Category: विदेश

  • ढाका में फिर भड़की हिंसा, वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर मजदूरों का प्रदर्शन; 500 फैक्ट्रियां बंद

    ढाका में फिर भड़की हिंसा, वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर मजदूरों का प्रदर्शन; 500 फैक्ट्रियां बंद

    ढाका

    बांग्लादेश एक बार फिर से उबल पड़ा है. लगभग 28 महीनों के बाद लोग सड़क पर हैं. पुलिसकर्मियों पर हमले कर रहे हैं, आगजनी और पत्थरबाजी हो रही है. देश की कई सड़के बंद हैं, लेकिन इस बार प्रदर्शन की वजह सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि कम मजदूरी है. इस बार बांग्लादेश के कपड़ा मजदूर सड़क पर हैं और सैलरी बढ़ाने की मांग कर रहे हैं. इससे पहले जुलाई 2024 में बांग्लादेश में शेख हसीना के खिलाफ प्रदर्शन हो रहा था। 

    लेकिन ये प्रदर्शन आंदोलन की तरह हो रहा है. कपड़ा मजदूर सड़कों पर निकल रहे हैं, गाड़ियां और दुकानें बंद कर रहे हैं और विरोध करने पर हिंसक हो जा रहे हैं। 

    ये प्रदर्शन 31 अक्तूबर को शुरू हुए. मजदूरों ने ढाका (मिरपुर), आशुलिया, सावर, गाजीपुर जैसे औद्योगिक इलाकों में सड़कें जाम कर दी और गारमेंट फैक्ट्रियों को बंद कर दिया. प्रदर्शन और हड़ताल की वजह से लगभग 529 कारखाने प्रभावित हुए और करीब 10 लाख श्रमिक प्रभावित हुए।

    कुछ जगहों पर हिंसा, आगजनी (पुलिस बॉक्स/वाहन) और तोड़फोड़ भी हुई. पुलिस ने आंसू गैस, पानी की बौछार और साउंड ग्रेनेड का इस्तेमाल किया. कुछ इलाकों में BGB भी तैनात किया गया। 

    सोमवार को उम्मीद थी कि काम फिर से शुरू होगा लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। 

    सोमवार को मजदूर फिर से सड़क पर आ गए. राजधानी ढाका के मिरपुर में कई गलियो में प्रदर्शन चल रहा है. मजदूर सड़कों पर हैं, कई जगहों पर टकराव की नौबत है। 

    बांग्लादेश के अंग्रेजी अखबार प्रथम आलो ने रिपोर्ट किया है कि आज सोमवार को सुबह लगभग 10:45 बजे, मीरपुर-10 के सेनपारा परबटा इलाके में कुछ मजदूर एक गली से निकलकर मुख्य सड़क पर आने की कोशिश कर रहे थे. पुलिस ने उन्हें तितर-बितर करने के लिए खदेड़ा और आंसू गैस के कई गोले दागे। 

    बाद में मीरपुर-2 में स्टेडियम के पास प्रोशिका चौराहे पर भी मजदूरों ने सड़क पर उतरने की कोशिश की. पुलिस ने उन्हें वहां से हटा दिया। 

    प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि मजदूर रूपनगर इलाके से छोटे-छोटे समूहों में आ रहे थे और मीरपुर-2 में स्टेडियम के पास से होते हुए प्रोशिका की ओर बढ़ रहे थे। 

    स्थिति अभी तनावपूर्ण बनी है. मिरपुर में मेट्रो सेवाएं प्रभावित हुई है. 

    12 हजार टका में जिंदगी गुजारने की चुनौती

    बांग्लादेश के कपड़ा मजदूर न्यूनतम 30000 टका मजदूरी की मांग कर रहे हैं. इस वक्त उन्हें 12 हजार टका ही मिल रहा है. मजदूरों का कहना है कि महंगाई और बढ़ती जीवन लागत (भोजन, आवास/किराया, परिवहन और स्वास्थ्य सेवा) ने उनकी क्रय शक्ति काफी घटा दी है. मौजूदा वेतन से परिवार चलाना मुश्किल हो गया है. बांग्लादेश के गार्मेंट सेक्टर में दुनिया में सबसे कम मजदूरियां मानी जाती हैं। 

    आवामी लीग पर आरोप 
    बांग्लादेश में गारमेंट इंडस्ट्री में जारी अशांति के पीछे सरकार ने अपदस्थ शेख हसीना सरकार से जुड़े उद्योगपतियों का हाथ होने का आरोप लगाया है. बांग्लादेश के अखबार द डेली स्टार के अनुसार गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद ने 2 नवंबर को कहा कि आवामी लीग से जुड़े कुछ फैक्ट्री मालिक, पूर्व सांसद, मंत्री और राज्य मंत्री कपड़ा उद्योग में अस्थिरता भड़का रहे हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि अपदस्थ सरकार के समर्थक मजदूरों को उकसाकर हाईवे जाम, आगजनी और हिंसा करा रहे हैं. सरकार के पास इन घटनाओं से जुड़े वीडियो और ऑडियो सबूत भी हैं. मंत्री के मुताबिक, कुछ फैक्ट्री मालिकों ने जानबूझकर अपने कारखाने बंद किए ताकि हालात और बिगड़ें। 

