Category: विदेश

  • नेतन्याहू की सत्ता पर संकट, इजरायल में प्रधानमंत्री के सीधे चुनाव का प्रस्ताव लाने की तैयारी

    नेतन्याहू की सत्ता पर संकट, इजरायल में प्रधानमंत्री के सीधे चुनाव का प्रस्ताव लाने की तैयारी

     नई दिल्ली
     इजरायल में चुनाव में किसी गठबंधन को बहुमत न मिलने से नई सरकार के गठन की तस्वीर साफ नहीं हुई है। वैसे गादी आइसेनकोट के नेतृत्व वाले मध्यमार्गी गठबंधन की अरब पार्टियों के गठबंधन से समझौते के लिए वार्ता चल रही है। लेकिन प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खास लिकुड पार्टी के नेता आमिर ओहाना को संसद नीसेट के स्पीकर पद से हटाने पर विपक्षी खेमे में सहमति बन गई है।

    इस बीच देश में पिछले 10 वर्षों में हुए चुनावों में बहुमत न मिल पाने से पैदा हुई समस्या से निपटने के लिए सीधे प्रधानमंत्री चुने जाने के प्रस्ताव पर चर्चा तेज हो गई है। वैसे इस तरह का प्रस्ताव 2021 में किसी दल या गठबंधन को बहुमत न मिलने पर बेंजामिन नेतन्याहू ने किया था।

    एएनआइ के अनुसार इस बार प्रधानमंत्री पद के लिए सीधे चुनाव पर चर्चा मौजूदा विपक्षी खेमे में शुरू हुई है। सरकार गठन की तस्वीर न बनने पर शुक्रवार को गठित होने वाली संसद के पहले ही सत्र में इस बाबत प्रस्ताव लाया जा सकता है।

    इस प्रस्ताव को वर्तमान सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों का ही समर्थन मिल सकता है। इस प्रस्ताव को लेकर अरब पार्टियां असमंजस में हैं, उन्हें भी तैयार करने की कोशिश हो रही है।

    इससे 120 सदस्यीय नीसेट में बहुमत के लिए बार-बार संकट खड़े होने की समस्या से निजात पाई जा सकेगी। सीधे चुने गए प्रधानमंत्री अपनी पसंद की मंत्री परिषद गठित कर सरकार चला सकेंगे।

    इसके लिए प्रधानमंत्री पद पर चुने व्यक्ति को नीसेट में बहुमत की जरूरत नहीं होगी। यह चुनाव और उसके बाद की प्रशासनिक व्यवस्था कुछ वैसी ही होगी जैसी कि अमेरिका में है। अमेरिका में राष्ट्रपति को मतदाता सीधे वोट देकर चुनते हैं।

    टाइम्स ऑफ इजरायल के अनुसार शनिवार देर शाम इजरायली शहरों में उमड़े नेतन्याहू सरकार विरोधी लोगों ने मध्यमार्गी गठबंधन और अरब पार्टियों से साथ आकर सरकार बनाने की मांग की।

    इन लोगों का कहना था कि बहुमत (मेजोरिटी) मतदान नेतन्याहू सरकार के विरोध में हुआ है, इसलिए विरोधी दलों को एकजुट होकर नई सरकार बनानी चाहिए। इस मांग को लेकर तेल अवीव, बीरशेबा, हाइफा और तईबा में प्रदर्शन हुए हैं।

    विदित हो कि नेतन्याहू विरोधी मध्यमार्गी गठबंधन और अरब पार्टियों के पास 67 सांसद हैं जबकि सत्तारूढ़ लिकुड पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन के पास 53 सांसद हैं। सरकार बनाने के लिए 120 सदस्यों वाली नीसेट में 61 सांसदों का समर्थन चाहिए।

    इस बीच नेतन्याहू विरोधी दोनों गठबंधनों में शुक्रवार को नई नीसेट के गठन के साथ ही नेतन्याहू के विश्वस्त आमिर ओहाना को स्पीकर पद से हटाने पर सहमति बन गई है। इसके जरिये बहुमत के आधार पर नेतन्याहू को झटका देने की तैयारी है। विपक्षी खेमे का मानना है कि नेतन्याहू को सत्ता से दूर करने के लिए ओहाना को स्पीकर पद से हटाना जरूरी है।

  • केश्म द्वीप के पास नौकाओं पर हमले से बढ़ा तनाव, खामेनेई ने दुश्मनों को जवाब देने का दिया आदेश

    केश्म द्वीप के पास नौकाओं पर हमले से बढ़ा तनाव, खामेनेई ने दुश्मनों को जवाब देने का दिया आदेश

    तेहरान 
    ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के बीच ईरान ने अमेरिका पर हमला करने का आरोप लगाया है. ईरानी इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान ब्रॉडकास्टिंग ने शनिवार को होर्मोजगान प्रांत के एक अधिकारी के हवाले से बताया कि अमेरिका ने क़ेश्म द्वीप के पास दो मछली पकड़ने वाली नौकाओं को निशाना बनाया। 

    इस घटना में दो मछुआरे लापता हैं, जबकि एक घायल बताया गया है. हालांकि, अमेरिका की ओर से इस हमले की तत्काल पुष्टि नहीं की गई है. इस बीच ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई ने किसी भी दुश्मन के खतरे की स्थिति में तत्काल और प्रभावी जवाब देने का आदेश दिया है. उनके लिखित संदेश के मुताबिक, जवाब की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होगी. उन्होंने कहा कि अगर दुश्मन दोबारा सैन्य या आतंकी हमला करते हैं तो ईरान नए संघर्ष को खत्म करने का समय और शर्तें खुद तय करेगा। 

    खामेनेई ने सशस्त्र बलों को सभी अमेरिकी और इजरायली ठिकानों और संसाधनों को निशाने की जद में लाने के लिए टारगेट लिस्ट अपडेट करने का आदेश दिया है. साथ ही गोला-बारूद और हथियारों का उत्पादन बढ़ाने, सैन्य खुफिया क्षमताओं को मजबूत करने और घरेलू रक्षा क्षमता विकसित करने को कहा है। 

    अमेरिका दे रहा है धमकी

    ह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ा हुआ है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ईरान के खिलाफ फिर से सैन्य कार्रवाई की संभावना को लेकर लगातार संकेत दिए जा रहे हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका में 3 नवंबर को होने वाले मिडटर्म चुनाव के बाद ईरान पर नए हमले की संभावना पर चर्चा चल रही है. अमेरिका के शीर्ष सैन्य अधिकारियों ने ट्रंप के सामने ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई के विकल्प भी रखे हैं. इस बीच इजरायल में भी ईरान को लेकर सैन्य तैयारियों और अमेरिका के साथ संभावित कार्रवाई की अटकलें तेज हैं। 

