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  • सांसदों के जाने के बाद उद्धव की बढ़ीं मुश्किलें, अब दफ्तर को लेकर नया विवाद

    सांसदों के जाने के बाद उद्धव की बढ़ीं मुश्किलें, अब दफ्तर को लेकर नया विवाद

    मुंबई 
    लोकसभा सांसदों की बगावत के झटके से उबर रही शिवसेना (यूबीटी) की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रहीं. पार्टी को अब संसद में एक और बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है. पार्टी के 6 सांसदों के शिवसेना (शिंदे) में विलय के बाद न सिर्फ उसकी संसदीय ताकत घटेगी, बल्कि संसद भवन परिसर में मिले उसके दफ्तर पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं। 

    सूत्रों के मुताबिक, इस मामले में लोकसभा अध्यक्ष की औपचारिक मंजूरी मिलने के बाद शिवसेना (यूबीटी) के संसदीय दल में सिर्फ चार सांसद ही बाकी रह जाएंगे।  

    संसद के नियम के तहत आमतौर पर पांच या उससे ज्यादा सांसदों वाले दलों को ही संसद भवन परिसर में अलग दफ्तर आवंटित किया जाता है. ऐसे में पार्टी को अपने वर्तमान कार्यालय से हाथ धोना पड़ सकता है। 

    संसदीय गतिविधियों में पार्टी की भागीदारी पर पड़ सकता है असर
    सांसदों की संख्या घटने का असर राजनीतिक और संसदीय गतिविधियों में पार्टी की भागीदारी पर भी पड़ सकता है. अहम राष्ट्रीय और संसदीय मुद्दों पर केंद्र सरकार की ओर से बुलाई जाने वाली सर्वदलीय बैठकों में आमतौर पर पांच से कम सांसदों वाले दलों को आमंत्रित नहीं किया जाता है. ऐसे में भविष्य में शिवसेना (यूबीटी) की इन बैठकों में मौजूदगी पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं। 
    फिलहाल शिवसेना (यूबीटी) के संसदीय दल का दफ्तर संविधान सदन (पुराना संसद भवन) के कमरा नंबर 128A में स्थित है. ये दफ्तर अविभाजित शिवसेना को आवंटित कमरे नंबर 128 के ठीक बगल में है. सांसदों की संख्या में संभावित कमी के बाद इस कार्यालय के आवंटन की स्थिति पर भी नजरें टिकी हुई हैं। 

    महाराष्ट्र की राजनीति में 'ऑपरेशन टाइगर' की चर्चा
    पिछले कई दिनों से महाराष्ट्र की राजनीति में 'ऑपरेशन टाइगर' खूब चर्चा में हैं. इस दलबदल को एकनाथ शिंदे का 'ऑपरेशन टाइगर' कहा जा रहा है. शिवसेना पर आए इस संकट को राज्यसभा सांसद संजय राउत सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं. संजय राउत दिल्ली में हैं. वहीं पार्टी के सांसद अरविंद सावंत, अनिल देसाई भी दिल्ली में ही ठहरे हुए हैं.  बताया जा रहा है कि संजय राउत दलबदल को रोकने के लिए किताबों और संसदीय प्रक्रिया का अध्यन करने में लगे हैं। 

    संजय राउत और अनिल देसाई ने दिल्ली के प्रमुख वकीलों के साथ इस बात पर बातचीत की कि अगर छह सांसद बेहतर अवसरों की तलाश में अगर पार्टी बदल लेते हैं तो उसमें क्या कानूनी उपाय किए जाने चाहिए. इसको लेकर अनिल परब ने बताया कि अगर सुप्रीम कोर्ट यूबीटी और शिंदे गुट के धनुष-बाण चिन्ह वाले फैसले पर सुनवाई की होती तो हमारा पक्ष मजबूत होता। 

    शिवसेना संकट पर क्या बोले एक्सपर्ट्स?
    इस बीच एक्सपर्ट्स का कहना है कि ठाकरे के लिए इस संकट से निपटना चुनौती भरा हो सकता है, जिसे देश की राजनीति के तेजी से बदलते स्वरूप के रूप में देखा जाना चाहिए. लेखक और शिवसेना के इतिहासकार प्रकाश अकोलकर यह सब पैसे का खेल है. कोई भी पार्टी बीजेपी के पैस और संसाधनों का सामना नहीं कर सकती. सांसद से लेकर विधायक तक बिकने को तैयार हैं. बीजेपी जो ऐसा कर रही है यह बेहद शर्मनाक है। 

