालते समय किन बातों का रखें ध्यान?
    साफ-सुथरी जगह चुनें: चीटियों को हमेशा खुले में, पेड़ के नीचे या उनके बिल के पास साफ स्थान पर ही आटा डालना चाहिए.

    शक्कर या बूरा मिलाएं: सादे आटे की जगह उसमें थोड़ा सा चीनी या बूरा मिलाकर डालने से चीटियां आसानी से उसे ग्रहण कर पाती हैं.

    नियमितता का रखें ख्याल: यदि आप पितृ पक्ष के दौरान यह नियम अपनाते हैं, तो इसे श्रद्धा और निरंतरता के साथ करें, जिससे आपको इसका पूर्ण आध्यात्मिक लाभ मिल सके.

  • पितृ पक्ष में मृत्यु होना शुभ या अशुभ? जानिए गरुड़ पुराण और धार्मिक मान्यताओं में क्या कहा गया है

    पितृ पक्ष में मृत्यु होना शुभ या अशुभ? जानिए गरुड़ पुराण और धार्मिक मान्यताओं में क्या कहा गया है

     पितृ पक्ष खत्म होने में अब बस कुछ ही दिन बाकी है. पितृ पक्ष हमारे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट करने का विशेष अवसर माना जाता है. इस दौरान लोग अपने पितरों को याद करते हैं, उनकी आत्मा की शांति के लिए तर्पण और श्राद्ध कर्म करते हैं और उनसे जाने-अनजाने हुई भूलों के लिए क्षमा मांगते हुए उनका आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करते हैं.

    मान्यता है कि पितृ पक्ष भाद्रपद मास की पूर्णिमा से शुरू होकर अश्विन मास की अमावस्या तक चलता है. इस दौरान लोग अपने पूर्वजों की तिथि के अनुसार श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे कर्म करते हैं.

    लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु पितृ पक्ष के दौरान ही हो जाए, तो इसका क्या अर्थ माना जाता है? क्या इस अवधि में मृत्यु होना शुभ होता है या अशुभ? आइए पंडित श्रीपति त्रिपाठी जी से जानते हैं धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसका क्या महत्व है.

    पितृ पक्ष में मृत्यु को लेकर क्या कहती हैं मान्यताएं?
    गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु को जीवन का अटल सत्य माना गया है. कहा जाता है कि जिसने जन्म लिया है, उसकी मृत्यु निश्चित है. इसलिए केवल किसी विशेष पक्ष या तिथि में मृत्यु होने को अपने आप में अशुभ नहीं माना जाना चाहिए. पितृ पक्ष को भी अशुभ समय मानने की धारणा सही नहीं है. यह समय मुख्य रूप से पूर्वजों के स्मरण, श्रद्धा और उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने से जुड़ा आध्यात्मिक पर्व माना जाता है.

    कुछ धार्मिक मान्यताओं में कहा गया है कि पितृ पक्ष के दौरान मृत्यु होने पर व्यक्ति को अपने पूर्वजों का सान्निध्य प्राप्त होता है और उसकी आत्मा की आगे की यात्रा सहज होने की कामना की जाती है. इसी वजह से कई लोग इस अवधि में मृत्यु को पूर्वजों से जुड़ने की एक विशेष आध्यात्मिक स्थिति के रूप में देखते हैं.

    क्या पितृ पक्ष में मृत्यु होने पर मोक्ष मिलता है?
    यह बात अक्सर कही जाती है कि पितृ पक्ष के दौरान प्राण त्यागने वाले व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त होता है या उसके लिए स्वर्ग के द्वार खुल जाते हैं. हालांकि, इसे एक निश्चित शास्त्रीय नियम के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है. अलग-अलग धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं में मृत्यु और मोक्ष को लेकर अलग विचार मिलते हैं.

    धार्मिक दृष्टि से यह जरूर माना जाता है कि इस दौरान किए जाने वाले श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे कर्म दिवंगत आत्मा की शांति के लिए किए जाते हैं. परिवारजन अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं और उनकी आत्मा की सद्गति की प्रार्थना करते हैं.

    पितृ पक्ष में मृत्यु होने पर क्या करना चाहिए?
    अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु पितृ पक्ष के दौरान हो जाती है, तो उसके अंतिम संस्कार और आगे के कर्म सामान्य धार्मिक विधि के अनुसार किए जाते हैं. मृत्यु की तिथि के आधार पर आगे के श्राद्ध कर्म भी निर्धारित किए जा सकते हैं.