  • तालिबान से बचकर अमेरिका पहुंचे अफगानी अब लौटेंगे अपने देश, 2 नवंबर को रवाना हो सकती है पहली फ्लाइट

    तालिबान से बचकर अमेरिका पहुंचे अफगानी अब लौटेंगे अपने देश, 2 नवंबर को रवाना हो सकती है पहली फ्लाइट

     न्यूयॉर्क

    अमेरिका में रह रहे अफगानियों की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं. वहां हिरासत में लिए गए 150 से अधिक अफगान प्रवासियों को ट्रंप प्रशासन निर्वासित करने की तैयारी कर रहा है. ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि यदि इन लोगों को जबरन अफगानिस्तान भेजा जाता है तो उन्हें तालिबान शासन में उत्पीड़न का सामना करना पड़ सकता है। 

    'द न्यूयॉर्क टाइम्स' की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका इन लोगों को पाकिस्तान के रास्ते अफगानिस्तान भेजने की योजना बना रहा है. यदि इस प्लान को अमल में लाया जाता है तो अमेरिका से अफगान नागरिकों के यह सबसे बड़ा निर्वासन अभियान होगा। 

    इन लोगों में उन लोगों के रिश्तेदार भी शामिल हैं, जिन्होंने अमेरिकी सेना के साथ काम किया था. एक समलैंगिक भी इसमें शामिल है, जिसे अफगानिस्तान लौटने पर कठोर दंड का सामना करना पड़ सकता है। 

    अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि पहली उड़ान 2 नवंबर को रवाना हो सकती है. इसके तहत हिरासत में लिए गए लोगों को पहले पाकिस्तान ले जाया जाएगा. फिर सीमा पार कराकर अफगानिस्तान भेजा जाएगा। 

    यह योजना ट्रंप प्रशासन को अफगान नागरिकों को सीधे निर्वासित करने में आने वाली बड़ी बाधा से बचने का रास्ता देती है. अमेरिका का तालिबान सरकार के साथ राजनयिक संबंध नहीं है. ऐसे में राजनयिक माध्यमों से निर्वासन संभव नहीं है। 
    इसके अलावा, अमेरिका में कुछ अफगान नागरिकों को अदालतों से कानूनी संरक्षण मिला है, क्योंकि उन्हें अपने देश लौटने पर उत्पीड़न का खतरा हो सकता है। 

    हैरानी की बात है कि अमेरिका ने इस अभियान की सार्वजनिक रूप से घोषणा नहीं की है. द न्यूयॉर्क टाइम्स ने वकीलों और अमेरिका के तीन अधिकारियों से बातचीत के आधार पर इस योजना का खुलासा किया है। 

    रिपोर्ट के मुताबिक, हाल के दिनों में देशभर के अलग-अलग आव्रजन हिरासत केंद्रों से अफगान नागरिकों को लुइसियाना स्थित हिरासत केंद्रों में लाया गया है। 

    पाकिस्तान के रास्ते निर्वासन की प्रस्तावित योजना बनाने के पीछे भी खास वजह है. दरअसल अमेरिकी कानून किसी भी सरकार को ऐसे देशों में लोगों को निर्वासित करने से रोकता है, जहां कोर्ट ने यह निर्धारित किया हो कि उन्हें उत्पीड़न का सामना करने की आशंका है। 

     

  • ‘भारतीय गाय का मूत्र पीते हैं…’ इजरायली धर्मगुरु के बयान से भड़का विवाद, सोशल मीडिया पर नाराजगी

    ‘भारतीय गाय का मूत्र पीते हैं…’ इजरायली धर्मगुरु के बयान से भड़का विवाद, सोशल मीडिया पर नाराजगी

    तेल अवीव

    हिंदुओं की धार्मिक मान्यताओं और गाय की पूजा को लेकर अपमानजनक टिप्पणियां करने वाले इजरायली-अमेरिकी रब्बी योसी मिजराही विवादों में घिर गए हैं। सोशल मीडिया पर उनका एक वीडियो वायरल होने के बाद भारत और इजरायल के लोगों ने कड़ी नाराजगी जताई है। वीडियो में मिजराही ने हिंदुओं के गाय को पूजने की परंपरा का मजाक उड़ाया। इतना ही नहीं, उन्होंने भारतीय डॉक्टरों को लेकर भी घोर आपत्तिजनक बातें कहीं।

    मिजराही ने दावा किया कि भारत में कुछ लोग गाय का मूत्र पीते हैं और यहां तक कि कुछ डॉक्टर भी ऐसा करते हैं। उन्होंने नई दिल्ली की सड़कों पर गायों की वजह से लगने वाले जाम का भी मजाक उड़ाया। उनकी टिप्पणियों को लेकर कई लोगों ने उन्हें नस्लवादी बताते हुए धार्मिक परंपराओं के अपमान की आलोचना की है।

    वीडियो में क्या बोले रब्बी योसी मिजराही?
    सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में मिजराही एक भारतीय व्यक्ति का जिक्र करते नजर आते हैं। उन्होंने दावा किया कि यह व्यक्ति पहले उनके फेसबुक पेज के लिए काम करता था और यहूदी धर्म अपनाना चाहता था। इसी संदर्भ में उन्होंने उस व्यक्ति के परिवार और भारत में गाय की पूजा की परंपरा को लेकर टिप्पणी की।

    मिजराही ने दावा किया कि कुछ हिंदू गाय को घर के अंदर लाते हैं और उसके फर्श पर मूत्र करने के बाद उसे चाटते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारत में लोग फार्मेसी से गाय का मूत्र खरीदते हैं।

    भारतीय डॉक्टरों पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि जब कोई मरीज नई दिल्ली के अस्पताल में डॉक्टर के पास जाएगा तो संभव है कि डॉक्टर ने भी पिछली रात गाय का मूत्र पिया हो। उन्होंने सड़क पर बैठी गायों का उदाहरण देते हुए कहा कि लोग उन्हें हटाने की हिम्मत नहीं करते और इस वजह से यातायात प्रभावित होता है। वीडियो के अंत में मिजराही ने यह कहते हुए हिंदुओं पर तंज कसा कि वह ईश्वर का शुक्रिया अदा करते हैं कि उन्हें भारतीयों जैसा नहीं बनाया गया।

    इजरायल के लेखक ने भी लगाई फटकार
    मिजराही की टिप्पणियों पर इजरायल के शोधकर्ता और लेखक येशाया रोसेनमैन ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। भारत में रहने और अध्ययन करने वाले रोसेनमैन ने कहा कि मिजराही की टिप्पणियों से इजरायल की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी नुकसान पहुंच रहा है।

    उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि इजरायल की प्रतिष्ठा को पहुंचाया जा रहा नुकसान अपने दायरे में चौंकाने वाला है। रोसेनमैन ने उम्मीद जताई कि भविष्य में मिजराही के इजरायल में प्रवेश पर भी रोक लगाई जाएगी, जैसा कि पहले ब्रिटेन में उनके प्रवेश को लेकर विवाद हुआ था।