    उन्होंने कहा कि 20 से 25 साल के युवाओं की सिर्फ यही राय है कि उद्धव ठाकरे को बीजेपी का डटकर सामना करना चाहिए. एक कार्यकर्ता ने कहा कि अब समय आ गया है कोई बीजेपी के सामने खड़ा हो और देश में विपक्षी पार्टियों को खत्म करने की नापाक साजिश को पर्दाफाश करे। 

    वहीं दूसरी तरफ कई शिवसैनिक 'ऑपरेशन टाइगर के विरोध के लिए सड़कों पर उतरने के लिए भी तैयार हैं.' बता दें कि पार्टी बदलने वाले 6 सांसदों में संजय दीना पाटिल ने पहले कहा था कि उनकी गठबंधन में जाने की मर्जी नहीं है। 

  • उद्धव ठाकरे की बढ़ी मुश्किलें, 20 विधायकों पर खतरा; आज करेंगे बड़ी बैठक

    उद्धव ठाकरे की बढ़ी मुश्किलें, 20 विधायकों पर खतरा; आज करेंगे बड़ी बैठक

    मुंबई 

    महाराष्ट्र विधानसभा का तीन सप्ताह का मानसून सत्र सोमवार 22 जून 2026 से शुरू होने जा रहा है. 10 जुलाई तक चलने वाला यह सत्र राजनीतिक उठापटक और मौसम संबंधी चुनौतियों के बीच काफी हंगामेदार रहने की संभावना है. एक ओर कथित ‘ऑपरेशन टाइगर’ को लेकर सियासी माहौल गर्म है, वहीं दूसरी ओर अनियमित मानसून और किसानों की समस्याएं सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई हैं. महाराष्‍ट्र विधानसभा सत्र से पहले राज्य की राजनीति में ‘ऑपरेशन टाइगर’ चर्चा का केंद्र बना हुआ है. विपक्ष का आरोप है कि सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) के कुछ लोकसभा सांसदों को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रहा है. शिवसेना (यूबीटी) नेता आदित्य ठाकरे ने हाल ही में पार्टी के 60वें स्थापना दिवस पर कथित बागी नेताओं को बेशर्म और एहसान फरामोश बताते हुए तीखा हमला बोला था। 

    इस बार विधानसभा और विधानपरिषद दोनों सदनों में आधिकारिक नेता प्रतिपक्ष नहीं होने की संभावना है. ऐसे में सत्ता पक्ष इस स्थिति का लाभ उठाकर अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश करेगा. वहीं, शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत ने ‘ऑपरेशन टाइगर’ के जवाब में ‘ऑपरेशन वुल्फ’ शुरू करने की चेतावनी दी है, जिससे सदन में विपक्ष के आक्रामक रुख के संकेत मिल रहे हैं. सत्तारूढ़ गठबंधन मानसून सत्र के पहले सप्ताह में विधानपरिषद के उपसभापति पद के लिए चुनाव कराने की तैयारी में है. शिवसेना नेता नीलम गोरहे के दोबारा विधान परिषद सदस्य चुने जाने के बाद उन्हें फिर से इस पद पर बैठाने की संभावना जताई जा रही है. सदन के भीतर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच राज्य के किसानों की समस्याएं भी प्रमुख मुद्दा रहेंगी. महाराष्ट्र में अनियमित और लंबे समय तक कमजोर मानसून ने कृषि क्षेत्र की चिंताएं बढ़ा दी हैं. सरकार किसानों को जल्दबाजी में बुवाई न करने और मौसम विभाग की अगली सलाह का इंतजार करने की अपील कर चुकी है। 

    राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन
    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह सत्र सामान्य विधायी कार्यवाही से ज्यादा राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन और दबदबा स्थापित करने की लड़ाई का मंच बनेगा. पूरक बजट मांगों की मंजूरी के साथ शुरू होने वाले इस सत्र में तीखी बहस, नारेबाजी, वॉकआउट और राजनीतिक टकराव देखने को मिल सकते हैं. महाराष्ट्र की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में यह मानसून सत्र राज्य के राजनीतिक और आर्थिक भविष्य की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण मंच माना जा रहा है।