    ऐसी स्थिति में परिवार को डरने या इसे अशुभ संकेत मानने की जरूरत नहीं है. मृत्यु के बाद किए जाने वाले संस्कारों का उद्देश्य दिवंगत व्यक्ति के प्रति सम्मान प्रकट करना और उसकी आत्मा की शांति की कामना करना होता है.

    इसलिए पितृ पक्ष को केवल मृत्यु से जोड़कर देखना सही नहीं है. यह समय जीवन और मृत्यु के सत्य को स्वीकार करने, अपने पूर्वजों को याद करने और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी माना जाता है.

  • पितृ पक्ष में सपने में दिखें पूर्वज तो समझें खास संकेत! हंसते, रोते या भोजन मांगते दिखें तो जानें मतलब

    पितृ पक्ष में सपने में दिखें पूर्वज तो समझें खास संकेत! हंसते, रोते या भोजन मांगते दिखें तो जानें मतलब

    हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का समय बेहद खास माना जाता है. इन 16 दिनों में लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण करते हैं. ऐसी गहरी मान्यता है कि इस विशेष अवधि में हमारे पितृ पृथ्वी लोक पर अपने परिजनों के पास आते हैं. ऐसे में अगर सोते समय सपने में अचानक आपके पूर्वज नजर आ जाएं, तो यह महज एक संयोग नहीं होता, बल्कि इसके कई गहरे और संकेतित अर्थ होते हैं. स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में पूर्वजों की स्थिति, उनका व्यवहार और हाव-भाव हमारे जीवन पर गहरा असर डालते हैं. आइए जानते हैं कि पितृ पक्ष के दौरान अलग-अलग तरह से पूर्वजों के दिखने का क्या अर्थ होता है.

    सपने में पूर्वजों का हंसना
    यदि पितृ पक्ष के दौरान आप सपने में अपने पूर्वजों को मुस्कुराते हुए देखते हैं, तो इसे एक बेहद शुभ संकेत माना जाता है. स्वप्न शास्त्र के मुताबिक, इस तरह का सपना यह दर्शाता है कि आपके पूर्वज आपसे पूरी तरह संतुष्ट हैं. इसका मतलब यह भी है कि आप जीवन में जिस भी मार्ग पर चल रहे हैं या जो कार्य कर रहे हैं, उस पर उनका पूरा आशीर्वाद बना हुआ है.

    पूर्वजों का रोना या दुखी अवस्था में दिखाई देना
    इसके विपरीत, यदि सपने में आपके पितर रोते हुए या काफी दुखी नजर आएं, तो इसे बिल्कुल भी अच्छा नहीं माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ऐसा सपना आने वाले समय में किसी मुसीबत, परेशानी या पितरों की असंतुष्टि की तरफ इशारा करता है. इसका अर्थ हो सकता है कि उनकी कोई अंतिम इच्छा अधूरी है या फिर विधि-विधान से उनका स्मरण न किए जाने के कारण वे नाराज हैं. ऐसे में उनकी शांति के लिए विशेष पूजा-पाठ और दान-पुण्य करना चाहिए.

    सपने में पूर्वजों द्वारा भोजन या पानी मांगना
    अगर आपको सपने में ऐसा दिखाई दे कि आपके पूर्वज आपसे खाने या पानी की मांग कर रहे हैं, तो इसे बहुत ही महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है. स्वप्न शास्त्र की मानें तो इस प्रकार के सपने का अर्थ यह होता है कि पितर आपसे श्राद्ध कर्म और तर्पण की अपेक्षा रख रहे हैं. ऐसी स्थिति में पितृ पक्ष के दिनों में सच्चे मन से उनके नाम पर तर्पण करना चाहिए, ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए तथा अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को दान देना चाहिए.

    पूर्वजों के साथ बातचीत करना
    कई बार लोग ऐसा सपना देखते हैं जिसमें वे अपने किसी मृत परिजन या पूर्वज के साथ आमने-सामने बैठकर बात कर रहे होते हैं. स्वप्न शास्त्र के अनुसार, इस तरह के सपने भविष्य में आने वाली किसी उलझन या चुनौती का संकेत हो सकते हैं. इस प्रकार का संकेत मिलने पर घबराने के बजाय पितरों का स्मरण कर उनके निमित्त दान और तर्पण करना शुभ रहता है, जिससे घर की बाधाएं दूर होती हैं.

