Tag: women’s reservation

  • राजस्थान पंचायत चुनाव में महिला आरक्षण अहम, राजसमंद के 14 वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित

    राजस्थान पंचायत चुनाव में महिला आरक्षण अहम, राजसमंद के 14 वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित

    राजसमंद
    जिला प्रमुख की कुर्सी पर किसका कब्जा होगा, इसकी सियासी पटकथा जिला परिषद के चुनाव से ही लिखी जाएगी। राजसमंद में जिला परिषद के 29 वार्डों का आरक्षण तय होने के बाद अब भाजपा और कांग्रेस के सामने उम्मीदवारों के चयन से लेकर चुनावी रणनीति तक कई चुनौतियां होंगी। जिला प्रमुख का पद अनारक्षित है, लेकिन जिला परिषद के 14 वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित होने से महिला उम्मीदवारों और चुनाव जीतकर आने वाली महिला सदस्यों की भूमिका भी अहम रहने वाली है।

    ऐसे में जिला प्रमुख की कुर्सी पर नजर लगाए बैठे दावेदारों को अपने वार्ड में जीत के साथ जिला परिषद में समर्थन का गणित भी साधना होगा। महिला आरक्षण ने चुनावी समीकरणों में एक महत्वपूर्ण पहलू जोड़ दिया है। दोनों प्रमुख दलों के लिए महिला वार्डों में मजबूत उम्मीदवार उतारना और जिला परिषद में अधिक से अधिक सदस्य जिताना अहम रहेगा। टिकट वितरण से लेकर चुनाव परिणाम के बाद बनने वाले समीकरणों तक, हर कदम जिला प्रमुख की कुर्सी की लड़ाई को प्रभावित कर सकता है।

    राजसमंद जिला परिषद के कुल 29 वार्डों में अलग-अलग श्रेणियों के तहत महिला आरक्षण निर्धारित किया गया है। इनमें सामान्य महिला के आठ, ओबीसी महिला के दो, एससी महिला के दो और एसटी महिला के दो वार्ड शामिल हैं। इस तरह कुल 14 वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। इन वार्डों में जीत दर्ज करने वाले सदस्य जिला परिषद की राजनीति का हिस्सा बनेंगे। जिला प्रमुख के चुनाव में उनकी भूमिका कितनी अहम होगी, यह चुनाव परिणाम और राजनीतिक दलों के संख्याबल पर निर्भर करेगा। हालांकि, महिला आरक्षण को जिला प्रमुख की कुर्सी का सीधा फैसला मानना जल्दबाजी होगी, लेकिन चुनावी रणनीति बनाते समय इसे नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकेगा।

    भाजपा-कांग्रेस की असली परीक्षा टिकट वितरण में
    जिला परिषद चुनाव में दोनों प्रमुख दलों के सामने सबसे पहली चुनौती सही उम्मीदवार चुनने की होगी। महिला आरक्षित वार्डों में टिकट के दावेदारों के बीच प्रतिस्पर्धा रहेगी, वहीं अन्य श्रेणियों के वार्डों में भी पार्टी को स्थानीय समीकरणों और जीत की संभावनाओं के बीच संतुलन बनाना होगा। भाजपा और कांग्रेस के लिए टिकट वितरण केवल प्रत्याशियों की सूची तैयार करने तक सीमित नहीं रहेगा। उम्मीदवारों की स्थानीय पकड़, संगठन में सक्रियता और अपने क्षेत्र में समर्थन जुटाने की क्षमता भी महत्वपूर्ण होगी। टिकट किसे मिलता है और किस दावेदार को इंतजार करना पड़ता है, इसका असर चुनावी माहौल पर पड़ सकता है।