     'बेशर्मी से बिक गई तुम्हारी वफादारी', बागी सांसदों पर भड़के आदित्‍य ठाकरे

    शिवसेना (यूबीटी) के बागी सांसदों पर आदित्य ठाकरे ने तीखा हमला बोला है. आदित्य ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर कहा कि दल बदलने वाले सांसदों ने यह साबित कर दिया है कि उनकी वफादारी और साख बेशर्मी से बिकाऊ है. उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष राजनीतिक फायदे के लिए सरकारी संसाधनों और जनता के पैसे का इस्तेमाल कर रहा है. आदित्य ठाकरे ने कहा कि जो सांसद अब पाला बदल रहे हैं, वे महाविकास अघाड़ी (MVA) और INDIA गठबंधन के मंच पर चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे. उनके लिए शिवसेना (यूबीटी), कांग्रेस और एनसीपी के नेताओं ने प्रचार किया था और मतदाताओं ने उन्हें NDA के खिलाफ वोट दिया था. उन्होंने बागी सांसदों पर निशाना साधते हुए कहा कि विचारधारा या गठबंधन बदलने की दलीलें अब नहीं चलेंगी, क्योंकि सच्चाई यह है कि लालच के कारण उन्होंने रातों-रात अपने वोटरों के जनादेश से विश्वासघात किया है। 

    शिवसेना-यूबीटी के बागी सांसद आज शाम 4 बजे थामेंगे शिंदे गुट का हाथ
     महाराष्ट्र की राजनीति में आज एक और बड़ा उलटफेर देखने को मिल सकता है. सूत्रों के मुताबिक, उद्धव ठाकरे गुट के बागी सांसद आज शाम 4 बजे मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले शिवसेना गुट में शामिल हो सकते हैं. इस संभावित राजनीतिक घटनाक्रम को उद्धव गुट के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. पिछले कुछ दिनों से राज्य की राजनीति में ‘ऑपरेशन टाइगर’ को लेकर चर्चाएं तेज हैं और इसी बीच यह खबर सामने आई है. हालांकि, अभी तक संबंधित सांसद या दोनों गुटों की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है. अगर यह शामिल होना होता है, तो महाराष्ट्र की सियासत में इसका असर और बढ़ सकता है। 

    शिवसेना-यूबीटी के सांसद बागी कैसे – मनोज झा
    RJD सांसद मनोज झा ने शिवसेना(UBT) के कई सांसदों के आज शिंदे गुट की शिवसेना में शामिल होने की संभावना पर कहा, ‘उन्हें बागी कैसे कहा जा सकता है? उन्होंने शिवसेना (UBT) के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ा था. जब शिवसेना UBT, TMC या किसी भी पार्टी में यह इंजीनियरिंग होती है, तो यह उनका संकट नहीं है, यह लोकतंत्र का संकट है. यह उद्धव ठाकरे के साथ धोखा नहीं है, यह उन मतदाताओं के साथ धोखा है, जिन्होंने विकल्प देखकर उन्हें चुना और वोट दिया. क्या आप उनके साथ अन्याय नहीं कर रहे हैं?’

  • शिवसेना (UBT) में बड़ी टूट, 6 सांसदों ने चुनी अलग राह; राउत की प्रेस कॉन्फ्रेंस से बढ़ा सियासी घमासान

    शिवसेना (UBT) में बड़ी टूट, 6 सांसदों ने चुनी अलग राह; राउत की प्रेस कॉन्फ्रेंस से बढ़ा सियासी घमासान

     मुंबई

    महाराष्ट्र की सियासत में एक बार फिर से उद्धव ठाकरे को बड़ा सियासी झटका लगा है. शिवसेना (यूबीटी) के 9 लोकसभा सांसदों में से 6 सांसदों ने उद्धव ठाकरे का साथ छोड़कर अलग अपना गुट बनाने का फैसला किया है. शिवसेना (यूबीटी) के 6 सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखकर कहा कि उन्हें अलग समूह माना जाए। 