  • पितृ पक्ष में खरीदारी से बचें! इन 5 चीजों को घर लाना माना जाता है अशुभ

    पितृ पक्ष में खरीदारी से बचें! इन 5 चीजों को घर लाना माना जाता है अशुभ

     हिंदू धर्म में आश्विन माह का कृष्ण पक्ष हमारे पूर्वजों को समर्पित पितृ पक्ष के रूप में मनाया जाता है. इस दौरान पितरों की आत्मा की तृप्ति के लिए तर्पण, पिंडदान, ब्राह्मण भोजन और दान-पुण्य करने की समृद्ध परंपरा है. ज्योतिष और शास्त्रों के अनुसार, यह 16 दिनों की अवधि पूर्णतः संयम, सादगी और आत्म-स्मरण का समय होती है. मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष के दौरान नई या भौतिक सुख-सुविधाओं की खरीदारी करना शुभ नहीं माना जाता है. ऐसा कहा जाता है कि इस समय अनजाने में खरीदी गई कुछ विशेष वस्तुएं घर में वास्तु दोष और आर्थिक तंगी का कारण बन सकती हैं. आइए जानते हैं कि पितृ पक्ष के दौरान किन 5 प्रमुख चीजों को घर लाने से बचना चाहिए.

    नए कपड़े और सोने-चांदी के गहने (New Clothes and Jewellery)
    पितृ पक्ष का समय किसी प्रकार का जश्न या उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि पितरों के प्रति शोक, कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करने का होता है. इस अवधि में स्वयं के उपयोग के लिए नए वस्त्र, सोने-चांदी के आभूषण या फैशनेबल वस्तुएं खरीदने से घर की सुख-समृद्धि प्रभावित हो सकती है. हालांकि, यदि आप पितरों के तर्पण, ब्राह्मणों या गरीबों को दान करने के उद्देश्य से वस्त्र खरीदते हैं, तो वह वर्जित नहीं है.

    नया वाहन और प्रॉपर्टी (Vehicle and Property)
    नई कार, बाइक, नया घर, दुकान या जमीन की खरीदारी को जीवन में किसी नए व शुभ कार्य की शुरुआत माना जाता है. श्राद्ध पक्ष में नए काम या अचल संपत्ति का सौदा करने से बचना चाहिए. मान्यता है कि इस समय संपत्ति में निवेश करने से उस स्थान या वाहन से पूर्ण शुभ फल प्राप्त नहीं होते हैं.

    नई झाड़ू (Broom)
    वास्तु और शास्त्रों में झाड़ू का सीधा संबंध धन की देवी मां लक्ष्मी से माना गया है. पितृ पक्ष के दौरान नई झाड़ू खरीदकर घर लाने की सख्त मनाही होती है. ऐसा माना जाता है कि श्राद्ध के दिनों में झाड़ू की खरीदारी करने से घर की बरकत रुक जाती है और अनचाहे खर्चे बढ़ने लगते हैं.

    लोहा और लोहे के सामान (Iron Items)
    ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, पितृ कार्य में लोहे के बर्तनों या धातु का प्रयोग और इसकी खरीदारी दोनों ही शुभ नहीं माने जाते है. श्राद्ध पक्ष में लोहा या लोहे से बनी नई वस्तुएं घर लाने से जीवन में मानसिक तनाव और परेशानियां बढ़ सकती हैं.

    इलेक्ट्रॉनिक्स और नया फर्नीचर (Electronics and Furniture)
    नया टीवी, फ्रिज, सोफा, बेड या घर की सजावट का सामान भौतिक विलासिता (Luxury) को दर्शाता है. चूंकि, यह समय सादगी का है, इसलिए इस दौरान घर के लिए विलासिता से जुड़े उपकरण खरीदना वर्जित माना गया है.

    कब मनाई सर्वपितृ अमावस्या?
    इस वर्ष पितृ पक्ष का समापन 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा. जिन पूर्वजों की मृत्यु की सटीक तिथि ज्ञात न हो, उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाना अत्यंत फलदायी माना जाता है.

     

  • पितृपक्ष में दोपहर को ही क्यों किया जाता है श्राद्ध? जानें शास्त्रों में बताई वजह

    पितृपक्ष में दोपहर को ही क्यों किया जाता है श्राद्ध? जानें शास्त्रों में बताई वजह

    पितृपक्ष चल रहा है. यह समय पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का समय माना जाता है. इन दिनों पितरों के निमित्त तर्पण और श्राद्ध करने की परंपरा है. मान्यता है कि जिस तिथि को व्यक्ति का निधन हुआ हो, उसी तिथि पर उसका श्राद्ध करना चाहिए. अगर मृत्यु तिथि की जानकारी न हो तो अमावस्या के दिन श्राद्ध किया जा सकता है. आमतौर पर आपने देखा होगा कि ज्यादातर लोग दोपहर के समय ही श्राद्ध करते हैं. क्या आप जानते हैं कि पितरों का श्राद्ध दोपहर के वक्त करना क्यों श्रेष्ठ होता है.