    एक की रिपोर्ट के मुताबिक, अशांति के बीच मीरपुर, सावर-अशुलिया, गाजीपुर और मैमनसिंह में कम से कम 529 कपड़ा फैक्ट्रियों ने छुट्टी घोषित कर दी थी. सरकार ने अब न्यूनतम वेतन तय करने के लिए वेतन बोर्ड गठित किया है। 

    अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है गारमेंट इंडस्ट्री
    बांग्लादेश की गारमेंट इंडस्ट्री उसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है. रेडीमेड गारमेंट सेक्टर देश के सबसे बड़े निर्यात उद्योगों में शामिल है और विदेशी मुद्रा कमाने का सबसे बड़ा जरिया है. बांग्लादेश दुनिया के प्रमुख कपड़ा निर्यातकों में शामिल है और यूरोप, अमेरिका समेत कई बड़े बाजारों में उसके बने कपड़ों की भारी मांग है. यहां की फैक्ट्रियों में टी-शर्ट, शर्ट, ट्राउजर, जींस, जैकेट और दूसरे रेडीमेड कपड़े तैयार किए जाते हैं. इस उद्योग में लाखों लोग काम करते हैं, जिनमें बड़ी संख्या महिलाओं की है। 

    2024-25 में इस सेक्टर से करीब 39.35 अरब डॉलर का निर्यात हुआ, जो देश के कुल निर्यात का 81 फीसदी से अधिक था. बांग्लादेश दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रेडीमेड गारमेंट निर्यातक है और इस मामले में चीन के बाद उसका स्थान है. हालांकि, यह उद्योग कई चुनौतियों से भी जूझ रहा है. मजदूरों की कम मजदूरी, कामकाज की खराब परिस्थितियां, वेतन बढ़ाने की मांग और फैक्ट्रियों में हड़ताल जैसे मुद्दे अक्सर सामने आते हैं। 

     

  • अमेरिका-ईरान समझौते की उम्मीद तेज, होर्मुज को लेकर ईरान का नया प्रस्ताव सामने आया

    वाशिंगटन

    अमेरिका के साथ जंग खत्म करने को लेकर ईरान और कतर के बीच चल रही कूटनीतिक बातचीत में नया मोड़ आया है. ईरानी वार्ताकार रविवार को दोहा से लौट गए हैं. हालांकि, बातचीत से जुड़े एक अधिकारी ने सोमवार को बताया कि वार्ताकारों के लौटने की वजह बातचीत में आई कोई मुश्किल नहीं थी. इस बीच समझौते के लिए एक ड्राफ्ट प्रस्ताव साझा किया जा रहा है और आगे की बैठक भी हो सकती है. इस बीच अब्बास अराघची ने कहा कि होर्मुज दो दिन की बजाय सात दिन में खुल जाएगा। 

    अधिकारी ने ड्राफ्ट प्रस्ताव की विस्तृत जानकारी नहीं दी. वहीं, ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने बताया कि बातचीत का आधार सितंबर में ईरान की ओर से तैयार किया गया सात चरणों वाला प्लान है. इसका मकसद होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलना और ईरान पर लगी अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी खत्म करना है. तेहरान अब इस प्रस्ताव को समझौते के तहत पहले से कम समय में लागू करने की बात कह रहा है। 

    ईरान ने रखीं अपनी शर्तें

    ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता बघाई ने बताया कि उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी संदेशों के आदान-प्रदान में मदद के लिए दोहा में थे. कतर के मध्यस्थों के जरिए अमेरिका तक ईरान का संदेश पहुंचाया जा रहा था। 

    बघाई ने कहा कि ईरान की मांगें बिल्कुल साफ हैं. अमेरिका की नौसैनिक नाकेबंदी खत्म किए बिना, ईरान की मांगों का सम्मान किए बिना और उसकी जायज जरूरतों को पूरा किए बिना कोई अंतिम समझौता नहीं हो सकता. उन्होंने यह भी कहा कि इन शर्तों के पूरा हुए बिना होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलना या सुरक्षित बनाना संभव नहीं है।
     
    7 दिन के बजाय 2 दिन में खुल सकता है होर्मुज स्ट्रेट
    शनिवार को कतर के न्यूज चैनल अल जजीरा ने ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के हवाले से बताया था कि समझौता होने पर होर्मुज स्ट्रेट को सात दिन के बजाय दो दिन के भीतर खोला जा सकता है. ईरान के शुरुआती प्रस्ताव को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही खारिज कर चुके हैं। 

    अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के बाद बढ़ सकता है तनाव
    बातचीत का यह दौर ऐसे समय में हो रहा है, जब अमेरिका में मंगलवार को होने वाले मिडटर्म चुनाव के बाद जंग फिर तेज होने की आशंका जताई जा रही है. ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता से जब चुनाव को लेकर तेहरान के रुख के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि ईरान को उम्मीद नहीं है कि इन चुनावों से अमेरिका कोई नया देश बन जाएगा। 

    ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका चुनाव से पहले ईरान पर कोई नया हमला नहीं करेगा. उन्होंने यह भी दावा किया है कि तेहरान के साथ बातचीत अच्छी चल रही है. हालांकि, ट्रंप ने आगे सैन्य कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया है। 

  • अमेरिका-इजरायल की मदद करने का आरोप, ईरान ने ब्रिटिश सेना और खुफिया एजेंसी MI6 पर लगाया प्रतिबंध