    शिवसेना (यूबीटी) के जिन सांसदों ने स्पीकर को पत्र लिखा है, उसमें संजय जाधव , संजय देशमुख, नागेश पाटिल अष्टिकर , ओमराजे निंबालकर, भाऊसाहेब वाकचौरे और संजय दीना पाटिल शामिल हैं। वहीं, शिवेसना (यूबीटी) के टिकट पर जीतकर आए 9 सांसदों में से छह सांसद एक साथ आए गए हैं तो तीन सांसद अभी भी उद्धव ठाकरे के साथ खड़े हैं। 

    महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) के 9 में से 6 सांसदों ने बगावत कर दी है। सूत्रों के अनुसार, छह सांसदों ने शिंदे गुट की शिवसेना में विलय के लिए बुधवार सुबह 9:30 बजे लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को चिट्ठी भेजी है।

    सूत्रों के अनुसार, चिट्ठी भेजने वाले सांसदों में नागेश पाटिल आष्टीकर और संजय दीना पाटिल का नाम शामिल है। संजय दीना पाटिल ने पार्टी छोड़ने की अटकलों को खारिज किया था। उन्होंने कहा- मैं उद्धव ठाकरे की पार्टी का सांसद हूं और इसी पार्टी में रहूंगा। इधर, शिवसेना (UBT) के राज्यसभा सांसद संजय राउत ने दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बागी सांसदों को गाली दी। राउत ने गाली देते हुए कहा- ये बेईमान लोग हैं। बेईमानी उनके खून में हैं। बाद में मीडिया से उन्होंने कहा- मराठी में ऐसे शब्द आम बोलचाल का हिस्सा हैं।

    उद्धव और अन्य पार्टी लीडर्स अपने सांसदों से लगातार संपर्क करने और उन्हें मनाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा है। पार्टी ने गुरुवार को दिल्ली में संसदीय समिति की बैठक बुलाई है। न्यूज एजेंसी PTI के अनुसार, पार्टी ने सभी सांसदों को व्हिप जारी कर बैठक में अनिवार्य रूप से शामिल होने का निर्देश दिया है। जो सांसद बैठक में नहीं आएंगे, पार्टी उनके खिलाफ डिस्क्वालिफिकेशन की कार्रवाई कर सकती है।

    उद्धव के सांसद एकनाथ शिंदे के साथ
    महाराष्ट्र में भी उद्धव ठाकरे के साथ खेला हो गया है. शिवसेना (यूबीटी) के 9 में से 6 सांसदों ने बुधवार सुबह साढ़े 9 बजे स्पीकर को पत्र देकर एकनाथ शिंदे की पार्टी में विलय करने की मांग की है. उद्धव के 6 सांसदों ने अपना गुट बनाकर शिवसेना में विलय कर दिया है। 

    उद्धव की पार्टी के 6 बागी सांसद बुधवार सुबह  नांदेड़, पुणे और मुंबई से प्राइवेट प्लेन से दिल्ली पहुंचे. इस दौरान उनके साथ में एकनाथ शिंदे की शिवसेना के एक सीनियर नेता मौजूद थे, जिनके साथ दिल्ली आए और स्पीकर को अपने समर्थन का पत्र सौंपा है। 

    उद्धव के साथ सिर्फ 3 सांसद ही बचे
    यूबीटी में बगावत की अटकलों के बीच दिल्ली में संजय राउत के आवास पर प्रेस कॉन्फ्रेंस में अरविंद सावंत और चीफ व्हिप अनिल देसाई और नासिक के सांसद राजाभाऊ मौजूद थे. इस तरह शिवेसना (यूटीबी) के 9 में से 3 लोकसभा सांसद ही पहुंचे थे, 6 सांसद नहीं थे. इसके मतलब साफ है कि उद्धव की पार्टी में टूट का खतरा बना हुई है। 

    वहीं, शिवेसना (यूबीटी) के टिकट पर जीतकर आए 9 सांसदों में से छह सांसद एक साथ आए गए हैं तो तीन सांसद अभी भी उद्धव ठाकरे के साथ खड़े हैं. उन्होंने कहा था कि सभी 9 सासंद हमारी पार्टी के टिकट पर जीतकर आए हैं. उद्धव ठाकरे ने उन्हें जिताने के लिए दिन-रात एक कर दिया. हमने उन्हें जितना हो सका, संसाधन दिए। 