    जिला प्रमुख के दावेदारों को साधना होगा पूरा संख्या बल
    जिला प्रमुख का पद अनारक्षित होने से दावेदारी का दायरा खुला है। लेकिन जिला प्रमुख बनने के लिए केवल चुनाव लड़ना या अपने वार्ड में जीत दर्ज करना पर्याप्त नहीं होगा। जिला परिषद में निर्वाचित सदस्यों का समर्थन और चुनाव के बाद बनने वाले राजनीतिक समीकरण भी महत्वपूर्ण होंगे। इसी कारण जिला प्रमुख पद के संभावित दावेदारों की रणनीति अपने वार्ड से आगे तक जा सकती है। उन्हें पार्टी के भीतर समर्थन, दूसरे क्षेत्रों के निर्वाचित सदस्यों के साथ तालमेल और जिला परिषद में अपने पक्ष को मजबूत करने पर ध्यान देना होगा। भाजपा और कांग्रेस, दोनों के लिए सदस्य संख्या और समर्थन का गणित अहम रहेगा।

    आरक्षण की पूरी तस्वीर: किस श्रेणी में कितने वार्ड
    महिलाओं के लिए आरक्षित वार्ड
    सामान्य महिला: वार्ड 15, 18, 19, 22, 23, 25, 27 और 28
    ओबीसी महिला: वार्ड 10 और 26
    एससी महिला: वार्ड 11 और 13
    एसटी महिला: वार्ड 6 और 9

    अन्य आरक्षित वार्ड
    सामान्य: वार्ड 1, 7, 14, 16, 17, 20 और 29
    ओबीसी: वार्ड 2, 5 और 12
    एससी: वार्ड 21 और 24
    एसटी: वार्ड 3, 4 और 8

    टिकट से ताज तक, हर चाल पर रहेंगी निगाहें
    राजसमंद जिला परिषद चुनाव में अब नजरें इस बात पर रहेंगी कि भाजपा और कांग्रेस किन चेहरों पर भरोसा जताती हैं और कौन अपने वार्ड में जीत दर्ज कर जिला परिषद तक पहुंचता है। इसके बाद जिला प्रमुख की कुर्सी के लिए राजनीतिक दलों का संख्याबल और निर्वाचित सदस्यों का समर्थन अहम होगा। फिलहाल इतना तय है कि जिला प्रमुख की कुर्सी की लड़ाई केवल एक पद की दावेदारी नहीं, बल्कि जिला परिषद में राजनीतिक ताकत स्थापित करने की कवायद भी होगी। 29 वार्डों के इस चुनावी मैदान में 14 महिला आरक्षित वार्ड भी सियासी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहेंगे। टिकट वितरण से लेकर चुनाव परिणाम तक, भाजपा और कांग्रेस की हर चाल पर राजनीतिक नजरें टिकी रहेंगी।

     

  • महिला आरक्षण पर SAD ने बदला रुख, BJP से फिर गठबंधन के कयास तेज

    महिला आरक्षण पर SAD ने बदला रुख, BJP से फिर गठबंधन के कयास तेज

    नई दिल्ली
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के ठीक अगले ही दिन शिरोमणि अकाली दल (SAD) ने एक बड़ा सियासी दांव चला है. पार्टी ने महिला आरक्षण बिल और परिसीमन से जुड़े केंद्र सरकार के नए प्रस्ताव को अपना समर्थन देने का ऐलान किया है. इस बड़े फैसले के बाद पंजाब की राजनीति में हलचल बढ़ गई है और दोनों पुराने सहयोगियों के दोबारा साथ आने के कयास लगाए जाने लगे हैं.

    चंडीगढ़ में SAD प्रमुख सुखबीर सिंह बादल के आवास पर पार्टी के बड़े नेताओं का मंथन हुआ. काफी देर चली इस बैठक में आगे की रणनीति पर बात हुई. इसके बाद सुखबीर सिंह बादल ने साफ कर दिया कि उनकी पार्टी संसद में महिला आरक्षण बिल का खुलकर साथ देगी.