    अमेरिका-इजरायल की मदद करने का आरोप, ईरान ने ब्रिटिश सेना और खुफिया एजेंसी MI6 पर लगाया प्रतिबंध

     तेहरान
    ईरान और ब्रिटेन के बीच लगातार बढ़ता जा रहा है। ईरान ने ब्रिटेन की रॉयल नेवी (नौसेना), रॉयर एयर फोर्स (वायु सेना) और उसकी विदेशी खुफिया एजेंसी M16 के खिलाफ एक कड़ा फैसला लिया है।ईराने ने ब्रिटेन की सेना को आतंकवादी संगठन और खुफिया एजेंसी M16 को शत्रुतापूर्ण समूह करार दिया है।

    मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के विदेश मंत्रालय ने रविवार को इन कदमों का एलान किया। इस फैसले के बाद अब ब्रिटेन का पूरा सैन्य और खुफिया तंत्र ईरानी सुरक्षा कानूनों के दायरे में आ गया है।

    ब्रिटेन पर लगाए गंभीर आरोप
    ईरान के विदेश मंत्रालय ने ब्रिटेन पर आरोप लगाया है कि वह अपने सैन्य अड्डो और लॉजिस्टिक सुविधाओं का इस्तेमाल करके तेहरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल के सैन्य अभियानों में मदद कर रहा है। ईरान का कहना है कि ब्रिटेन की ये हरकतें अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन हैं।

    ईरान की यह जवाबी कार्रवाई ब्रिटेन के उस फैसले के बाद आई है, जिसमें उसने जुलाई में ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स को अपने स्टेट थ्रेट्स एक्ट के दायरे में लाया था। ईरान ने इसे अपने खिलाफ एक शत्रुतापूर्ण कदम बताया था।

    ईरान ने बताया पारंपरिक सिद्धांत
    अपने इस फैसले का बचाव करते हुए ईरानी मंत्रालय ने कहा कि यह कदम पारस्परिकता के सिद्धांत और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत उठाया गया है। ईरान ने चेतावनी दी है कि इस फैसले के जो भी परिणाम होंगे, उसके लिए सीधे तौर पर ब्रिटिश सरकार जिम्मेदार होगी।

    एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस घटनाक्रम से दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव और गहरा सकता है, क्योंकि ईरान ने अपनी इस कार्रवाई का दायरा केवल ब्रिटेन की पारंपरिक सेना तक सीमित न रखकर उसकी खुफिया एजेंसी तक बढ़ा दिया है।

    क्या है M16?
    M16 (सीक्रेट इंटेलिजेंस सर्विस-SIS) ब्रिटेन की विदेशी खुफिया एजेंसी है। इसका मुख्य काम विदेश से जुड़ी खुफिया जानकारियां जुटाना, आंतकवादी नेटवर्कों और जासूसू गतिविधियों पर नजर रखना और देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए संभावित खतरों की पहचान कर ब्रिटिश सरकार को सतर्क करना है।

     

  • हाइडी क्लम ने मनाई हैलोवीन पार्टी की 25वीं सालगिरह, इस बार अपने ही कटे हाथ का बनाया रूप

    हाइडी क्लम ने मनाई हैलोवीन पार्टी की 25वीं सालगिरह, इस बार अपने ही कटे हाथ का बनाया रूप

    न्यूयॉर्क
    'हैलोवीन की रानी' के नाम से मशहूर सुपरमॉडल हाइडी क्लम ने इस साल न्यूयॉर्क शहर में अपनी प्रसिद्ध हैलोवीन पार्टी की 25वीं सालगिरह मनाई।

    हर साल अपने अनोखे और शानदार अंदाज से सुर्खियां बटोरने वाली क्लम ने इस बार कुछ ऐसा किया, जो पहले कभी नहीं देखा गया था। इस बार वे एक कटे हुए हाथ के रूप में रेड कार्पेट पर उतरीं, जिसे देखकर हर कोई हैरान रह गया।

    खतरनाक ट्रक से उतरीं 'हैलोवीन क्वीन'
    हाइडी क्लम एक ऐसे ट्रक से कार्यक्रम स्थल पर पहुंचीं, जिस पर लाल रंग से डेंजर लिखा हुआ था। पीले रंग का हैजमैट सूट पहने कलाकारों ने उन्हें ट्रक से उतरने में मदद की। उनके इस अनोखे कॉस्ट्यूम में खून से सनी कलाई और हाथ के बीचों-बीच उनका चेहरा नजर आ रहा था।

    खास बात यह थी कि कटे हुए हाथ की उंगलियों में अंगूठियां थीं और नाखूनों पर एकदम ताजा मैनीक्योर किया हुआ था। उन्होंने बताया कि यह उनके अपने ही हाथ का बेहद बारीकी से तैयार किया गया रूप है। हालांकि, इस बार उनके पति टॉम कौलिट्ज़ उनके साथ नजर नहीं आए।

    स्पेशल इफेक्ट्स मेकअप का कमाल
    यह पार्टी मॉक्सी ईस्ट विलेज के कैथेड्रल रेस्टोरेंट में आयोजित की गई थी। हाइडी क्लम अपने इन अद्भुत कॉस्ट्यूम्स के लिए स्पेशल इफेक्ट्स मेकअप डिजाइनर माइक मैरिनो के साथ काम करती हैं। मैरिनो ने बताया कि इस साल का कॉस्ट्यूम उनके अब तक के सबसे जटिल प्रोजेक्ट्स में से एक था, जिसे तैयार करना एक बड़ी चुनौती थी।