    राउत ने कहा कि हमारे सांसद शिवसेना के चुनाव चिह्न मशाल पर चुने गए थे, जिसके नेता उद्धव ठाकरे हैं. वे पीएम मोदी के नाम पर नहीं जीते हैं. ऐसे में अगर अब कोई पाला बदलता है, तो हम किसी को नहीं छोड़ेंगे, अगर जिन्हें जाना है, वो इस्तीफा देकर जा सकते हैं. इससे साफ है कि उद्धव की पार्टी में टूट का खतरा टला नहीं है। 

  • कांग्रेस की टेढ़ी नजर उद्धव ठाकरे की खाली सीट पर, कैंडिडेट उतारने को लेकर विपक्ष में विवाद

    कांग्रेस की टेढ़ी नजर उद्धव ठाकरे की खाली सीट पर, कैंडिडेट उतारने को लेकर विपक्ष में विवाद

    मुंबई 
    उद्धव ठाकरे ने इस बार विधान परिषद सदस्य न बनने का फैसला लिया है। उनके स्थान पर उद्धव सेना चाहती है कि अंबादास दानवे को सदन में भेजा जाए। उद्धव ठाकरे ऐसे पहले सदस्य थे, जो ठाकरे फैमिली से सदन में पहुंचे थे। इसको लेकर यह भी कहा गया था कि यह गलत परंपरा है और बालासाहेब ठाकरे से अलग है, जो खुद कभी किसी सदन के लिए निर्वाचित नहीं हुए थे। ऐसे में उनके फैसले को खुद को सही करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। इस बीच जानकारी मिली है कि भले ही उद्धव ठाकरे विधान परिषद के मेंबर नहीं बनना चाहते, लेकिन INDIA अलायंस अब उनके स्थान पर किसी उद्धव सेना के किसी और नेता के नाम पर सहमत नहीं दिख रहा है।

    कांग्रेस ने संकेत दिए हैं कि यदि उद्धव ठाकरे खुद सदन नहीं जाएंगे तो फिर वह अपना कैंडिडेट उतार सकती है। महाराष्ट्र में विधान परिषद की कुल 9 सीटें खाली हो रही हैं और इनमें से एक सीट ही विपक्षी गठबंधन जीतने की स्थिति में है। ऐसे में हालात एक अनार सौ बीमार वाले बन रहे हैं। उद्धव ठाकरे बड़े नेता हैं तो उनके आगे कोई दावेदारी नहीं जता रहा था, लेकिन जब वह पैर पीछे हटा रहे हैं तो फिर कांग्रेस की उम्मीदें भी परवान चढ़ने लगी हैं। 2020 में जब उद्धव ठाकरे सीएम बने थे तो एनसीपी और कांग्रेस ने उन्हें विधान परिषद जाने को कहा था। इस तरह सत्ता के लिए तीनों दल एकजुट थे, लेकिन अब विपक्ष में रहने के दौरान एक-एक सीट के लिए संघर्ष की स्थिति बन रही है।

    पिछले दिनों कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सकपाल ने उद्धव ठाकरे से मुलाकात की थी। उनका कहना था कि वह खुद चुनाव में उतरें। इसके अलावा उन्होंने यह भी संकेत दिया था कि यदि सेना चीफ खुद नहीं विधान परिषद जाएंगे तो फिर कांग्रेस अपना कैंडिडेट उतारना चाहती है। बुधवार को हर्षवर्धन सकपाल दिल्ली में थे और पार्टी के सीनियर नेताओं से मुलाकात की थी। माना जा रहा है कि उन्होंने हाईकमान से यह मांग की है कि अब उद्धव की खाली हो रही सीट पर कांग्रेस को अपना कैंडिडेट उतारना चाहिए। हालांकि उद्धव सेना ऐलान कर चुकी है कि हम अंबादास दानवे को उद्धव के स्थान पर भेजेंगे।
    कांग्रेस बोली- हम उद्धव सेना के खिलाफ उतार सकते हैं कैंडिडेट