    क्यों दोपहर को किया जाता है श्राद्ध?
    शास्त्रीय मान्यता के अनुसार, अलग-अलग समय को अलग-अलग कार्यों से जोड़ा गया है. सुबह और शाम का समय देव कार्यों के लिए उत्तम माना गया है. जबकि घोर अंधकार को आसुरी और नकारात्मक शक्तियों की सक्रियता से जोड़ा जाता है. वहीं दोपहर का समय पितरों को समर्पित माना गया है. इसलिए पितृपक्ष में लोग इसी पहर में श्राद्धकर्म करना उत्तम मानते हैं.

    इसके अलावा, शास्त्रों में पितृ लोक को मृत्युलोक और देवलोक के बीच तथा चंद्रमा के ऊपर स्थित बताया गया है. दिन का मध्य समय पितरों को समर्पित होने के कारण ही उन्हें इस पहर में भोजन अर्पित किया जाता है.

    सूर्य की किरणों से भोजन ग्रहण
    श्राद्ध भोज दोपहर में कराने के पीछे एक अन्य लोक मान्यता भी प्रचलित है. कहते हैं कि सूर्य देव पूर्व दिशा से उदित होते हैं और दोपहर तक आकाश के मध्य में पहुंच जाते हैं. पृथ्वी लोक पर पितृ सूर्य की किरणों के माध्यम से श्राद्ध में अर्पित भोजन ग्रहण करते हैं. इसी वजह से दोपहर के समय को श्राद्ध के लिए उपयुक्त माना जाता है.

    पितृपक्ष में श्राद्ध करने की सही विधि क्या है?
    पितृपक्ष में तिथिनुसार श्राद्ध वाले दिन घर की दक्षिण दिशा में पितरों के निमित्त पूजा करें. तिल मिले जल से तर्पण दें. पिंडदान करें और कुश के आसन पर बैठकर पितरों की शांति के लिए प्रार्थना करें. इसके बाद श्रद्धापूर्वक ब्राह्मण को सात्विक भोजन कराएं. इस दौरान गाय, कौवा, कुत्ता और चींटी के लिए भी अलग से भोजन निकालकर रखें, जिसे पंचबलि कहा जाता है. भोजन में प्याज-लहसुन का प्रयोग न करें. भोजन के बाद वस्त्र और दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद लें. अंत में पितरों से हुई किसी भूल के लिए क्षमा मांगें और शाम को दक्षिण दिशा में सरसों के तेल का दीपक जलाएं.

  • पितृपक्ष में 28 सितंबर को द्वितीया श्राद्ध, जानें कुतुप काल और पूजा विधि

    पितृपक्ष में 28 सितंबर को द्वितीया श्राद्ध, जानें कुतुप काल और पूजा विधि

     पितृपक्ष में 28 सितंबर को द्वितीया तिथि का श्राद्ध किया जाएगा. इस दिन उन पितरों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु हिंदू पंचांग के अनुसार किसी भी महीने के कृष्ण पक्ष या शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को होती है. इस दिन पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं. मान्यता है कि चावल, दूध, शहद, घी और काले तिल से बना पिंड पाकर हमारे पितृ शांत होते हैं और अपनी कृपा बनाए रखते हैं.

    द्वितीया तिथि श्राद्ध
    आश्विन कृष्ण द्वितीया तिथि 27 सितंबर को रात 08 बजकर 58 मिनट से लेकर 28 सितंबर को शाम 07 बजकर 13 मिनट तक रहेगी. ऐसे में उदिया तिथि के अनुसार, द्वितीया तिथि का श्राद्ध 28 सितंबर दिन सोमवार को किया जाएगा.

    श्राद्ध और तर्पण का श्रेष्ठ मुहूर्त
    शास्त्रों में पितरों के तर्पण और श्राद्ध के लिए कुतुप वेला को सबसे उत्तम माना गया है. यह समय दोपहर के आस-पास पड़ता है. 28 सितंबर को कुतुप काल दोपहर 11:48 बजे से दोपहर 12:36 बजे तक रहेगा. लेकिन अलग-अलग शहरों में इसका समय एक-दूसरे से थोड़ा अलग हो सकता है. इसलिए पंचांग देखकर समय सुनिश्चित कर लें.