    इससे पहले क्लम ने इंस्टाग्राम पर इस कॉस्ट्यूम की झलकियां शेयर की थीं। बता दें कि क्लम पिछले कई सालों में मेडुसा, ई.टी., मोर, श्रेक की फियोना और एक विशाल कीड़े जैसे कई हैरान करने वाले लुक्स में नजर आ चुकी हैं।

  • ईरान का ट्रंप को नया प्रस्ताव, प्रतिबंध हटाने और फ्रीज फंड जारी करने पर खुलेगा होर्मुज

    ईरान का ट्रंप को नया प्रस्ताव, प्रतिबंध हटाने और फ्रीज फंड जारी करने पर खुलेगा होर्मुज

    तेहरान
    ईरान ने एक बार फिर होर्मुज स्ट्रेट खोलने का प्रस्ताव अमेरिका को दिया है। ईरान और कतर ने बातचीत के जरिए अमेरिका को शर्तें मानकर दो दिन के भीतर होर्मुज खोलने का ऑफर दिया है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि कतरी मध्यस्थों के साथ बातचीत के बाद तय किया गया है कि अगर अमेरिका तेहरान की शर्तें मान लेता है तो दो दिन में होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) को फिर से खोल दिया जाएगा। फिलहाल अमेरिका की ओर से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। प्रपोजल पर डोनाल्ड ट्रंप को फैसला लेना है।

    अल जजीरा के मुताबिक, अराघची ने बताया कि कतर के साथ चर्चा के बाद होर्मुज खोलने के लिए प्रस्तावित समय-सीमा को पांच से घटाकर दो दिन किया गया है। ईरानी वार्ताकारों ने शनिवार को दोहा में कतरी मध्यस्थों के साथ बातचीत की है। कतर में यह बातचीत शुक्रवार को तेहरान में ईरानी और कतरी प्रतिनिधियों के बीच 12 घंटे की चर्चा के बाद हुई है। इस दौरान वॉशिंगटन के साथ भी संपर्क रखा गया।

    कतरी पक्ष ने ईरानी प्रस्ताव के कार्यान्वयन की अवधि को घटाकर पांच दिन करने का सुझाव दिया था। अब हम एक ऐसे प्रस्ताव पर पहुंच गए हैं, जिसमें इस अवधि को घटाकर दो दिन कर दिया गया है।

    क्या हैं ईरान की शर्तें
    तेहरान की मांगों के बारे में बताते हुए ईरानी विदेश मंत्री ने कहा कि इनमें इस्लामाबाद मेमोरेंडम के बाद लगाए गए प्रतिबंधों को हटाना, क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य बलों की संख्या कम करना, तेल छूट (ऑयल वेवर्स) को बहाल करना और ईरान के फ्रीज किए गए फंड को जारी करना शामिल है। हम तेल छूट की बहाली और अपने सभी फ्रीज किए गए फंड को जारी करने की मांग करते हैं, जिसमें कतर में मौजूद फंड भी शामिल हैं।

    अराघची ने आगे कहा कि हमारी शर्तों में इस्लामाबाद मेमोरेंडम के बाद लगाए गए प्रतिबंधों को हटाना और क्षेत्र में अमेरिकी बलों की संख्या कम करना शामिल है। उन्होंने कहा, 'ईरान चाहता है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में उन शिपिंग मार्गों को मान्यता दी जाए, जिन पर तेहरान ने ओमान के साथ चर्चा की थी। साथ ही अन्य मार्गों को बंद कर दिया जाए। हमारी शर्तों के अनुसार होर्मुज को फिर से खोलने से और वाशिंगटन के साथ लंबित मुद्दों पर बातचीत शुरू करने का रास्ता साफ हो जाएगा।'

    ईरान का पीछे हटने से इनकार
    ईरान का यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है, जब वाशिंगटन और तेहरान के बीच बातचीत के संभावित ढांचे को लेकर राजनयिक स्तर पर चर्चा चल रही है। ईरान का जोर इस बात पर है कि शांति वार्ता शुरू होने और होर्मुज जलडमरूमध्य के फिर से खुलने से पहले अमेरिका को उसकी शर्तें माननी होंगी। ईरान अपने रुख पर अड़ा है तो अमेरिका ने फिर से हमले शुरू करने के संकेत दिए हैं।

    ईरान के शीर्ष सुरक्षा अधिकारी मोहसेन रजई ने इससे पहले होर्मुज खोलने के लिए ईरान की ओर से सात शर्तें अमेरिका की ओर से रखी थीं। उन्होंने कहा था कि ये शर्तें 'इस्लामाबाद वार्ता' के ढांचे से पूरी तरह अलग हैं। उनके अनुसार ये मांगे हैं-

        इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग टूटने के बाद लगे अमेरिकी प्रतिबंध हटाना।
        क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति को कम करना।
        MoU के तहत जून में दी गई तेल छूट (ऑयल वेवर्स) को फिर से बहाल करना।
        कतर में मौजूद फंड सहित ईरान के फ्रीज किए गए पैसों को जारी करना।
        ओमान के साथ बातचीत में तय होर्मुज स्ट्रेट के नए शिपिंग रूट को मान्यता देना।
        तय रूट क अलावा बाकी सभी रूटों को बंद करना
        सभी मोर्चों पर युद्धबंदी- खासकर लेबनान पर इजरायल के हमलों को रोकना।