    ऐसे में यदि कांग्रेस की ओर से अपने कैंडिडेट के लिए दबाव बनाया गया तो तय है कि आपस में खींचतान शुरू हो जाएगी। कांग्रेस की एक दलील यह भी है कि आखिर उद्धव सेना सहयोगी दलों को भरोसे में लिए बिना एकतरफा फैसला कैसे कर सकती है। यही नहीं एक अन्य कांग्रेस नेता भाई जगताप ने तो दानवे के खिलाफ कैंडिडेट ही खड़े करने की बात कर दी। उन्होंने कहा कि इस मामले में सही राय तो सकपाल रखेंगे, लेकिन मुझे इतनी जानकारी है कि अंबादास दानवे के खिलाफ कांग्रेस अपना कैंडिडेट उतार सकती है। अब यह मामला रोचक होता दिख रहा है क्योंकि विपक्ष में बंटवारा होते देख भाजपा और शिवसेना की ओर से एक अतिरिक्त कैंडिडेट भी उतारा जा सकता है।

  • घर-वापसी: धर्मांतरण विरोधी कानून के पक्ष में उद्धव ठाकरे का बयान, क्या हिंदुत्व का असर है?

    घर-वापसी: धर्मांतरण विरोधी कानून के पक्ष में उद्धव ठाकरे का बयान, क्या हिंदुत्व का असर है?

    मुंबई 
    महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों एक बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है. जो उद्धव ठाकरे पिछले कुछ सालों से 'सेकुलर' राजनीति के पाले में खड़े नजर आ रहे थे, वे अब फिर से अपनी पुरानी राह यानी हिंदुत्व की ओर मुड़ते दिख रहे हैं. इसका सबसे बड़ा संकेत है महाराष्ट्र धर्मांतरण विरोधी बिल को उनका समर्थन. इसे राजनीतिक ‘घर-वापसी‘ भी कहा जा रहा है।

    उद्धव ठाकरे की राजनीति का सफर पिछले पांच सालों में किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं रहा है. साल 2019 में जब उन्होंने दशकों पुराना बीजेपी का साथ छोड़कर कांग्रेस और शरद पवार से हाथ मिलाया, तो इसे भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा 'यू-टर्न' कहा गया।

    गठबंधन बदलने के साथ ही उद्धव पर आरोप लगने लगे कि उन्होंने सत्ता के लिए बाल ठाकरे की विचारधारा को तिलांजलि दे दी है. मुख्यमंत्री रहते हुए जब पालघर में साधुओं की हत्या हुई या सावरकर के मुद्दे पर कांग्रेस ने कड़ा रुख अपनाया, तब उद्धव की चुप्पी ने उनके कट्टर समर्थक कैडर को बेचैन कर दिया. नतीजा यह हुआ कि उनके हिंदुत्व के एजेंडे पर सवाल उठने लगे. इस दौरान मुस्लिम मतदाताओं के बीच उद्धव की स्वीकार्यता जरूर बढ़ी, लेकिन उनकी अपनी मूल पहचान धुंधली होती गई।

    वक्फ बिल और शिंदे का प्रहार
    पार्टी में टूट के बाद जब वक्फ संशोधन कानून की बात आई, तो उद्धव की पार्टी (यूबीटी) ने इसका विरोध किया. इस मौके को मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने हाथ से जाने नहीं दिया. शिंदे ने सीधा हमला बोलते हुए कहा कि उद्धव अब वही भाषा बोल रहे हैं जो ओवैसी बोलते हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि उद्धव अब 'जनाब' सेना बन चुके हैं।

    महाराष्ट्र चुनाव परिणाम और हकीकत का सामना
    हालिया विधानसभा चुनावों के नतीजों ने उद्धव ठाकरे को आईना दिखा दिया. पार्टी न केवल दो फाड़ हुई, बल्कि चुनावी मैदान में भी धराशायी हो गई. मुस्लिम वोटों के भरोसे वे अपनी पुरानी जमीन नहीं बचा सके. अब जब अस्तित्व पर संकट आया है, तो उद्धव को फिर से उसी हिंदुत्व की याद आई है जिसके दम पर शिवसेना खड़ी हुई थी. धर्मांतरण विरोधी बिल का समर्थन करना इसी 'घर वापसी' की कोशिश का हिस्सा है. वे यह संदेश देना चाहते हैं कि भले ही वे विपक्षी गठबंधन में हैं, लेकिन हिंदुत्व के बुनियादी मुद्दों पर समझौता नहीं करेंगे।