    एक अन्य यूजर रोमन बिस्ता ने भी मिजराही की टिप्पणी पर नाराजगी जताते हुए लिखा, ‘कुत्ते भौंकते रहते हैं, जबकि हाथी चलता रहता है।’ उन्होंने मिजराही को शर्म करने की नसीहत भी दी।

    फिलिस्तीन के राजदूत ने भी जताई नाराजगी
    भारत में फिलिस्तीन के राजदूत अब्दुल्ला एम अबू शावेश ने भी इस विवाद पर प्रतिक्रिया दी। हालांकि उन्होंने सीधे तौर पर मिजराही का नाम नहीं लिया, लेकिन एक्स पर लिखा कि नस्लवाद पूरी मानवता के लिए खतरा है।

    उन्होंने कहा कि किसी भी धर्म या आस्था के लोगों के खिलाफ नफरत फैलाना, उनकी धार्मिक मान्यताओं का मजाक उड़ाना या परंपराओं का अपमान करना सिर्फ असहिष्णुता फैलाना नहीं है, बल्कि साझा मानवता की बुनियाद को खतरे में डालना है। उन्होंने कहा कि नस्लवादी लोग हम सभी के लिए खतरा हैं।

    कौन हैं योसी मिजराही, पहले भी रहे हैं विवादों में
    इजरायल में जन्मे योसी मिजराही अमेरिका में रहने वाले ऑर्थोडॉक्स यहूदी धर्म प्रचारक हैं। वह ‘डिवाइन इंफॉर्मेशन’ नाम से एक ऑनलाइन धार्मिक मंच भी चलाते हैं। इससे पहले भी वह कई विवादित बयानों को लेकर आलोचनाओं का सामना कर चुके हैं।

    होलोकॉस्ट पर विवादित दावा
    दिसंबर 2015 में मिजराही ने दावा किया था कि होलोकॉस्ट में 10 लाख से भी कम यहूदी मारे गए थे। जबकि ऐतिहासिक रूप से यह संख्या करीब 60 लाख मानी जाती है। होलोकॉस्ट इतिहासकार एफ्राइम जुरॉफ ने उनके दावे को खारिज किया था। इसके बाद मिजराही ने माफी मांगी थी।

    ऑटिज्म और डाउन सिंड्रोम पर टिप्पणी, यहूदी धर्मगुरुओं ने भी की थी आलोचना
    उन्होंने दावा किया था कि ऑटिज्म और डाउन सिंड्रोम पिछले जन्मों में किए गए पापों की सजा हैं दिसंबर 2016 में 16 ऑर्थोडॉक्स यहूदी रब्बियों ने उनके प्रचार के तरीकों की निंदा की थी। उन्होंने मिजराही के बयानों को भ्रामक और खतरनाक बताया था।

    ब्रिटेन में प्रवेश को लेकर विवाद
    मार्च 2019 में उनकी लंदन और मैनचेस्टर में प्रस्तावित धार्मिक सभाओं को लेकर विवाद हुआ था। ब्रिटिश अधिकारियों ने उनके दौरे को रोकने के लिए हस्तक्षेप किया था। हालांकि, मिजराही ने बाद में अखबार को बताया था कि उन्होंने खुद ही अपनी उड़ान में सवार नहीं होने का फैसला किया था। उन्हें डर था कि एयरपोर्ट पर उनसे पूछताछ हो सकती है या प्रवेश से रोका जा सकता है। ब्रिटेन के गृह मंत्रालय ने किसी व्यक्तिगत प्रवेश प्रतिबंध की सार्वजनिक पुष्टि नहीं की थी।

    मिजराही इससे पहले फ्रांस में मुसलमानों को लेकर भी भड़काऊ टिप्पणियां कर चुके हैं। इसके अलावा उन्होंने ब्रिटेन के मुख्य रब्बी एफ्राइम मिर्विस पर भी निशाना साधा था। हिंदुओं को लेकर उनकी ताजा टिप्पणियों ने एक बार फिर उन्हें विवादों के केंद्र में ला दिया है।

  • पोलैंड में तख्तापलट जैसी स्थिति? न्यायपालिका में बड़े फैसले के बाद देशभर में मची हलचल

    पोलैंड में तख्तापलट जैसी स्थिति? न्यायपालिका में बड़े फैसले के बाद देशभर में मची हलचल

    वारसॉ 
    पोलैंड की राजधानी वारसॉ में 30 अक्टूबर 2026 की शाम को उस समय बड़ा संवैधानिक और राजनीतिक संकट खड़ा हो गया, जब देश के सर्वोच्च संवैधानिक अदालत की आधिकारिक वेबसाइट पर एक अचानक आए नोटिस ने न्यायपालिका के शीर्ष नेतृत्व को निलंबित कर दिया। इस अप्रत्याशित कदम के बाद अदालत परिसर को पुलिस ने बैरिकेड लगाकर सील कर दिया, सड़कों पर समर्थक और प्रदर्शनकारी उतर आए और सेनेगल जा रहे देश के राष्ट्रपति को बीच हवा से अपना विमान वापस वारसॉ मोड़ना पड़ा। ट्रिब्यूनल के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर इस पूरे घटनाक्रम को "तख्तापलट" करार दिया गया है।

    वेबसाइट पर सूचना और 'सबसे वरिष्ठ जज' का दावा
    30 अक्टूबर को स्थानीय समयानुसार शाम लगभग 6:00 बजे पोलैंड के संवैधानिक न्यायाधिकरण की वेबसाइट पर एक संक्षिप्त नोटिस दिखाई दिया। इसमें कहा गया कि ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष बोगदान स्वेचकोव्स्की और उपाध्यक्ष बार्तोलोमी सोहांस्की को उनके आधिकारिक कर्तव्यों से तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। इस सूचना के कुछ ही देर बाद वेबसाइट डाउन हो गई।

    ट्रिब्यूनल की जज अन्ना कोर्विन-पियोत्रोव्स्का ने मीडिया के सामने आकर कहा कि कानून का शासन बहाल करने के लिए यह फैसला लिया गया है। उन्होंने दावा किया कि सबसे वरिष्ठ जज होने के नाते अब वे न्यायाधिकरण का प्रशासन संभाल रही हैं।

    ट्रिब्यूनल के मौजूदा नेतृत्व और विपक्षी कंजर्वेटिव पार्टी 'लॉ एंड जस्टिस' (PiS) ने इस निलंबन को पूरी तरह से गैर-कानूनी और असंवैधानिक बताया है।