    परिसीमन को लेकर भी पार्टी ने अपनी पुरानी जिद्द छोड़ दी है. अकाली दल अब केंद्र के उस नए प्लान के साथ खड़ा हो गया है, जिसके तहत देश के हर राज्य में लोकसभा सीटें 50 प्रतिशत बढ़ाई जानी हैं. पार्टी के वरिष्ठ नेता दलजीत सिंह चीमा ने बताया कि पहले 2011 की जनगणना से परिसीमन जोड़ने का विरोध किया जा रहा था. अब जब सभी राज्यों में सीटें बराबर अनुपात में बढ़ाने की बात है, तो पार्टी को इस पर कोई आपत्ति नहीं है.

    केजरीवाल के बयान पर पलटवार
    पीएम मोदी से मुलाकात के बाद जब अकाली दल के समर्थन की खबरें आईं, तो आप प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने सोशल मीडिया पर तंज कसा. उन्होंने लिखा, "ना-ना करते प्यार तुम ही से कर बैठे. तो क्या चंदा चोर पार्टी और बेअदबी पार्टी का गठबंधन हो रहा है?"

    केजरीवाल के इस बयान पर अकाली दल ने भी पलटवार करने में देरी नहीं की. पार्टी नेता दलजीत सिंह चीमा ने चुटकी लेते हुए कहा कि विरोधी नेताओं की ऐसी बातें सीधे तौर पर उनकी घबराहट और डर को जाहिर कर रही हैं. उन्हें समझ आ गया है कि पंजाब का सियासी माहौल बदलने वाला है.

    पंजाब में फिर जम सकती है पुरानी जोड़ी
    बता दें कि 7 अगस्त (शुक्रवार) को प्रधानमंत्री से हुई मुलाकात के बाद अकाली दल के इस फैसले को दोनों दलों के बीच पिघलती बर्फ (यानी कम होती दूरियों) के रूप में देखा जा रहा है. जानकारों का मानना है कि यह कदम पंजाब की राजनीति में एक नए समीकरण की शुरुआत हो सकता है.

    हालांकि, बीजेपी के साथ गठबंधन के सीधे सवाल पर दलजीत सिंह चीमा थोड़ा संभलकर बोले. उन्होंने कहा कि फिलहाल सिर्फ उन्हीं फैसलों को सामने रखा जा रहा है, जो आज की बैठक में तय किए गए हैं.

    फिलहाल अकाली दल ने महिला आरक्षण बिल और परिसीमन के प्रस्ताव पर अपना रुख साफ कर दिया है. अब सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि BJP और SAD के रिश्तों को लेकर आगे क्या फैसला होता है.

  • निकाय-पंचायत चुनाव की तैयारी तेज, महिलाओं के आरक्षण पर बड़ा फैसला

    निकाय-पंचायत चुनाव की तैयारी तेज, महिलाओं के आरक्षण पर बड़ा फैसला

    जयपुर
    राजस्थान में आगामी शहरी निकायों और पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों को लेकर चुनावी सुगबुगाहट तेज हो गई है। राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग ने चुनावी तैयारियों को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है। इस बार के चुनावों में सबसे महत्वपूर्ण पहलू महिलाओं का आरक्षण प्रतिशत और प्रत्याशियों द्वारा किया जाने वाला चुनाव खर्च रहेगा। शहरी निकायों और पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण का गणित अलग-अलग तय किया गया है। स्वायत्त शासन विभाग और पंचायती राज विभाग ने इस संबंध में लॉटरी प्रक्रिया की तैयारियां पूरी कर ली हैं।

    राजस्थान में इस बार भी शहरी निकाय और पंचायती राज चुनावों में महिला आरक्षण का अनुपात अलग-अलग रहने वाला है।

    पंचायती राज चुनाव: पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा।

    शहरी निकाय चुनाव: स्वायत्त शासन विभाग द्वारा आयोजित निकाय चुनावों में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण ही मिलेगा।