    क्या है महाराष्ट्र धर्मांतरण विरोधी बिल और इसकी बारीकियां?
    महाराष्ट्र की देवेंद्र फडणवीस सरकार जिस धर्मांतरण विरोधी कानून को लाने की तैयारी में है, वह केवल एक कानून नहीं बल्कि देश में एक बड़ी बहस और विवाद भी है. इस बिल के जरिए सरकार राज्य में जबरन या लालच देकर कराए जाने वाले धर्म परिवर्तन पर लगाम लगाना चाहती है।

    -बिल में अवैध धर्मांतरण की परिभाषा लंबी-चौड़ी है. जबरदस्ती. लालच. धोखा. भ्रम. प्रलोभन. गलत बयानी. दबाव. या किसी की मजबूरी का फायदा उठाना. नाबालिगों का मामला भी शामिल है।

    -अगर कोई शादी के जरिए धर्म बदलवाता है तो वह शादी भी रद्द मानी जाएगी. बच्चे का धर्म भी तय करने का प्रावधान है. अगर शादी अवैध तरीके से हुई तो बच्चे का धर्म मां या बाप के मूल धर्म के हिसाब से होगा।

    -कोई धर्म बदलना चाहे तो 60 दिन पहले जिला अधिकारी को सूचना देनी होगी. पुलिस खुद से भी कार्रवाई कर सकती है. एफआईआर कोई भी रिश्तेदार दे सकता है. मां बाप भाई बहन या खून का रिश्ता रखने वाला।

    -सबूत का बोझ उल्टा है. आरोपी को साबित करना होगा कि धर्मांतरण वैध था. पीड़ित को नहीं।

    -सजा भी भारी है. अवैध धर्मांतरण पर सात साल जेल और एक लाख रुपए जुर्माना. सामूहिक धर्मांतरण पर सात साल जेल और पांच लाख जुर्माना. दोबारा अपराध पर दस साल तक जेल हो सकती है।

    महाराष्ट्र सरकार का टारगेटः देवेंद्र फडणवीस और बीजेपी इस बिल के जरिए अपने कोर हिंदू वोट बैंक को यह भरोसा दिलाना चाहते हैं कि वे उनकी संस्कृति और अधिकारों के रक्षक हैं. साथ ही, इस बिल पर उद्धव ठाकरे का समर्थन हासिल करना बीजेपी की एक बड़ी रणनीतिक जीत है. इससे विपक्ष की एकजुटता में दरार भी दिखती है और उद्धव की मजबूरी भी उजागर होती है।

    भारत के अन्य राज्यों में क्या है धर्मांतरण विरोधी कानून की स्थिति
    धर्मांतरण विरोधी कानून बनाने वाला महाराष्ट्र पहला राज्य नहीं है. अब तक भारत के लगभग 10-12 राज्यों में इस तरह के कानून लागू हैं या प्रक्रिया में हैं. इनमें से ज्यादातर बीजेपी शासित राज्य हैं:

    उत्तर प्रदेश: यहां सबसे पहले और सबसे कड़ा कानून लाया गया.

    उत्तराखंड: यहां भी सख्त प्रावधान लागू हैं.

    मध्य प्रदेश और गुजरात: इन राज्यों ने भी अपने पुराने कानूनों को और कड़ा किया है.

    कर्नाटक (पिछली सरकार में) और हरियाणा: यहां भी कानून पारित किए गए हैं.

    उद्धव ठाकरे का इस बिल को समर्थन देना सत्ता से दोबारा करीबी बनाने की एक छटपटाहट भी हो सकती है और अपनी खोई हुई साख को बचाने का आखिरी दांव भी. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या जनता इस 'सुविधाजनक हिंदुत्व' पर दोबारा भरोसा करेगी? महाराष्ट्र की राजनीति अब उस मोड़ पर है जहां विचारधारा और सत्ता की भूख के बीच की लकीर बहुत पतली हो गई है. क्या उद्धव फिर से शेर की तरह दहाड़ पाएंगे या यह केवल एक चुनावी पैंतरेबाजी बनकर रह जाएगी?