    राष्ट्रपति नौरोकी ने बीच रास्ते मोड़ा विमान; चीन में राजदूत का इस्तीफा
    इस संवैधानिक संकट की खबर मिलते ही सेनेगल की आधिकारिक यात्रा पर जा रहे पोलैंड के राष्ट्रपति कारोल नौरोकी ने अपना विमान बीच हवा से वापस वारसॉ मोड़ने का आदेश दे दिया।

    राष्ट्रपति नौरोकी ने सोशल मीडिया (X) पर लिखा, “ऐसे समय में राष्ट्रपति का पोलैंड में होना जरूरी है। मैं सेनेगल की अपनी उड़ान को छोटा कर तुरंत वापस लौट रहा हूं।”

    शनिवार तड़के राष्ट्रपति कार्यालय के मुख्य सचिव पावेल शेफरनेकर ने पुष्टि की कि राष्ट्रपति नौरोकी, सुप्रीम कोर्ट के प्रथम अध्यक्ष जबिग्निव कपिंस्की के साथ संवैधानिक ट्रिब्यूनल की इमारत के अंदर दाखिल हो चुके हैं।

    घटनाक्रम के विरोध में चीन में पोलैंड के राजदूत याकुब कुमोच ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि, अमेरिका में जी-20 शिखर सम्मेलन में मौजूद पोलैंड के विदेश मंत्री रादोस्लाव सिकोरस्की ने एक्स पर तीखा जवाब देते हुए लिखा, "आपके मिशन का यह गैर-पेशेवर अंत स्वीकार्य है। अब आप गणराज्य का प्रतिनिधित्व नहीं करते।"

    टस्क सरकार बनाम PiS: सालों पुराना न्यायपालिका का विवाद
    पोलैंड की न्यायपालिका और संवैधानिक अदालत पर नियंत्रण को लेकर वर्तमान प्रो-यूरोपीय सरकार और पूर्व सत्तारूढ़ पार्टी 'लॉ एंड जस्टिस' (PiS) के बीच लंबे समय से खींचतान चल रही है।

    2023 में सत्ता में आई प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क की सरकार का आरोप है कि PiS ने अपने 2015-2023 के शासनकाल के दौरान अदालत पर राजनीतिक कब्जा कर लिया था और अवैध रूप से जजों की नियुक्ति की थी। टस्क ने एक्स पर लिखा, "कानून के शासन को बहाल करना हमारा दायित्व है। सालों की गैर-कानूनी व्यवस्था के बाद यह एक कठिन प्रक्रिया है, लेकिन इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है।"

    PiS के वरिष्ठ नेता और पूर्व कानून मंत्री जबिग्निव जिओब्रो ने इस कार्रवाई को आपराधिक हमला करार देते हुए समर्थकों से सड़कों पर उतरकर "डटकर मुकाबला करने" की अपील की है।

    राजधानी वारसॉ में ट्रिब्यूनल के बाहर भारी संख्या में दंगा रोधी पुलिस बल तैनात है और प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री टस्क के खिलाफ नारे लगा रहे हैं। यह विवाद पोलैंड में एक नए बड़े संवैधानिक संकट का रूप ले चुका है।

  • ब्रिटिश हिंदू संगठन INSIGHT UK की रिपोर्ट में दावा, पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी के अनुपात में आई भारी गिरावट

    ब्रिटिश हिंदू संगठन INSIGHT UK की रिपोर्ट में दावा, पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी के अनुपात में आई भारी गिरावट

    इस्लामाबाद 

    पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदुओं की स्थिति एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा में है। ब्रिटेन स्थित प्रवासी संगठन INSIGHT UK ने ब्रिटिश संसद में एक रिपोर्ट पेश कर पाकिस्तान में हिंदुओं के कथित धार्मिक उत्पीड़न, संपत्ति पर कब्जे, जबरन धर्म परिवर्तन और महिलाओं के अपहरण जैसे गंभीर मुद्दे उठाए हैं। रिपोर्ट में ब्रिटिश सरकार (British Government) से पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों में अल्पसंख्यकों (Minority) की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की मांग की गई है।

    INSIGHT UK की यह रिपोर्ट पाकिस्तान में धार्मिक स्वतंत्रता (Religious Freedom) और अल्पसंख्यकों के अधिकारों (Rights of Minorities) को लेकर कई सवाल खड़े करती है। 

    पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी कितनी घटी?
    रिपोर्ट के मुताबिक, 1941 की जनगणना में उस क्षेत्र में हिंदुओं की आबादी लगभग 14.6 प्रतिशत थी, जो बाद में पश्चिमी पाकिस्तान बना। आज पाकिस्तान में हिंदुओं की हिस्सेदारी दो प्रतिशत से कम बताई जाती है।

    इस बदलाव के पीछे 1947 का विभाजन (Partition of India and Pakistan), बड़े पैमाने पर पलायन, समय-समय पर हुई सांप्रदायिक हिंसा (Religious Violence) और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों जैसे कई ऐतिहासिक कारण रहे हैं। रिपोर्ट का आरोप है कि हिंदू परिवारों को हिंसा और भेदभाव के कारण अपनी जमीन तथा घर छोड़ने पड़े। इसमें पुश्तैनी संपत्तियों से बेदखली की घटनाओं का भी उल्लेख किया गया है।

    15 प्रतिशत से 2 प्रतिशत रह गए हिंदू
    रिपोर्ट की शुरुआत एक ऐसे आंकड़े से होती है जो उत्पीड़न की पूरी कहानी बयां कर देता है. 1941 की भारत की जनगणना के अनुसार, उस इलाके में, जो बाद में 'पश्चिम पाकिस्तान' बना, हिंदुओं की आबादी 14.6 प्रतिशत थी. बंटवारे के बाद, यह संख्या तेजी से गिर गई. आज, पाकिस्तान की कुल आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी दो प्रतिशत से भी कम है। 

    रिपोर्ट में कहा गया है कि सात दशकों तक लगातार हुई इतनी बड़ी गिरावट, इस्लामाबाद के उस दावे पर सवाल खड़े करती है जिसमें वह कहता है कि वह अपने अल्पसंख्यकों की रक्षा करता है. इन आंकड़ों के पीछे हिंसा और आर्थिक रूप से घोंटने का एक लंबा इतिहास छिपा है। 

    रिपोर्ट में बताया गया है कि 1947 के दंगों के बाद से ही इस समुदाय को समय-समय पर हिंसा की लहरों का सामना करना पड़ा है. हजारों हिंदू परिवारों को वहां से भागना पड़ा या विस्थापित होना पड़ा. उन्हें 'एनिमी प्रॉपर्टी लॉ' (शत्रु संपत्ति कानून) जैसे कठोर कानूनों के जरिए उनकी पुश्तैनी जमीन और खेतों से बेदखल कर दिया गया. इस कदम ने पूरे समुदाय को गरीबी और हमेशा के लिए विस्थापन की स्थिति में धकेल दिया। 