  • नेतन्याहू को बहुमत नहीं, 19 सीटों के साथ अरब पार्टियां बनीं किंगमेकर

    नेतन्याहू को बहुमत नहीं, 19 सीटों के साथ अरब पार्टियां बनीं किंगमेकर

     यरूशलम
    इजराइल में हाल ही में हुए आम चुनावों के बाद सरकार गठन को लेकर राजनीतिक गतिरोध बना हुआ है।
    इजराइल के राष्ट्रपति इसाक हर्जोग (Isaac Herzog) ने सभी राजनीतिक दलों से अपील की है कि वे नए चुनाव में जाने से बचने के लिए खुले दिमाग से आएं और गठबंधन सरकार बनाने के प्रयास करें। राष्ट्रपति ने नई सरकार बनाने के लिए 'नए और रचनात्मक विचारों' का आह्वान किया है।
    इजराइल के राष्ट्रपति इसाक हर्जोग का कहना है कि उन्हें बुधवार को चुनाव के आधिकारिक नतीजे मिल जाएंगे, जिसके बाद वे सरकार बनाने के लिए राजनीतिक दलों के साथ बातचीत शुरू करेंगे।

    हर्जोग ने कहा, "मैं सभी राजनीतिक दलों के नेताओं से अपील करता हूं कि वे नए और रचनात्मक विचारों और समाधानों के लिए तैयार रहें, ताकि देश को फिर से चुनाव की स्थिति में जाने से बचाया जा सके।" उन्होंने आगे कहा, "चुनाव के नतीजे अब एक सच्चाई हैं; सभी नेताओं को अपने कट्टर रुख को एक तरफ रखकर इस सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए।" उन्होंने कहा कि "फिर से चुनाव कराने की नौबत न आए", इसके लिए सभी राजनीतिक विकल्पों पर विचार किया जाएगा। सरकार बनाने के लिए चुने गए विजेता के पास 42 दिनों तक का समय होगा।

    जॉइंट लिस्ट- रा'अम किंगमेकर
    इस मतदान के चलते, इजराइल के फिलिस्तीनी नागरिकों का प्रतिनिधित्व करने वाले दो मुख्य चुनावी समूहों – 'यूनाइटेड अरब लिस्ट' (रा'अम) और 'जॉइंट लिस्ट' – को 120 सदस्यीय संसद में कुल 19 सीटें मिली हैं। इससे वे अगली सरकार बनाने के मामले में एक निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

    हालांकि, इस व्यापक समर्थन को स्वीकार करने के बजाय, इजराइल के प्रमुख राजनेताओं ने या तो उनके वोटों को अवैध ठहराने की कोशिश की है (इसे विदेशी हस्तक्षेप का नाम देकर), या फिर अपने लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल करने वाले फिलिस्तीनियों के इस कदम को "चुनाव चुराने की कोशिश" के रूप में पेश किया है।

    राष्ट्रपति ने किया आह्वान
    27 अक्टूबर 2026 को हुए इजरायली संसद (नेसेट) के चुनावों में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है, लेकिन किसी भी पक्ष (नेतन्याहू का दक्षिणपंथी गुट या विपक्षी गुट) को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है।

    प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने एक मजबूत दक्षिणपंथी सरकार बनाने का संकल्प लिया है, जबकि अरब पार्टियों के मजबूत प्रदर्शन और विपक्षी नेता गदी आईसेनकोट के रुख के कारण गठबंधन बनाना काफी चुनौतीपूर्ण हो गया है। नेतन्याहू इस दौरान कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने हुए हैं।

  • अमेरिका में चुनाव से भारत की बढ़ेंगी चुनौतियां? H-1B वीजा, व्यापार और डिफेंस पर रहेगी नजर

    अमेरिका में चुनाव से भारत की बढ़ेंगी चुनौतियां? H-1B वीजा, व्यापार और डिफेंस पर रहेगी नजर

    वॉशिंगटन
     इस हफ्ते, 3 नवंबर को अमेरिका के मध्यावधि चुनाव (मिडटर्म इलेक्शन) चुनाव हो रहे हैं। ये चुनाव अमेरिकी कांग्रेस (संसद) की तस्वीर तय करेंगे, जिससे पता चलेगा कि रिपब्लिकन पार्टी के नेता डोनाल्ड ट्रंप अपने कार्यकाल के बचे हुए दो वर्षों में हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स (प्रतिनिधि सभा) और सीनेट (संसद के दोनों सदन) पर किसका नियंत्रण होगा। डेमोक्रेटिक पार्टी किसी सदन में जीत जाती है तो कांग्रेस की ओर से प्रशासन के कामकाज की जांच बढ़ जाएगी। इसमें व्यापार, आव्रजन (इमिग्रेशन) और विदेश नीति जैसे मुद्दे हैं।

    डेमोक्रेट अगर दोनों सदनों में जीत जाते हैं तो उन्हें कानून बनाने, जांच करने और फंडिंग (धन आवंटन) के मामलों में ज्यादा ताकत मिल जाएगी। इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिकी विदेश नीति पर कांग्रेस का सीधा नियंत्रण हो जाएगा। राष्ट्रपति ट्रंप के पास व्यापक कार्यकारी शक्तियां बनी रहेंगी, जिसमें किसी कानून को वीटो (अस्वीकार) करने की शक्ति भी शामिल है। इसके बावजूद उनके कामकाज पर असका असर दिख सकता है।