    द्वितीया तिथि के श्राद्ध की विधि?
    द्वितीया तिथि के श्राद्ध में आटे, चावल या जौ से बनाए गए गोल पिंड पितरों को अर्पित करने की परंपरा है. पिंडदान करने के बाद जल में काले तिल मिलाकर पितरों का तर्पण किया जाता है. पितरों का तर्पण करते वक्त हाथ में कुशा जरूर रखें. कुश एक प्रकार की घास होती है, जिसकी अंगूठी बनाकर दाएं हाथ की अनामिका उंगली में पहनी जाती है. श्राद्ध के बाद गरीब ब्राह्मणों को भोजन कराएं और दान-दक्षिणा दें. आखिर में पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करें.

    श्राद्ध के दौरान गाय, कुत्ते, कौवे और चींटियों के लिए भोजन का एक अंश निकालकर अलग रख दिया जाता है, जिसे पंचबलि कहा जाता है. कहते हैं कि इन जीवों के माध्यम से हमारे पितृ भोजन ग्रहण करते हैं और प्रसन्न होते हैं. इससे पितृ दोष समाप्त हो जाता है और उन्हें शांति मिलती है.

  • पितृ पक्ष में इन 4 कामों से करें परहेज, श्राद्ध-तर्पण के बाद जरूर रखें सावधानी

    पितृ पक्ष में इन 4 कामों से करें परहेज, श्राद्ध-तर्पण के बाद जरूर रखें सावधानी

     इस बार पितृ पक्ष की शुरुआत 27 सितंबर, रविवार से होने जा रही है और समापन 10 अक्टूबर, शनिवार के दिन होगा. हिंदू धर्म में पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है. भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) तक चलने वाले इन 16 दिनों में पूर्वजों (पितरों) की आत्मा की शांति, तृप्ति और आशीर्वाद प्राप्ति के लिए पिंड दान, तर्पण और श्राद्ध कर्म किए जाते हैं.

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष के दौरान हमारे पूर्वज अदृश्य रूप में धरती पर आते हैं और परिजनों द्वारा दिए गए जल व अन्न को स्वीकार करते हैं. हालांकि, कई बार लोग विधि-विधान से पूजा और श्राद्ध तो कर लेते हैं, लेकिन उसके बाद कुछ अनजानी गलतियां कर बैठते हैं. ज्योतिष और शास्त्र नियमों के अनुसार, तर्पण या श्राद्ध पूजा के तुरंत बाद की गई 4 गलतियां आपकी पूरी पूजा का फल निष्फल कर सकती हैं और पितृ दोष का कारण बन सकती हैं. आइए जानते हैं कि पितरों की पूजा के बाद किन 4 कामों से सख्त परहेज करना चाहिए.

    तर्पण के तुरंत बाद भोजन करना या भोजन में जल्दबाजी
    श्राद्ध या तर्पण की पूजा संपन्न होने के तुरंत बाद स्वयं भोजन करने बैठ जाना सही नहीं माना जाता है. जब तक ब्राह्मणों को भोजन न करा दिया जाए और पंचबलि (गाय, कुत्ता, कौआ, देव और चींटी) के लिए भोजन का अंश न निकाल दिया जाए, तब तक गृहस्थ को स्वयं भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए. पितरों और पंचबलि को भोजन अर्पण के बाद ही सात्विक भोजन ग्रहण करें.

    लहसुन-प्याज और तामसिक पदार्थों का सेवन
    तर्पण या श्राद्ध कर्म करने के बाद भी पूरे पितृ पक्ष के दौरान घर का माहौल और भोजन सात्विक होना चाहिए. श्राद्ध पूजा के बाद भूलकर भी शराब, मांस-मदिरा या लहसुन-प्याज से युक्त तामसिक भोजन का सेवन न करें. ऐसा करने से पितर रुष्ट हो सकते हैं और घर की सुख-शांति प्रभावित हो सकती है.

    घर में क्लेश, गुस्सा या किसी का अनादर करना
    पितृ पक्ष के दौरान हमारे पूर्वज सूक्ष्म रूप में घर के आसपास ही मौजूद रहते हैं. तर्पण के बाद घर में कटु शब्द बोलना या अशांति फैलाना नकारात्मक ऊर्जा लाता है. श्राद्ध पूजा के बाद विशेष रूप से क्रोध, अहंकार और घर के सदस्यों या बुजुर्गों से वाद-विवाद करने से बचें. इसके अलावा, द्वार पर आए किसी भी गरीब, असहाय व्यक्ति या पशु-पक्षी को डांटकर न भगाएं, उन्हें अन्न-जल जरूर दें.