    कानून भी उत्पीड़न का जरिया
    रिपोर्ट का तर्क है कि यह उत्पीड़न केवल सड़कों पर ही नहीं होता, बल्कि पाकिस्तान के कानूनों में भी दर्ज है. वहां के संविधान के अनुच्छेद 41 और 91 के अनुसार, केवल एक मुस्लिम ही राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री बन सकता है. 2019 में लाए गए एक सुधार विधेयक को रोके जाने के बाद, यह प्रावधान आज भी बिना किसी चुनौती के कायम है। 

    हर पाकिस्तानी को अपने पासपोर्ट पर अपना धर्म बताना अनिवार्य है. यहां तक कि राजधानी इस्लामाबाद में भी कोई चालू हिंदू मंदिर नहीं है. आधिकारिक अनुमति मिलने के बावजूद, इस्लामी समूहों के हिंसक विरोध के कारण 2020 में पहले मंदिर का निर्माण रोक दिया गया था, जो आज तक पूरा नहीं हो सका है। 

    इस रिपोर्ट का सबसे भयावह हिस्सा महिलाओं और लड़कियों की दुर्दशा के बारे में है. पाकिस्तान में हर साल लगभग एक हजार या उससे अधिक हिंदू और ईसाई महिलाओं और लड़कियों का अपहरण कर लिया जाता है, उन्हें जबरन इस्लाम कबूल कराया जाता है और अपहरणकर्ताओं से शादी करने के लिए मजबूर किया जाता है. मानवाधिकार संगठनों ने बार-बार इस तरह की घटनाओं को दर्ज किया है. इनमें से ज्यादातर पीड़ित गरीब परिवारों की नाबालिग लड़कियां होती हैं, जिनकी न्याय तक कोई पहुंच नहीं है। 

    ब्रिटिश सरकार से रखी यह मांग
    रिपोर्ट के अंत में, UK सरकार के सामने पांच अहम मांगें रखी गई हैं. इनमें शामिल हैं कि UK-पाकिस्तान के बीच होने वाली हर बातचीत में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को एक अनिवार्य शर्त बनाया जाए; मंदिरों की सुरक्षा और मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए समयबद्ध कदम उठाया जाए; पाकिस्तान को दी जाने वाली ब्रिटिश सहायता को मानवाधिकारों की स्थिति में सुधार से जोड़ा जाए और अल्पसंख्यक अधिकार समूहों के लिए अलग से फंड सुरक्षित की जाए. इसके साथ ही इस्लामाबाद स्थित ब्रिटिश उच्चायोग में अल्पसंख्यक समुदायों के लिए दो पद आरक्षित करना ताकि बिना किसी रुकावट या फिल्टर के अत्याचारों की रिपोर्ट मिल सके. इतना ही नहीं मांग है कि हिंदुओं, ईसाइयों, सिखों और अन्य अल्पसंख्यकों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर हर छह महीने में एक आधिकारिक रिपोर्ट प्रकाशित करने को कहा जाए और जबरन धर्म परिवर्तन तथा धार्मिक उत्पीड़न के शिकार लोगों के लिए सुरक्षित आश्रय बने। 

    रिपोर्ट में विदेश सचिव, धार्मिक स्वतंत्रता या आस्था के मामलों में प्रधानमंत्री के विशेष दूत और हिंद-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) मामलों के मंत्री से कार्रवाई करने का आग्रह किया गया है. इसमें जोर देकर कहा गया है कि धार्मिक स्वतंत्रता एक मानवाधिकार है, और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, गरिमा तथा उनके अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए। 

    पाकिस्तान को दी जाने वाली मदद पर शर्त लगाने की मांग
    INSIGHT UK ने ब्रिटिश सरकार से मांग की है कि पाकिस्तान
    को दी जाने वाली कुछ आर्थिक मदद को अल्पसंख्यकों की सुरक्षा में सुधार से जोड़ा जाए. संगठन ने अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने वाले संगठनों के लिए आर्थिक मदद अलग रखने की भी मांग की है। 

    रिपोर्ट में हर छह महीने में अल्पसंख्यक समुदायों की स्थिति का आधिकारिक आकलन करने और उत्पीड़न का सामना करने वाले धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए शरण लेने के रास्ते उपलब्ध कराने की मांग भी की गई है। 

    रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिटिश हिंदुओं से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाला संसदीय समूह इन चिंताओं को ब्रिटेन की सरकार के सामने उठाने पर विचार कर रहा है. इसके लिए विदेश मंत्रालय को पत्र लिखकर बैठक की मांग करने का विकल्प भी चर्चा में है. समूह में पाकिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक मदद कम करने के सवाल पर भी चर्चा हुई है. इस रिपोर्ट में पाकिस्तान में धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की स्थिति की अधिक निगरानी करने की मांग की गई है। 

    क्या पाकिस्तान के कानून भी भेदभाव करते हैं?
    रिपोर्ट में पाकिस्तान के संविधान (Constitution of Pakistan) के अनुच्छेद 41 और 91 का हवाला दिया गया है। इन प्रावधानों के तहत राष्ट्रपति (President) और प्रधानमंत्री (Prime Minister) के पद के लिए मुस्लिम होना आवश्यक है। इस कारण धार्मिक अल्पसंख्यकों को देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों तक पहुंचने में कानूनी बाधा का सामना करना पड़ता है।

    रिपोर्ट में हिंदू मंदिरों की स्थिति का भी जिक्र है। इसमें दावा किया गया है कि इस्लामाबाद में मंदिर निर्माण की योजना विरोध के कारण आगे नहीं बढ़ सकी। ऐसे मामले धार्मिक स्वतंत्रता और पूजा स्थलों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठाते हैं।

  • Pakistan News: बलोचिस्तान में फ्रंटियर कोर कैंप पर अटैक, BLF ने ली जिम्मेदारी; कई जवानों के घायल होने का दावा

    Pakistan News: बलोचिस्तान में फ्रंटियर कोर कैंप पर अटैक, BLF ने ली जिम्मेदारी; कई जवानों के घायल होने का दावा

    बलोचिस्तान
    पाकिस्तान के बलोचिस्तान में सैन्य कैंप पर हमले को लेकर बलोचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (BLF) ने बड़ा दावा किया है. संगठन के मुताबिक, उसकी लड़ाकू यूनिटों ने 1 अक्टूबर 2026 को वाशुक जिले के मश्केल इलाके में गोरिंदर स्थित फ्रंटियर कोर (FC) के कैंप को निशाना बनाया. BLF ने दावा किया कि इस हमले में पाकिस्तान के 18 सुरक्षाकर्मी मारे गए, जबकि कई अन्य घायल हो गए. हालांकि, इन हताहतों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। 