    भारत के लिए चुनाव के मायने
    इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, चुनाव नतीजे भारत के लिए अहम हैं क्योंकि कांग्रेस के फैसले और अमेरिकी सरकार की नीतियां भारतीय निर्यात, अमेरिका में काम कर रहे भारतीयों और दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को प्रभावित करते हैं। डेमोक्रेट्स को बहुमत मिलता है तो टैरिफ, स्वास्थ्य सेवा, जीवन-यापन की लागत और राष्ट्रपति की युद्ध संबंधी शक्तियों पर बहस और विधायी गतिविधियां बढ़ सकती हैं। हालांकि ये प्रस्ताव कानून बनेंगे या नहीं, यह कांग्रेस में सीटों के अंतर, सीनेट की प्रक्रियाओं और राष्ट्रपति ट्रंप की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा।

    व्यापार समझौता और टैरिफ दोनों देशों के बीच लगातार चिंता का विषय रहा है। भारत के लिए व्यापार एक अहम मुद्दा है। अमेरिका भारतीय सामानों के लिए एक बड़ा बाजार है और अमेरिकी टैरिफ नीति में कोई भी बदलाव सीधे तौर पर भारतीय निर्यातकों को प्रभावित कर सकता है। इस साल फरवरी में वॉशिंगटन और दिल्ली ने अंतरिम व्यापार समझौते के लिए एक रूपरेखा (फ्रेमवर्क) की घोषणा की थी। हालांकि वॉशिंगटन और नई दिल्ली के बीच कोई व्यापार समझौता अभी तक नहीं हो पाया है।

    H-1B वीजा और आव्रजन नीति
    अमेरिका में काम कर रहे भारतीय पेशेवरों, खासकर H-1B वीजा धारकों के लिए इमिग्रेशन नीति बड़ी चिंता का विषय है। ट्रंप प्रशासन की H-1B आवेदनों के लिए प्रस्तावित 100,000 डॉलर की फीस को कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। दो संघीय न्यायाधीशों ने अलग-अलग मामलों में इसे लागू होने से रोक दिया है। ये फैसले इस नीति पर कानूनी रोक लगाते हैं लेकिन जरूरी नहीं कि ये मुकदमे का अंतिम समाधान हों।

    कांग्रेस (अमेरिकी संसद) के नियंत्रण में बदलाव से भविष्य के आव्रजन कानूनों और निगरानी पर असर पड़ सकता है। डेमोक्रेट्स हाउस और सीनेट में बहुमत हासिल कर लेते हैं तो उनके पास अधिक ताकत होगी। हालांकि कोई भी नीति खासकर विदेश संबंधों से जुड़ी नीतियां- ट्रंप के वीटो, फिलीबस्टर (कानून पारित होने में बाधा डालने की प्रक्रिया) और अर्थव्यवस्था के लिए साझा राजनीतिक जिम्मेदारी के कारण सीमित रहेंगी।

    डेमोक्रेट्स को कितनी सीटों की जरूरत
    3 नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनावों में प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटें और सीनेट की 35 सीटें (विशेष चुनावशामिल ) हैं। फिलहाल प्रतिनिधि सभा में रिपब्लिकन पार्टी के पास 218-214 की बढ़त है। कुछ खाली सीटों की वजह से बहुमत के लिए डेमोक्रेट्स को प्रतिनिधि सभा में तीन से चार सीटें जीतने की जरूरत है।

     

  • इजरायल में सत्ता परिवर्तन की आहट, नेतन्याहू के खिलाफ एकजुट हो रहा विपक्ष; 67 सीटों का दावा

    इजरायल में सत्ता परिवर्तन की आहट, नेतन्याहू के खिलाफ एकजुट हो रहा विपक्ष; 67 सीटों का दावा

     यरूशलम
    इजरायल के चर्चित प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की कुर्सी खतरे में नजर आ रही है। बीते चुनाव में उन्हें स्पष्ट जनादेश नहीं मिला। उन्हें क्या, किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं हुआ है। इसके बाद से वहां नई सरकार के गठन पर असमंजस के बादल नजर आ रहे हैं। हालांकि, अब जो खबर सामने आ रही है वह नेतन्याहू की चिंता बढ़ा सकती है। दो प्रमुख अरब पार्टियां राआम (Ra'am) और जॉइंट लिस्ट (Joint List) नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के लिए गादी आइसेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गुट का समर्थन कर सकती हैं। आपको बता दें कि इन दोनों के पास 19 सीटें हैं।

    टाइम्स ऑफ इजरायल की एक रिपोर्ट के अनुसार, जॉइंट लिस्ट नेतन्याहू की विरोधी पार्टियों को बाहर से समर्थन देने के लिए तैयार है। वह खुद सरकार का हिस्सा नहीं बनना चाहती है। सांसद अहमद तिबी ने कहा, "हम उस हर व्यक्ति की मदद करना चाहते हैं जो इस खराब सरकार को गिराना चाहता है। इसकी जगह एक नई सरकार लाना चाहता है। हम इस बदलाव का हिस्सा बनना चाहते हैं, उम्मीद का हिस्सा बनना चाहते हैं।" वह 'जॉइंट लिस्ट' में नंबर-2 माने जाते हैं।