    बाल-दाढ़ी कटवाना या नए वस्त्र-सामग्री की खरीदारी
    हिंदू परंपरा में पितृ पक्ष को संयम, साधना और पूर्वजों के प्रति आदर व्यक्त करने का समय माना गया है, न कि भौतिक उत्सव या साज-सज्जा का. तर्पण और श्राद्ध पूजा वाले दिन बाल, नाखून या दाढ़ी कटवाने से बचना चाहिए. साथ ही, पूजा के तुरंत बाद नए कपड़े, वाहन या प्रॉपर्टी जैसी भौतिक सुख-सुविधाओं की खरीदारी या किसी नए मांगलिक कार्य की शुरुआत करने से परहेज करें.

    श्राद्ध पूजा का पूर्ण फल पाने का सबसे आसान तरीका
    पितृ पक्ष में तर्पण और पिंडदान के बाद अपने हाथों से गाय को हरा चारा या गुड़-रोटी, कौवे और कुत्ते को भोजन का अंश जरूर दें. कौवे को पितरों का संदेशवाहक माना जाता है, इसलिए उनके माध्यम से पहुंचाया गया अन्न सीधे पूर्वजों तक पहुंचता है. इसके बाद निष्काम भाव से पितरों से परिवार की सुख, शांति और समृद्धि की प्रार्थना करें.

  • पितृ पक्ष 2026: महाभरणी, मातृ नवमी और सर्वपितृ अमावस्या का खास महत्व, जानें पूरी तारीखें

    पितृ पक्ष 2026: महाभरणी, मातृ नवमी और सर्वपितृ अमावस्या का खास महत्व, जानें पूरी तारीखें

     पितृ पक्ष को हिंदू धर्म में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का समय माना जाता है. इन दिनों लोग अपने दिवंगत परिजनों को याद करते हैं और उनकी आत्मिक शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और दान जैसे कर्म करते हैं. पितृ पक्ष की हर तिथि का अपना महत्व है, क्योंकि सामान्य तौर पर जिस तिथि को किसी पूर्वज का निधन हुआ हो, उसी तिथि पर उनका श्राद्ध किया जाता है. हालांकि इस पूरे पक्ष में तीन तिथियां ऐसी मानी जाती हैं, जिनका महत्व खास तौर पर बताया गया है.

    महाभरणी श्राद्ध
    पितृ पक्ष की खास तिथियों में भरणी श्राद्ध का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. इसे कई जगह महाभरणी श्राद्ध भी कहा जाता है. भरणी नक्षत्र से जुड़ा होने के कारण इस श्राद्ध का अपना विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है.

    परंपराओं के अनुसार, किसी परिजन की मृत्यु के बाद एक वर्ष पूरा होने पर भरणी श्राद्ध करने की परंपरा कई परिवारों में है. वहीं अविवाहित व्यक्ति की मृत्यु होने पर भी भरणी श्राद्ध को विशेष माना जाता है. हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में इसके नियमों में अंतरदेखने को मिल सकता है.

    2026 में महाभरणी श्राद्ध 29 सितंबर को पड़ेगा. इस दिन तर्पण और श्राद्ध कर्म करने की परंपरा है.

    मातृ नवमी
    पितृ पक्ष की नवमी तिथि को मातृ नवमी कहा जाता है. यह दिन विशेष रूप से परिवार की दिवंगत महिलाओं और मातृ पक्ष के पूर्वजों को समर्पित माना जाता है.

    इस दिन मां, दादी, नानी या परिवार की अन्य दिवंगत महिला सदस्यों के लिए श्राद्ध और तर्पण करने की परंपरा है. यही वजह है कि इसे मातृ श्राद्ध भी कहा जाता है. अगर किसी महिला पूर्वज की मृत्यु तिथि को लेकर परिवार में स्पष्ट जानकारी नहीं है, तो कई परंपराओं में नवमी तिथि को उनके लिए श्राद्ध करने की मान्यता मिलती है.

    2026 में मातृ नवमी 4 अक्टूबर को होगी. इस दिन पूर्वज महिलाओं को याद करके उनकी स्मृति में दान-पुण्य और श्राद्ध कर्म किया जा सकता है.

