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  • लाल जी की बस्ती (महू) में विमुक्त एवं घुमंतू समुदाय के सर्वेक्षण की समीक्षा

    लाल जी की बस्ती (महू) में विमुक्त एवं घुमंतू समुदाय के सर्वेक्षण की समीक्षा

    भोपाल 

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के संवेदनशील नेतृत्व तथा विमुक्त, घुमंतू एवं अर्द्ध घुमंतू कल्याण विभाग की राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) मती कृष्णा गौर के विशेष प्रयासों व दूरगामी सोच के परिणामस्वरूप मध्यप्रदेश पूरे देश में ऐसा पहला राज्य है, जो घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू वर्गों का वैज्ञानिक व सर्वांगीण सर्वेक्षण करवा रहा है। इस ऐतिहासिक पहल का मूल ध्येय समाज के अंतिम छोर पर खड़े विमुक्त परिवारों की सटीक पहचान कर उन्हें शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं की मुख्यधारा में पूर्ण सम्मान के साथ सम्मिलित करना है।

    सर्वेक्षण कार्य की धरातलीय समीक्षा एवं समयावधि संबंधी निर्देश

    संचालक विमुक्त, घुमंतू एवं अर्द्ध घुमंतू कल्याण विभाग  बुद्धेश वैद्य ने महू की लाल जी की बस्ती में आयोजित संवाद कार्यक्रम जन अभियान परिषद के समर्पित सर्वेक्षणकर्ताओं तथा स्थानीय महिलाओं से सर्वे की प्रक्रिया, आंकड़ों के संकलन तथा जमीनी अनुभवों की बिंदुवार जानकारी प्राप्त की। उन्होंने सर्वेक्षण कार्य की गुणवत्ता पर संतोष व्यक्त करते हुए सर्वेक्षण दल को निर्देशित किया कि सर्वेक्षण कार्य को पूरी पारदर्शिता, संवेदनशीलता एवं प्रमाणिकता के साथ शीघ्र पूर्ण किया जाए, ताकि योजना के अगले चरणों को शीघ्र गति दी जा सके।

    महिलाओं के स्वावलंबन, स्व-सहायता समूह एवं स्वरोजगार पर विशेष बल

    सामुदायिक उत्थान में नारियों की सशक्त भूमिका को रेखांकित करते हुए संचालक  वैद्य ने निर्देशित किया कि बस्ती की महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिये प्राथमिकता के आधार पर उनके स्व-सहायता समूह (Self-Help Groups) गठित किए जाएं। इसके साथ ही महिलाओं को कौशल विकास एवं स्थानीय स्तर पर आजीविका व रोजगार के साधनों से जोड़ने तथा विभागीय योजनाओं का शत-प्रतिशत लाभ उन तक पहुँचाने के लिये समयबद्ध रूप से कार्ययोजना निष्पादित करने के निर्देश दिए। समाज प्रमुखों एवं स्थानीय महिलाओं ने राज्य सरकार की इस समावेशी और कल्याणकारी पहल के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया तथा सर्वेक्षण कार्य में पूर्ण सहयोग प्रदान करने की प्रतिबद्धता जताई।

     

  • साढ़े दस लाख स्वयं सहायता समूहों से जुड़े सवा करोड़ ग्रामीण परिवारों की बदली तकदीर

    साढ़े दस लाख स्वयं सहायता समूहों से जुड़े सवा करोड़ ग्रामीण परिवारों की बदली तकदीर

    लखनऊ

    उत्तर प्रदेश के गांवों में स्वयं सहायता समूह अब ग्रामीण अर्थव्यवस्था और महिला आत्मनिर्भरता के बड़े केंद्र बन रहे हैं। योगी सरकार के ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत प्रदेश में सक्रिय 10.58 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर लगभग सवा करोड़ ग्रामीण परिवारों को आजीविका के नए अवसर मिले हैं। इन समूहों ने महिलाओं को रोजगार और उद्यम से जोड़ने के साथ परिवारों की आय बढ़ाने और गांवों में आर्थिक गतिविधियों को गति देने का काम किया है। वहीं इन समूहों से जुड़ी 82 लाख से ज्यादा महिला किसान ग्रामीण बदलाव की नई अग्रदूत बनकर उभर रही हैं।