    जाइंट लिस्ट के अलावा, अरब राजनीतिक आंदोलन के एक प्रमुख चेहरे बनक उभरे जाफर फराह ने बताया कि 'राआम' और 'जॉइंट लिस्ट' दोनों ही इजरायल के राष्ट्रपति इसाक हर्जोग को यह बता सकते हैं कि वे आइसेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गुट का समर्थन करने के लिए तैयार हैं। फराह ने कहा कि वे इजरायली सेना (IDF) के पूर्व चीफ ऑफ स्टाफ गादी आइसेनकोट को अगले प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तावित करेंगे।

    यित्जाक राबिन का दिया उदाहरण
    सांसद अहमद तिबी ने कथित तौर पर आइसेनकोट से कहा कि उन्हें दिवंगत प्रधानमंत्री यित्जाक राबिन की तरह बनना चाहिए। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि 'जॉइंट लिस्ट' सरकार को बाहर से समर्थन देगी। आपको बता दें कि राबिन मुख्य रूप से 1993 में हुए ओस्लो समझौते के तहत फिलिस्तीन मुक्ति संगठन के साथ बातचीत करने के अपने फैसले के लिए जाने जाते हैं। उस समय इस फैसले की काफी आलोचना हुई थी, लेकिन दो अरब-नेतृत्व वाली राजनीतिक पार्टियों ने राबिन की सरकार का समर्थन किया था।

    इजरायल में मौजूदा राजनीतिक गतिरोध के बीच अब वैसी ही स्थिति फिर से बनती दिख रही है। टाइम्स ऑफ इजराइल की रिपोर्ट के अनुसार, संभावित गठबंधन को लेकर अनिश्चितता के बीच जॉइंट लिस्ट के चेयरमैन यूसुफ जबरीन ने बताया कि नेतन्याहू-विरोधी पार्टियों के साथ बातचीत की गई है।

    हमास के हमले के बाद पहला चुनाव
    2023 में हमास के हमले के बाद इजरायल में पहली बार चुनाव हुए। नतीजों में नेतन्याहू का विरोध करने वाली यहूदी-बहुमत वाली पार्टियों ने 48 सीटें जीतीं। जबकि अरब-बहुमत वाली दोनों पार्टियों ने कुल मिलाकर 19 सीटें हासिल कीं। नेतन्याहू के गुट को 53 सीटें मिलीं। उनके पास पहले 68 सीटें थीं।

    आपको बता दें कि 120 सदस्यों वाली इजरायली संसद में कोई भी पार्टी बहुमत के लिए जरूरी 61 सीटों के आंकड़े तक नहीं पहुंच सकी है। अगर आइसेनकोट के खेमे और अरब पार्टियों के बीच गठबंधन हो जाता है तो नेतन्याहू-विरोधी गुट को 67 सीटों का स्पष्ट बहुमत मिल सकता है। और नेतन्याहू को प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ना पड़ सकता है।

  • अमेरिका में 440 करोड़ की डील पर बवाल, ट्रंप ने पूर्व वकील के समझौते को बताया ‘भयानक’

    अमेरिका में 440 करोड़ की डील पर बवाल, ट्रंप ने पूर्व वकील के समझौते को बताया ‘भयानक’

    वाशिंगटन  डीसी
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी पूर्व वकील अलीना हब्बा मिल्डन को लेकर कड़ी नाराजगी जताई है। मामला 50 मिलियन डॉलर यानी करीब 440 करोड़ रुपये के एक कॉन्ट्रैक्ट से जुड़ा है।

    आरोप है कि हब्बा ने अमेरिकी न्याय विभाग में काम करते हुए वेनेजुएला के एक कारोबारी परिवार के साथ करोड़ों डॉलर का समझौता किया था। इस खबर के सामने आने के बाद ट्रंप ने भी इसे गलत बताते हुए कहा है कि ऐसा बिल्कुल स्वीकार नहीं किया जा सकता।

    ट्रंप ने पूरे मामले को बताया 'भयानक'
    फ्लोरिडा के पाम बीच स्थित अपने मार-ए-लागो क्लब में शनिवार को पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने इस मामले पर अपनी नाराजगी जाहिर की।

    उन्होंने कहा कि यह पूरी तरह गलत और हैरान करने वाला है। उन्होंने हब्बा से कहा था कि वह इस तरह का भुगतान नहीं चाहेंगे। ट्रंप ने इस पूरे मामले को 'भयानक' बताते हुए कहा कि यह किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

    4 साल में 50 मिलियन डॉलर मिलने का था समझौता
    इस मामले का खुलासा अमेरिकी अखबार 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' की एक रिपोर्ट में हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक, वेनेजुएला के बैंकर जूलियो हेरेरा वेलुटिनी के परिवार ने अलीना हब्बा मिल्डन को चार साल में 50 मिलियन डॉलर से अधिक देने की गारंटी वाला समझौता किया था।

    इस कॉन्ट्रैक्ट के तहत उन्हें हर साल 10 मिलियन डॉलर यानी करीब 88 करोड़ रुपये मिलने थे। इसके अलावा बोनस का भी प्रावधान था। जूलियो हेरेरा वेलुटिनी पर अमेरिका में रिश्वतखोरी से जुड़े गंभीर आरोप लगे थे।