    सर्वपितृ अमावस्या
    पितृ पक्ष की सभी तिथियों में सर्वपितृ अमावस्या को सबसे महत्वपूर्ण दिनों में गिना जाता है. यह पितृ पक्ष का अंतिम दिन होता है और इसे महालय अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है.

    इस दिन उन सभी पितरों के लिए श्राद्ध किया जा सकता है जिनकी मृत्यु तिथि परिवार को मालूम नहीं है. इसके अलावा यदि किसी कारण से किसी पूर्वज का निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं हो पाया हो, तो भी परंपरा के अनुसार सर्वपितृ अमावस्या को उनके लिए कर्म किया जाता है.

    2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को पड़ेगी. इसे पितृ पक्ष का समापन दिवस माना जाता है.

    क्या सिर्फ इन्हीं 3 दिनों में श्राद्ध करना चाहिए?
    ऐसा नहीं है. पितृ पक्ष की हर तिथि महत्वपूर्ण होती है. सामान्य नियम के अनुसार जिस तिथि को किसी व्यक्ति का निधन हुआ हो, पितृ पक्ष में उसी तिथि पर उसका श्राद्ध किया जाता है. उदाहरण के लिए अगर किसी पूर्वज की मृत्यु कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुई थी, तो पितृ पक्ष की अष्टमी पर उनका श्राद्ध किया जाता है. तीन तिथियों को विशेष बताने का कारण यह है कि इनके साथ कुछ खास परंपराएं और मान्यताएं जुड़ी हुई हैं. इसलिए इनके बारे में जानकारी रखना उपयोगी माना जाता है.

    अगर मृत्यु की तिथि याद न हो तो क्या करें?
    कई परिवारों में पुरानी पीढ़ियों की मृत्यु की सही तिथि की जानकारी नहीं होती. ऐसी स्थिति में चिंता करने की जरूरत नहीं मानी जाती. धार्मिक परंपरा में सर्वपितृ अमावस्या को ज्ञात और अज्ञात पितरों के लिए श्राद्ध करने का विशेष अवसर माना गया है. इस दिन परिवार अपने उन सभी पूर्वजों को याद कर सकता है जिनकी मृत्यु तिथि उपलब्ध नहीं है. तर्पण, पिंडदान, भोजन और दान जैसे कर्म अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार किए जाते हैं.

    2026 पितृपक्ष का पूरा कैलेंडर अब देख लें एक नजर में
    पूर्णिमा श्राद्धा- 26 सितंबर 2026, शनिवार
    प्रतिपदा तिथि श्राद्ध- 27 सितंबर 2026, रविवार
    द्वितीया श्राद्ध- 28 सितंबर 2026, सोमवार
    तृतीया श्राद्ध- 29 सितंबर 2026, मंगलवार
    चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध- 30 सितंबर 2026, बुधवार
    षष्ठी तिथि का श्राद्ध- 1 अक्टूबर 2026, गुरुवार
    सप्तमी तिथि का श्राद्ध- 2 अक्टूबर 2026, शुक्रवार
    अष्टमी तिथि का श्राद्ध- 3 अक्टूबर 2026, शनिवार
    नवमी तिथि का श्राद्ध- 4 अक्टूबर 2026, रविवार
    दशमी तिथि का श्राद्ध- 5 अक्टूबर 2026, सोमवार
    एकादशी तिथि का श्राद्ध- 6 अक्टूबर 2026, मंगलवार
    द्वादशी तिथि का श्राद्ध- 7 अक्टूबर 2026, बुधवार
    मघा तिथि का श्राद्ध- 7 अक्टूबर 2026, बुधवार
    त्रयोदशी तिथि का श्राद्ध- 8 अक्टूबर 2026, गुरुवार
    चतुर्दशी तिथि का श्राद्ध- 9 अक्टूबर 2026, शुक्रवार
    सर्वपितृ अमावस्या-10 अक्टूबर 2026, शनिवार

  • पितृ पक्ष में बनेगा लक्ष्मी नारायण राजयोग, इन 4 राशियों पर होगी धन की बारिश

    पितृ पक्ष में बनेगा लक्ष्मी नारायण राजयोग, इन 4 राशियों पर होगी धन की बारिश

    पितृ पक्ष की शुरुआत 27 सितंबर से होने जा रही है, जो कि 10 अक्टूबर को समाप्त होंगे. ज्योतिष शास्त्र की मानें तो, इस बार पितृ पक्ष बहुत ही शुभ माना जा रहा है. पितृ पक्ष की शुरुआत से ठीक पहले शुक्र ग्रह अपनी स्वराशि तुला राशि में प्रवेश करने जा रहे हैं, जहां बुद्धि के कारक बुध ग्रह पहले से ही विराजमान रहेंगे. तुला राशि में शुक्र और बुध का यह महासंगम लक्ष्मी नारायण राजयोग बनाएगा.