    BLF के मुताबिक, हमले में उसकी नई महिला यूनिट करीमा आर्म्ड असॉल्ट डिवीजन (KAAD) और वैनगार्ड क़ुरबान यूनिट ने मिलकर कार्रवाई की. संगठन का दावा है कि लड़ाकों ने कैंप को चारों तरफ से घेर लिया और रॉकेट, ग्रेनेड लॉन्चर तथा दूसरे भारी हथियारों से हमला किया। 

    संगठन के प्रवक्ता मेजर ग्वाहराम बलोच के मुताबिक, इस हमले में फ्रंटियर कोर के 18 जवान मारे गए और कई घायल हुए. BLF ने इसे अपनी संयुक्त कार्रवाई बताया है। 

    फ्रंटियर कोर के कैंप को बनाया निशाना
    हमले का निशाना फ्रंटियर कोर की 58 विंग का कैंप बताया गया है, जो बलोचिस्तान के वाशुक जिले के मश्केल इलाके में स्थित है. BLF ने हमले से जुड़ी जानकारी जारी करते हुए हताहतों का दावा किया है. हालांकि, पाकिस्तानी अधिकारियों की ओर से इस दावे की पुष्टि से जुड़ी जानकारी उपलब्ध नहीं है। 

    बलोचिस्तान में BLF पाकिस्तान के खिलाफ सशस्त्र अभियान चलाने वाले संगठनों में शामिल है. इस घटना में भी संगठन ने हमले की जिम्मेदारी ली है, लेकिन जवानों की मौत और घायलों की संख्या को लेकर उसके दावों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। 

  • इजरायल में बहुमत के बिना भी प्रधानमंत्री बने रहेंगे नेतन्याहू, जानें केयरटेकर PM के अधिकार और सीमाएं

    इजरायल में बहुमत के बिना भी प्रधानमंत्री बने रहेंगे नेतन्याहू, जानें केयरटेकर PM के अधिकार और सीमाएं

    तेल अवीव

    इजरायल में हुए चुनाव में किसी भी दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है. प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी सबसे बड़ा दल बनकर उभरी है. मंगलवार को हुए चुनाव में नेतन्याहू की अगुवाई वाले दक्षिणपंथी गठबंधन को बहुमत नहीं मिला. विपक्षी गठबंधन भी सरकार बनाने के लिए जरूरी आंकड़े से पीछे है. ऐसे में नई सरकार के गठन तक नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहेंगे. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस दौरान वह ईरान के खिलाफ फिर से युद्ध छेड़ने का फैसला ले सकते हैं?

    इस सवाल का जवाब इजरायल की राजनीतिक व्यवस्था और कार्यवाहक सरकार की शक्तियों में छिपा है. इंटरनेशनल समाचार एजेंसी रायटर ने विशेषज्ञों के हवाले से लिखा है कि कार्यवाहक प्रधानमंत्री होने का मतलब यह नहीं है कि नेतन्याहू के अधिकार खत्म हो जाएंगे. कानून के तहत कार्यवाहक सरकार के पास नियमित सरकार जैसी शक्तियां होती हैं. हालांकि, उससे कुछ मामलों में संयम बरतने की अपेक्षा की जाती है। 

    नेतन्याहू बहुमत से दूर, सत्ता से बाहर नहीं
    इजरायल की संसद को नेसेट कहा जाता है. इसमें कुल 120 सीटें हैं. सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है. सभी सीटों के नतीजे आ गए हैं. नेतन्याहू के गठबंधन को 53 सीटें मिली हैं. उनके प्रतिद्वंद्वी और पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें मिली हैं. अरब दलों के खाते में 19 सीटें गई हैं. यानी दोनों प्रमुख गठबंधन बहुमत से दूर हैं. अरब दलों का समर्थन सरकार बनाने की कोशिशों में अहम हो सकता है. हालांकि, विपक्ष के सामने मुश्किल यह है कि उसके कई नेता अरब दलों के साथ मिलकर सरकार बनाने को लेकर सहज नहीं हैं। 

    नेतन्याहू के लिए भी रास्ता आसान नहीं है. उन्हें अपने गठबंधन के बाहर से समर्थन जुटाना होगा या विरोधी खेमे के कुछ दलों को साथ लाने की कोशिश करनी होगी. एक विकल्प राष्ट्रीय सरकार बनाने का भी हो सकता है. जब तक नई सरकार नहीं बनती, नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री के तौर पर काम करते रहेंगे. अगर सरकार गठन की कोशिशें नाकाम रहती हैं और दोबारा चुनाव की नौबत आती है, तो भी उनके कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहने की संभावना है। 

    क्या कार्यवाहक पीएम रहते ईरान पर हमला कर सकते हैं?
    यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे संवेदनशील पहलू है. इजरायल के विशेषज्ञों के मुताबिक कार्यवाहक सरकार की शक्तियां नियमित सरकार से बहुत अलग नहीं होतीं. लेकिन उसे बड़े नीतिगत फैसले लेने में संयम बरतना चाहिए. नियुक्तियों और कुछ दूरगामी फैसलों पर उसकी स्वतंत्रता सीमित हो सकती है. हालांकि, राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में स्थिति अलग हो सकती है. अगर सरकार के सामने कोई गंभीर सुरक्षा संकट हो या तत्काल कार्रवाई की जरूरत पड़े तो वह फैसले ले सकती है। 

    रायटर ने इजरायल डेमोक्रेसी इंस्टीट्यूट के शोधकर्ता गाइ लूरी के हवाले से लिखा है कि कानून के लिहाज से कार्यवाहक सरकार के पास नियमित सरकार जैसी शक्तियां होती हैं. लेकिन उसे कुछ मामलों में संयम बरतना होता है। 

    इसी तरह, तेल अवीव स्थित तच्लित इंस्टीट्यूट के शोधकर्ता ओर आशेर का कहना है कि सुरक्षा से जुड़े मामलों में कार्यवाहक सरकार को अधिक गुंजाइश मिल सकती है. इजरायल का सुप्रीम कोर्ट भी पहले यह स्पष्ट कर चुका है कि कार्यवाहक सरकार को दूरगामी फैसलों से बचना चाहिए, जब तक कि कोई जरूरी परिस्थिति ऐसे फैसले को उचित न ठहराए। 

    इसका मतलब है कि नेतन्याहू के पास ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का फैसला लेने का कानूनी रास्ता पूरी तरह बंद नहीं होगा. हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि वह बिना किसी सीमा या जवाबदेही के कोई भी फैसला ले सकते हैं। 

    युद्ध के फैसले पर संसद की निगरानी
    युद्ध का फैसला केवल प्रधानमंत्री की राजनीतिक मंशा का मामला नहीं है. इसमें सुरक्षा जरूरतों, सरकारी निर्णय प्रक्रिया और संस्थागत निगरानी की भी भूमिका होती है. इजरायल में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक रूप से युद्ध में जाने के फैसलों में हस्तक्षेप करने से परहेज किया है. इसके अलावा नई संसद के गठन और उसकी समितियों के सक्रिय होने के बीच निगरानी की व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है। 