    हालांकि, अगस्त 2025 में उन्होंने एक समझौते के तहत अपना मामला सुलझा लिया था। इसके बाद उनके परिवार की कंपनी कॉनकॉर्ड पार्टनर्स ने हब्बा के साथ यह समझौता किया।

    सरकारी पद पर रहते हुए हुआ था करार
    रिपोर्ट के मुताबिक, हब्बा जब न्यू जर्सी में अमेरिका की कार्यवाहक अटॉर्नी के पद पर थीं, उसी दौरान उन्होंने हेरेरा के परिवार की कंपनी के साथ कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर किए थे

    खास बात यह है कि कॉनकॉर्ड पार्टनर्स कंपनी का रजिस्ट्रेशन अक्टूबर 2025 के आखिरी दिनों में ही हुआ था। इसके कुछ ही दिनों बाद हब्बा ने कंपनी के साथ समझौता कर लिया।

    हब्बा को बाद में देना पड़ा इस्तीफा
    हालांकि, इस बीच उनकी सरकारी भूमिका पर भी सवाल उठने लगे थे। एक अमेरिकी अपील अदालत ने 1 दिसंबर 2025 को उन्हें अमेरिकी अटॉर्नी के पद पर बने रहने से अयोग्य ठहरा दिया था।

    इसके बाद हब्बा ने 8 दिसंबर को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उसी दिन उन्हें अमेरिकी अटॉर्नी जनरल का वरिष्ठ सलाहकार नियुक्त किया गया। अखबार के मुताबिक, वह इस पद पर रहते हुए भी 1 जनवरी 2026 से कॉनकॉर्ड पार्टनर्स के साथ जुड़ गई थीं।

  • गुलामों के व्यापार पर ब्रिटेन में फिर बहस तेज, PM एंडी बर्नहम ने मुआवजे पर साफ किया रुख

    गुलामों के व्यापार पर ब्रिटेन में फिर बहस तेज, PM एंडी बर्नहम ने मुआवजे पर साफ किया रुख

    यूनाइटेड किंगडम
    कॉमनवेल्थ समिट में शामिल होने से पहले ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि ट्रांस अटलांटिक स्वेल ट्रेड यानी गुलामों के व्यापार को लेकर वह खुले मन से माफी मांगने को तैयार हैं।हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इसके लिए वह कोई भी मुआवजा चुकाने के लिए तैयार नहीं हैं। 'द गार्डियन' में लेख के माध्यम से यूके के प्रधानमंत्री ने यह बात कही है।

    क्या बोले एंडी बर्नहम
    ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने कहा कि उन्हें लोगों के उस दर्द का एहसास है जो कि उन्होंने झेला है। इसका उन्हें बहुत दुख है। एंडी ने कहा कि पहले जो भी क्रूरता की गई है उसकी छाप अभी मिटी नहीं है। उन्होंने कहा कि मुआवजा बांटना इसका कोई समाधान नहीं है। यह एक अत्याचार के बदले दूसरी तरह का अत्याचार ही कहा जाएगा। क्योंकि ब्रिटेन के आज के लोगों को इन घटनाओं का जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

    इस समय ब्रिटेन के किंग चार्ल्स कैरेबियन देशों के दौरे पर निकले हैं। चार्ल्स ने बहामास में भी गुलामी का जिक्र किया था और ब्रिटेन के शासनकाल में मारे गए लगों को श्रद्धांजलि दी थी। अब तक ब्रिटेन की ओर से कभी इस तरह की माफी नहीं मांगी गई। हालांकि इस मुद्दे की संवेदनशीलता को देखते हुए अब ब्रिटेन ने माफी मांगनी ही ठीक समजा। ब्रिटेन का कहना है कि इस बात से इनकार नहीं किया जा सता कि गुलामों के व्यापार से उसने पैसा कमाया लेकिन बाद में इसे बंद करने में भी उसने भूमिका निभाई। 1833 में ब्रिटेन की संसद ने गुलामी को गैरकानूनी घोषित किया था।

    संसद में इस तरह का प्रस्ताव पास होने के बाद भी ब्रिटेन ने दूसरे देशों पर राज करना नहीं छोड़ा और उनका शोषण करता रहा।

    जल्द भारत आ सकते हैं बर्नहम
    टिश प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम भारत का दौरा करने के इच्छुक हैं और जल्द ही उनकी यात्रा हो सकती है। एक शीर्ष राजनयिक ने बृहस्पतिवारक को दोनों देशों के बीच बढ़ती साझेदारी का उल्लेख करते हुए यह जानकारी दी।

    भारत में कार्यवाहक ब्रिटिश उच्चायुक्त बेन मेलर ने यहां 'पीटीआई-भाषा' को बताया कि पदभार संभालने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ बातचीत के दौरान, बर्नहम ने भारत आने की अपनी इच्छा जताई थी। मेलर ने कहा, ''मुझे पता है कि एंडी बर्नहम भारत आने के लिए बहुत उत्सुक हैं।''

    उन्होंने कहा, ''जब बर्नहम ने प्रधानमंत्री का पद संभाला था, उसके तुरंत बाद उनकी प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत हुई थी और उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के सामने सीधे तौर पर यह बात रखी थी। मुझे यकीन है कि हम जल्द ही ऐसा होता हुआ देख पाएंगे।''