    वैदिक ज्योतिष में शुक्र को सुख-सुविधा, वैभव, सौंदर्य व आकर्षण का कारक माना जाता है, जबकि बुध को बुद्धि, व्यापार, तर्क और संवाद का कारक माना गया है. जब भी इन दोनों शुभ ग्रहों की किसी राशि में युति (संयोग) होती है, तो अत्यंत शुभ और फलदायी 'लक्ष्मी नारायण राजयोग' का निर्माण होता है. यह राजयोग पितृ पक्ष के दौरान कई राशियों के जीवन से आर्थिक तंगी दूर कर सुख-समृद्धि लाएगा. मुख्य रूप से 4 ऐसी राशियां हैं, जिनके लिए यह शुभ योग अपार धन-लाभ और सफलता के नए अवसर लेकर आ रहा है.

    मिथुन राशि (Mithun Rashi)
    शुभ प्रभाव: आपकी राशि से पांचवें (ज्ञान, संतान व आकस्मिक धन-लाभ) भाव में यह महासंयोग बनने जा रहा है.

    मिलेगा यह फायदा: शेयर बाजार, ट्रेडिंग या किसी पुराने निवेश से उम्मीद से ज्यादा मुनाफा मिल सकता है. नौकरीपेशा जातकों को पदोन्नति (प्रमोशन) और मनचाहे इंक्रीमेंट का शुभ समाचार मिल सकता है. कला, मीडिया, लेखन और डिजाइनिंग के क्षेत्र से जुड़े लोगों को अपनी प्रतिभा दिखाने के बड़े अवसर मिलेंगे.

    तुला राशि (Tula Rashi)
    शुभ प्रभाव: यह राजयोग आपकी ही राशि (प्रथम भाव) में बनने जा रहा है, जिससे शुक्र और बुध दोनों आपको पूरा बल प्रदान करेंगे.

    मिलेगा यह फायदा: आपके आकर्षण, व्यक्तित्व और निर्णय लेने की क्षमता में जबर्दस्त सुधार आएगा. समाज और कार्यक्षेत्र में आपका मान-सम्मान बढ़ेगा. यदि आप लंबे समय से आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे, तो अचानक धन लाभ के मजबूत योग बनेंगे. नया व्यापार शुरू करने या बिजनेस डील फाइनल करने के लिए यह समय बेहद शुभ रहेगा.

    मकर राशि (Makar Rashi)
    शुभ प्रभाव: आपके दसवें (कर्म, करियर व बिजनेस) भाव में शुक्र और बुध की युति होगी.

    मिलेगा यह फायदा: कार्यक्षेत्र में आपकी मेहनत की तारीफ होगी और बड़े अधिकारियों का पूरा समर्थन मिलेगा. यदि आप नई नौकरी की तलाश में हैं, तो कोई बड़ा पैकेज ऑफर हो सकता है. पैतृक संपत्ति या कारोबार से जुड़े किसी पुराने विवाद का हल निकलेगा, जिससे आपकी वित्तीय स्थिति काफी मजबूत होगी.

    कुंभ राशि (Kumbh Rashi)
    शुभ प्रभाव: आपकी राशि से नौवें (भाग्य व धार्मिक यात्रा) भाव में लक्ष्मी नारायण राजयोग का निर्माण हो रहा है.

    मिलेगा यह फायदा: आपके सोए हुए भाग्य का सितारा चमक उठेगा. रुके हुए काम बिना किसी अड़चन के पूरे होने लगेंगे. धार्मिक यात्राओं के योग बनेंगे. पितरों का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होगा. विदेश से जुड़े व्यापार या विदेशी कंपनियों में काम करने वाले जातकों को भारी आर्थिक लाभ मिलेगा.

    लक्ष्मी नारायण राजयोग की शुभता बढ़ाने के उपाय
    – शुक्रवार के दिन घर के मंदिर में भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की संयुक्त पूजा करें तथा कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें.

    – किसी मंदिर में या जरूरतमंद को चावल, मिश्री, दूध या सफेद वस्त्र दान करें.

    – रोजाना ताजी रोटी पर थोड़ा सा गुड़ या घी लगाकर गाय को खिलाएं.