    वर्गवार आरक्षण: अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की श्रेणियों में महिलाओं को आरक्षण इसी 33% और 50% के तय अनुपात के आधार पर ही आवंटित किया जाएगा।

    स्वायत्त शासन विभाग ने 33 फीसदी महिला आरक्षण के हिसाब से तथा पंचायती राज विभाग ने 50 फीसदी महिला आरक्षण के हिसाब से लॉटरी तय करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

    क्यों नहीं लागू हो पाया 50% आरक्षण?
    उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार ने वर्ष 2008 में पंचायत और शहरी निकाय दोनों स्तरों पर महिलाओं का आरक्षण 33 से बढ़ाकर 50 फीसदी करने का निर्णय लिया था। हालांकि, शहरी निकायों में 50 फीसदी महिला आरक्षण का मामला कानूनी अड़चनों के कारण सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया।

    अदालत से हरी झंडी न मिलने के कारण निकायों में महिला आरक्षण 33 फीसदी पर ही रुका हुआ है। कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, संविधान के अनुच्छेद 243 डी (Article 243D) में संशोधन के बाद ही शहरी निकायों में 50 प्रतिशत महिला आरक्षण लागू किया जा सकता है।

    वर्तमान में बिहार, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश और केरल जैसे राज्यों में शहरी निकायों में 50% महिला आरक्षण लागू है।

    पार्षद प्रत्याशियों के लिए चुनाव खर्च की सीमा बढ़ी
    राज्य निर्वाचन आयोग ने विभिन्न निकायों के लिए प्रत्याशी खर्च सीमा का नया ढांचा तय कर दिया है।

    नगर निगम पार्षद: प्रत्याशी चुनाव प्रचार पर अधिकतम ₹3.50 लाख (3.5 लाख) तक खर्च कर सकेंगे।

    नगर परिषद पार्षद: चुनाव खर्च की सीमा ₹50 हजार बढ़ाकर अब ₹2.50 लाख (2.5 लाख) कर दी गई है।

    नगर पालिका पार्षद: पार्षद प्रत्याशी के लिए खर्च की सीमा ₹1.50 लाख (1.5 लाख) रखी गई है।

    कड़े नियम: लाउडस्पीकर बैन, गाड़ियों के लिए स्पेशल परमिशन

    निर्वाचन आयोग ने निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव संपन्न कराने के लिए कड़े नियम लागू किए हैं।

    चुनावी खर्च का ब्योरा: चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद सभी प्रत्याशियों को 15 दिन के भीतर अपने पूरे चुनावी खर्च का विस्तृत हिसाब आयोग के समक्ष प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा।

    मतदान के दिन वाहनों का उपयोग: यदि मतदान के दिन कोई प्रत्याशी वाहन/गाड़ी का इस्तेमाल करना चाहता है, तो उसे इसके लिए निर्वाचन अधिकारी से अलग से लिखित अनुमति लेनी होगी।

    लाउडस्पीकर पर पूर्ण प्रतिबंध: चुनावी कार्यालयों पर लाउडस्पीकर लगाने पर पूरी तरह से प्रतिबंध रहेगा। उल्लंघन करने पर वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।

    आयोग ने जारी किया ₹29.64 करोड़ का बजट
    चुनाव प्रक्रिया को सुचारू रूप से संचालित करने और चुनावी कर्मचारियों के टीए-डीए (TA-DA) व अन्य व्यवस्थाओं के लिए आयोग ने भारी-भरकम बजट स्वीकृत किया है।

    10 नगर निगमों के लिए: निर्वाचन अधिकारियों को कुल ₹10.31 करोड़ आवंटित किए गए हैं।

    नगर पालिकाओं व नगर परिषदों के लिए: ₹19.33 करोड़ का बजट जारी किया गया है।

    कुल चुनावी आवंटन: राज्य निर्वाचन आयोग ने कुल मिलाकर ₹29.64 करोड़ की राशि फील्ड अधिकारियों को जारी कर दी है।