    समूहों से निकली आत्मनिर्भरता की नई कहानी

    ग्रामीण आजीविका मिशन का फोकस महिलाओं को केवल वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। उन्हें प्रशिक्षण, ऋण, उद्यम और बाजार से जोड़कर स्थायी आय के अवसर तैयार किए जा रहे हैं। इसका असर अब गांवों में साफ दिखाई देने लगा है। महिलाएं खाद्य प्रसंस्करण, सिलाई-कढ़ाई, डेयरी, हस्तशिल्प और स्वच्छता उत्पादों के निर्माण सहित कई क्षेत्रों में छोटे उद्यम संचालित कर रही हैं। इन गतिविधियों से महिलाओं के हाथ में कमाई आई है तो परिवारों की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हुई है। घर की जरूरतों में योगदान देने के साथ महिलाएं अपने फैसले खुद लेने और दूसरे परिवारों के लिए रोजगार के अवसर पैदा करने की दिशा में भी आगे बढ़ रही हैं।

    बचत-ऋण के जरिये कारोबार तक पहुंचीं ग्रामीण महिलाएं

    मिशन निदेशक अरुण कुमार ने बताया कि ग्रामीण आजीविका मिशन की बड़ी उपलब्धि यह है कि महिलाओं को बचत और ऋण की पारंपरिक व्यवस्था से आगे बढ़ाकर उद्यमिता के अवसर दिए गए। प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता के साथ बाजार से जुड़ाव ने हजारों गांवों में छोटे-छोटे उद्योगों की नींव रखी है। इससे महिलाओं में आत्मविश्वास बढ़ा है और वे अपनी पहचान कारोबारी के रूप में बना रही हैं। महिला समूहों के जरिए ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी तैयार हो रहे हैं। एक महिला के उद्यमी बनने का असर उसके परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समूह की दूसरी महिलाएं भी उससे प्रेरणा लेकर आर्थिक गतिविधियों से जुड़ती हैं।

    82 लाख महिला किसान बनीं बदलाव की वाहक
    ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका को मजबूत करने के लिए कृषि क्षेत्र में भी उन्हें आगे बढ़ाया जा रहा है। 82 लाख महिला किसानों का जुड़ाव इस बदलाव की बड़ी तस्वीर पेश करता है। खेती से जुड़े काम में महिलाओं की भागीदारी को आय बढ़ाने वाले अवसरों से जोड़ने से ग्रामीण परिवारों की आजीविका के स्रोतों में विविधता आई है। महिला समूह अब गांवों में आर्थिक गतिविधियों के साथ सामाजिक बदलाव की भी मजबूत धुरी बन चुके हैं। समूहों में साथ काम करने से महिलाओं के बीच सहयोग और अनुभव साझा करने की संस्कृति मजबूत हुई है। सफल महिलाएं दूसरी महिलाओं को भी रोजगार और उद्यम की राह दिखा रही हैं।

    वित्तीय समावेशन से मजबूत हुई आर्थिक नींव

    ग्रामीण महिलाओं को बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं से जोड़ना भी मिशन की अहम उपलब्धियों में शामिल है। वित्तीय समावेशन के जरिए महिलाओं को बचत, ऋण और अन्य आर्थिक अवसरों तक पहुंच मिली है। इससे गांवों में छोटी पूंजी के आधार पर कारोबार शुरू करने की संभावनाएं बढ़ी हैं। सरकार का जोर अब इन समूहों को केवल समूह के रूप में सक्रिय रखने के बजाय उन्हें उद्यम, रोजगार और बाजार के अवसरों से जोड़कर आय के स्थायी स्रोत तैयार करने पर है। यही वजह है कि स्वयं सहायता समूह ग्रामीण विकास के साथ महिला सशक्तीकरण का भी प्रभावी माध्यम बनते जा रहे हैं।

    गांव की अर्थव्यवस्था को मिल रही नई ऊर्जा
    मिशन निदेशक अरुण कुमार ने बताया कि प्रदेश में साढ़े दस लाख से अधिक स्वयं सहायता समूहों का नेटवर्क अब ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई ऊर्जा भर रहा है। एक ओर इससे आजीविका के अवसर मिल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर महिलाओं को आर्थिक आत्मनिर्भरता और सामाजिक सम्मान की नई पहचान मिल रही है। ग्रामीण आजीविका का यह मॉडल आने वाले समय में गांवों में रोजगार और उद्यम के और अधिक अवसर पैदा करने की क्षमता रखता है।