    ऐसे में कार्यवाहक प्रधानमंत्री के पास राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसले लेने की पर्याप्त गुंजाइश रह सकती है. विशेषज्ञों के मुताबिक कानूनी तौर पर नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहते हुए भी ईरान के खिलाफ युद्ध का फैसला ले सकते हैं. लेकिन यहां एक अहम अंतर समझना जरूरी है. किसी फैसले को लेने का कानूनी अधिकार होना और उस फैसले का राजनीतिक रूप से उचित होना दो अलग बातें हैं। 

    विपक्ष को डर, सुरक्षा का इस्तेमाल राजनीति के लिए न हो
    नेतन्याहू के सामने केवल सरकार बनाने की चुनौती नहीं है. उनके राजनीतिक विरोधियों को आशंका है कि वह सुरक्षा से जुड़े मुद्दों का इस्तेमाल अपने राजनीतिक हितों के लिए कर सकते हैं. पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट ने भी चेतावनी दी है कि नेतन्याहू सुरक्षा के सवालों को राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल न करें. वहीं, नेतन्याहू का कार्यालय पहले भी उन आरोपों को खारिज कर चुका है कि वह ईरान संघर्ष का इस्तेमाल राजनीतिक फायदे के लिए कर रहे हैं। 

    ऐसे में अगर ईरान के साथ तनाव बढ़ता है, तो नेतन्याहू के सामने दो तरह की चुनौती होगी. एक तरफ देश की सुरक्षा से जुड़े फैसले लेने का सवाल होगा, दूसरी तरफ यह साबित करने की चुनौती होगी कि उनके फैसले राजनीतिक मजबूरी से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरतों से प्रेरित हैं। 

    अब आगे क्या होगा?

    इजरायल के राष्ट्रपति इसाक हर्जोग राजनीतिक दलों के नेताओं से विचार-विमर्श करेंगे. इसके बाद वह उस उम्मीदवार को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं, जिसके पास बहुमत जुटाने की सबसे बेहतर संभावना होगी. इसके बाद सरकार बनाने के लिए निर्धारित समयसीमा के भीतर गठबंधन तैयार करना होगा. इस प्रक्रिया में कई सप्ताह लग सकते हैं. अगर कोई भी पक्ष बहुमत जुटाने में नाकाम रहता है, तो राजनीतिक गतिरोध और गहरा सकता है। 

    इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम बात यह है कि चुनाव में बहुमत नहीं मिलने के बावजूद नेतन्याहू की सत्ता तत्काल समाप्त नहीं होगी. वह कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में देश की कमान संभालते रह सकते हैं. और अगर ईरान के साथ सैन्य टकराव की स्थिति बनती है, तो कार्यवाहक होने के बावजूद उनके पास कार्रवाई का फैसला लेने की कानूनी गुंजाइश रह सकती है। 

     

  • अमेरिका-ईरान तनाव फिर बढ़ने के आसार, ट्रंप के आदेश पर 4 दिन में हो सकती है सैन्य कार्रवाई!

    अमेरिका-ईरान तनाव फिर बढ़ने के आसार, ट्रंप के आदेश पर 4 दिन में हो सकती है सैन्य कार्रवाई!

    वाशिंगटन

    अमेरिका ईरान पर बड़े हमले की तैयारी कर रहा है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश के 96 घंटे यानी चार दिनों के अंदर अमेरिकी सेना हमला शुरू कर सकती है. 26 अक्टूबर 2026 को सामने आई इस रिपोर्ट में दो अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से यह दावा किया गया है. अमेरिका के पास हमले के लिए जरूरी सैन्य ताकत मौजूद है. संभावित हमले में ईरान के रडार, मिसाइल लॉन्चर और दूसरे सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया जा सकता है। 

    अभी ट्रंप ने हमले का अंतिम आदेश नहीं दिया है. कुछ अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि ट्रंप साल के अंत से पहले हमले की मंजूरी दे सकते हैं. इसके लिए 3 नवंबर को होने वाले अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के बाद का समय अहम माना जा रहा है. इस बीच, इजरायल भी ईरान के खिलाफ अमेरिका के अगले कदम पर नजर रख रहा है। 

    किन ठिकानों पर हमला कर सकता है अमेरिका?
    रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका की योजना में ईरान के कई सैन्य ठिकाने शामिल हैं. इनमें रडार सिस्टम, मिसाइल लॉन्चर और दूसरे जरूरी सैन्य ठिकाने हो सकते हैं. इसके अलावा, ईरान के ऊर्जा से जुड़े ठिकानों और परमाणु केंद्रों को भी संभावित निशाने के तौर पर देखा जा रहा है। 

    रडार की मदद से दुश्मन के विमानों और दूसरी सैन्य गतिविधियों का पता लगाया जाता है. वहीं, मिसाइल लॉन्चर से मिसाइलें दागी जाती हैं. अगर इन ठिकानों पर हमला होता है, तो ईरान की निगरानी करने और जवाबी हमला करने की ताकत पर असर पड़ सकता है. हालांकि, अभी यह साफ नहीं है कि अमेरिका किन ठिकानों पर हमला करेगा। 

    3 नवंबर के चुनाव के बाद बढ़ सकता है तनाव
    रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि ट्रंप साल 2026 के अंत से पहले ईरान पर हमले का आदेश दे सकते हैं. लेकिन यह सिर्फ अधिकारियों का अनुमान है. हमले की कोई तय तारीख सामने नहीं आई है. अमेरिका में 3 नवंबर को मिडटर्म चुनाव होने हैं. इन चुनावों में अमेरिकी संसद के कई सदस्यों को चुना जाता है. रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ अधिकारियों को लगता है कि चुनाव के बाद ईरान पर हमले को लेकर फैसला हो सकता है. हालांकि, ट्रंप क्या फैसला लेंगे, यह अभी साफ नहीं है। 

    इजरायल भी रख रहा नजर
    ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच इजरायल की भूमिका भी अहम हो सकती है. रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल के कुछ अधिकारी चुनाव के बाद ईरान के साथ सैन्य टकराव की आशंका जता रहे हैं. अगर ट्रंप हमले की मंजूरी देते हैं, तो इजरायल भी अपनी सैन्य कार्रवाई कर सकता है। 

    दोनों देशों की ओर से किसी संयुक्त हमले की अंतिम घोषणा नहीं हुई है. अगर अमेरिका और इजरायल ईरान पर हमला करते हैं, तो पूरे मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ सकता है. ईरान जवाबी कार्रवाई में अमेरिकी सैनिकों और क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बना सकता है. इससे संघर्ष और बढ़ने का खतरा रहेगा। 

