धनतेरस पर आयुर्वेद की ताकत की चर्चा, फेको तकनीक से मोतियाबिंद और क्षार सूत्र से फिस्टुला का इलाज

 पटना
भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का प्रवर्तक व देवताओं का वैद्य माना जाता है। उनकी स्मृति में प्रति वर्ष धनतेरस के दिन धन्वंतरि पूजन कर आयुर्वेद की समृद्ध चिकित्सा परंपरा को याद किया जाता है। अक्सर आयुर्वेद का मतलब जड़ी-बूटियों, काढ़े और पंचकर्म को माना जाता है। 

राजकीय आयुर्वेद कॉलेज के अधीक्षक डॉ. शिवादित्य ठाकुर ने बताया कि उनके अस्पताल में मोतियाबिंद से लेकर हर्निया, हाइड्रोसील और किडनी स्टोन तक की शल्य क्रिया होती है। नेत्र विभाग में मोतियाबिंद का ऑपरेशन आधुनिक फेको तकनीक से किया जा रहा है जबकि फिस्टुला के उपचार में आयुर्वेद की पारंपरिक क्षार सूत्र पद्धति अपनाई जा रही है। 

80 प्रकार की बीमारियों के इलाज की अनुमति
डॉ. शिवादित्य ठाकुर के अनुसार आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा कोई नई अवधारणा नहीं है। आचार्य सुश्रुत को शल्य तंत्र का जनक माना जाता है। उन्होंने हजारों वर्ष पहले शल्य चिकित्सा के लिए सूक्ष्म उपकरणों का विकास किया था। आज भी आधुनिक शल्य चिकित्सा में इस्तेमाल होने वाले कई उपकरणों की मूल अवधारणा सुश्रुत की विकसित तकनीकों से जुड़ी है। 

आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा का दायरा फिर विस्तारित हो रहा है। केंद्र सरकार ने करीब 80 प्रकार की बीमारियों में निर्धारित प्रशिक्षण और नियमों के तहत आयुर्वेद के शल्य चिकित्सकों को सर्जरी की अनुमति दी है।

धन्वंतरि से सुश्रुत तक, शल्य चिकित्सा की प्राचीन विरासत 
डॉ. शिवादित्य ठाकुर ने बताया कि आयुर्वेद की परंपरा में भगवान धन्वंतरि का विशेष स्थान है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन से उनका प्राकट्य हुआ था। उन्हें आयुर्वेद और औषध विज्ञान का प्रवर्तक माना जाता है। परंपरा में काशी के राजा दिवोदास को भी धन्वंतरि से जोड़ा जाता है। 

आचार्य सुश्रुत इसी शल्य चिकित्सा परंपरा के प्रमुख आचार्य हैं। उनके ग्रंथ सुश्रुत संहिता में शल्य चिकित्सा, शारीरिक संरचना, शस्त्र और यंत्रों तथा विभिन्न चिकित्सा प्रक्रियाओं का विस्तृत वर्णन मिलता है। यह प्राचीन ज्ञान बताता है कि भारतीय चिकित्सा परंपरा में शल्य चिकित्सा का विकास बहुत पहले हो चुका था।

पंचकर्म से रोग के मूल कारणों का उपचार
आयुर्वेद के काय चिकित्सा और पंचकर्म से रोगों के मूल कारणों की पहचान कर उपचार किया जाता है। शरीर में उत्पन्न विषाक्तता और असंतुलन को दूर करने के लिए पंचकर्म की विभिन्न प्रक्रियाओं का उपयोग होता है। 

आयुर्वेद का उद्देश्य केवल लक्षणों को दबाना नहीं बल्कि शरीर की प्रकृति और रोग के मूल कारण को समझकर उपचार करना है। इसके लिए आधुनिक अनुसंधान की भी आवश्यकता है। पहले किए गए शोध में जो विषय अधूरे रह गए हैं, उन पर नए सिरे से काम करके आयुर्वेद की चिकित्सा पद्धति को और विकसित किया जा रहा है।

राष्ट्रीय चिकित्सा पद्धति घोषित करने की मांग
आयुर्वेद को भारत की राष्ट्रीय चिकित्सा पद्धति घोषित करने की मांग की जा रही है। विश्व आयुर्वेद परिषद देश के सभी जिलों के जिलाधिकारियों के माध्यम से राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को ज्ञापन भेजने का अभियान चला रही है। 

आयुर्वेद भारत की प्राचीन चिकित्सा विरासत है। इसके सर्वांगीण विकास के लिए केंद्र और राज्य सरकार को मिलकर काम करना चाहिए। बिहार में भी आयुर्वेद के विकास के लिए अस्पतालों की सुविधाओं, संसाधनों, औषधियों की गुणवत्ता और अनुसंधान के क्षेत्र में अभी काफी संभावनाएं हैं।

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