    फिलहाल, अमेरिकी सेना की तैयारी और हमले का अंतिम फैसला अलग-अलग बातें हैं. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आदेश मिलने पर अमेरिकी सेना 96 घंटे के अंदर कार्रवाई कर सकती है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हमला जरूर होगा. अब सबकी नजर ट्रंप के अगले कदम पर है. अगर अमेरिका हमला करता है, तो ईरान की प्रतिक्रिया और इजरायल की भूमिका से पूरे मिडिल ईस्ट की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। 

  • अंतरिक्ष में चीन की रहस्यमयी उड़ान, खुले दरवाजे और जुड़े सैटेलाइट की तस्वीर से बढ़ी दुनिया की दिलचस्पी

    अंतरिक्ष में चीन की रहस्यमयी उड़ान, खुले दरवाजे और जुड़े सैटेलाइट की तस्वीर से बढ़ी दुनिया की दिलचस्पी

    वाशिंगटन

    अंतरिक्ष में चीन के एक गुप्त विमान की साफ तस्वीर सामने आई है. अमेरिका की डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (डीआईए) ने अपनी नई रिपोर्ट में यह तस्वीर जारी की है. इसे 28 मई 2024 को अमेरिकी कंपनी वैंटोर के वर्ल्डव्यू-3 सैटेलाइट ने लिया था. चीन के इस विमान का डिजाइन अमेरिका के X-37B स्पेसप्लेन जैसा है. यह ऐसा विमान है, जो अंतरिक्ष में जाने के बाद वापस धरती पर उतर सकता है. हालांकि, चीन इस विमान का इस्तेमाल किस काम के लिए कर रहा है, इसकी पूरी जानकारी अभी सामने नहीं आई है। 

    तस्वीर में विमान के पंख, पीछे के दो खड़े हिस्से और सोलर पैनल दिखाई दे रहे हैं. इसके बीच में सामान रखने की जगह है, जिसके दरवाजे खुले हुए हैं. विमान के पिछले हिस्से में एक अलग सैटेलाइट भी जुड़ा हुआ दिखाई देता है. चीन 2020 से अब तक इस तरह के स्पेसप्लेन के चार मिशन लॉन्च कर चुका है. इसका सबसे नया मिशन 7 फरवरी 2026 को लॉन्च किया गया था। 

    तस्वीर में चीन का स्पेसप्लेन छोटे स्पेस शटल जैसा दिखता है. इसके छोटे पंख हैं. पीछे की तरफ दो खड़े हिस्से हैं. बीच में सामान रखने की जगह बनी है. इसके दरवाजे ऊपर खुलते हैं. विमान के पिछले हिस्से में अलग ढांचा भी लगा है, जिसके दोनों तरफ सोलर पैनल हैं। 

    वैंटोर के मुताबिक, यह तस्वीर 28 मई 2024 को ली गई थी. उस समय सैटेलाइट और विमान के बीच करीब 90 किलोमीटर की दूरी थी. तस्वीर में विमान के खुले दरवाजे और उससे जुड़ा सैटेलाइट दिखाई दे रहा है. लेकिन यह साफ नहीं है कि विमान के अंदर क्या रखा था। 

    अमेरिका के X-37B जैसा है विमान
    चीन के इस स्पेसप्लेन का डिजाइन अमेरिका के X-37B से काफी मिलता है. इस विमान का इस्तेमाल अमेरिकी स्पेस फोर्स करती है. दोनों विमानों को अंतरिक्ष में भेजा जा सकता है और मिशन पूरा होने के बाद ये वापस धरती पर उतर सकते हैं. X-37B के अब तक आठ मिशन हो चुके हैं. इसका आठवां मिशन 22 अगस्त 2025 को लॉन्च किया गया था. अमेरिका और चीन दोनों अपने इन विमानों से जुड़े कई राज सार्वजनिक नहीं करते हैं। 

    चीन अब तक चार मिशन लॉन्च कर चुका है
    चीन ने 2020 से अब तक इस स्पेसप्लेन के चार मिशन लॉन्च किए हैं. इसका पहला मिशन सितंबर 2020 में शुरू हुआ था. इसके बाद 2022 और दिसंबर 2023 में भी इसे अंतरिक्ष में भेजा गया. इसका चौथा मिशन 7 फरवरी 2026 को लॉन्च किया गया था. 28 अक्टूबर 2026 तक उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, यह विमान अभी तक धरती पर वापस नहीं लौटा था। 

    दिसंबर 2023 से सितंबर 2024 तक चले तीसरे मिशन के दौरान इस विमान को अंतरिक्ष में कई छोटी चीजें छोड़ते हुए देखा गया था. इस साल भी इसके मिशन के दौरान कम से कम एक दूसरी चीज छोड़े जाने की जानकारी सामने आई है. हालांकि, ये चीजें क्या थीं और इनका इस्तेमाल किस काम के लिए किया गया, यह अभी साफ नहीं है। 

    शेनलोंग और टेंगयुन पर भी काम कर रहा चीन
    अमेरिकी एजेंसी की रिपोर्ट में चीन के दो स्पेसप्लेन मॉडल शेनलोंग और टेंगयुन का जिक्र है. लेकिन रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया कि तस्वीर में दिख रहा विमान इनमें से कौन सा है. चीन के इस विमान को आमतौर पर शेनलोंग के नाम से जाना जाता है. इसके अलावा, चीन हाओलोंग नाम के एक और स्पेसप्लेन पर काम कर रहा है. इसे चीन के तियांगोंग अंतरिक्ष स्टेशन तक सामान पहुंचाने के लिए बनाया जा रहा है। 

    अंतरिक्ष में क्या काम आते हैं ऐसे विमान?
    ऐसे विमानों की मदद से सैटेलाइट को अंतरिक्ष में पहुंचाया जा सकता है. इनका इस्तेमाल नई तकनीक की जांच करने और दूसरी चीजों को अंतरिक्ष में ले जाने के लिए भी किया जा सकता है. ये अपना रास्ता बदल सकते हैं और दूसरी अंतरिक्ष वस्तुओं के करीब भी जा सकते हैं। 

    इनका इस्तेमाल वैज्ञानिक कामों के अलावा सैन्य गतिविधियों और खुफिया जानकारी जुटाने में भी हो सकता है. हालांकि, अभी तक ऐसा कोई पक्का सबूत सामने नहीं आया है कि चीन इस स्पेसप्लेन का इस्तेमाल हथियार के तौर पर कर रहा है. चीन के इस विमान की नई तस्वीर से उसके डिजाइन के बारे में ज्यादा जानकारी मिली है. लेकिन यह विमान अंतरिक्ष में क्या काम कर रहा है. इसका असली मकसद क्या है, इन सवालों के जवाब अभी नहीं मिले हैं।