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  • कैंसर मरीज के चेहरे से मौत का अनुमान! नई AI तकनीक पर वैज्ञानिकों का दावा, जानें कैसे करती है काम

    कैंसर मरीज के चेहरे से मौत का अनुमान! नई AI तकनीक पर वैज्ञानिकों का दावा, जानें कैसे करती है काम

     नईदिल्ली 
    क्या किसी के चेहरे की फोटो को देखकर किसी की मौत की भविष्यवाणी की जा सकती है. सुनने में थोड़ी हैरानी लगे लेकिन विज्ञान के इस युग में ऐसा संभव हो गया है. अमेरिका में बोस्टन के मास जनरल ब्रिघम के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी AI तकनीक विकसित की है जिसके माध्यम से कैंसर के मरीजों की मौत की भविष्यवाणी की जा सकेगी. लगभग 30 हजार फोटो पर अपना प्रयोग करते हुए वैज्ञानिकों ने ऐसा दावा किया है. इस तकनीकी को FAHR-FaceSurvival और FaceAgeनाम दिया गया है. मास जनरल ब्रिघम ने इससे पहले ही चेहरे देखकर बायलॉजिकल एज को मापने का दावा किया था. यानी किसी व्यक्ति का शरीर अंदर से कितने साल का हुआ, इसका पता लगाने का दावा इस कंपनी ने किया था. अब कैंसर मरीजों की मृत्यु दर का दावा किया है. शोधकर्ताओं का कहना है कि 4 करोड़ फोटो को देखने के बाद एआई मॉडल को इसके लिए प्रशिक्षित किया गया है. वाशिंगटन पोस्ट ने लैंसेट का हवाला देते हुए यह बात बताई है. इसकी सच्चाई को लेकर हमने मैक्स अस्पताल नई दिल्ली में सर्जिकल ऑन्कोलॉजी के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. रवि शंकर से बात की है। 

    क्या है रिपोर्ट में 
    पहले इस रिपोर्ट की बात करते हैं. वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक जिन लोगों की फोटो FAHR-FaceSurvival स्कोर सबसे ज्यादा 10 था, वे सब 90 दिनों के अंदर मर गए जबकि 10 प्रतिशत से कम स्कोर वाले 2 प्रतिशत लोगों की भी मौत हुई. इसमें बायलॉजिकल उम्र के हिसाब से भविष्यवाणी की गई. अध्ययन के एक लेखक और मास जनरल ब्रिघम कैंसर इंस्टीट्यूट के रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्ट रेमंड मैक ने कहा हमने पहली बार इस एआई मॉडल से यह साबित किया है कि तस्वीर से न सिर्फ बायलॉजिकल उम्र का पता लगाया जा सकता है बल्कि इससे हम व्यक्ति की मृत्यु दर का भी पता आसानी से लगा सकते हैं. मैक ने कहा कि एक साल पहले हमने फेस एज पर अध्ययन शुरू किया था। 

     इसमें एआई के एल्गोरिदम को इस तरह प्रशिक्षित किया कि वह चेहरे की फोटो से बायलॉजिकल उम्र का सटीक पता लगा ले. अब जो रिजल्ट सामने आया वह पहले से और ज्यादा सटीक था. यह कैंसर रोगियों के सीधे मौत के जोखिम का सटीक भविष्यवाणी करता है. मैक ने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि चेहरे की एक ही फोटो का विश्लेषण कर यह एआई फाउंडेशन मॉडल हेल्थ के कई मानकों की सटीक भविष्यवाणी करने में सक्षम है. इस मॉडल के आधार पर मैक और उनकी टीम 30 हजार से अधिक कैंसर रोगियों की तस्वीरों वाले मौजूदा डेटासेट के साथ-साथ उनकी सेहत की जानकारी का उपयोग करने में सक्षम थे. इसमें यह पता लगा कि जिस व्यक्ति की तस्वीर है उसकी मौत कब हुई या यदि वे जीवित है तो कितने दिनों तक जीवित रह पाएंगे। 

    शुरुआती दौर के लिए अच्छा कदम
    डॉ. रवि शंकर ने बताया कि एआई अब हमारे जीवन को आसान और तेज करने में बहुत मदद कर रहा है. इससे हम इंकार नहीं कर सकते है. यह एआई का जमाना है और आने वाले समय में इसके कई बेहतरीन परिणाम सामने आएंगे. इस तरह देखे तो यह रिसर्च मेंडिकल प्वाइंट ऑफ व्यू से चीजों को देखने के लिए बहुत अच्छा कदम है. इससे पहले वैज्ञानिकों ने FaceAge मॉडल बनाया था. इसमें 4 करोड़ से अधिक तस्वीरों का विश्लेषण करके इंसान की जैविक उम्र यानी बायलॉजिकल उम्र का पता लगाया जाता था। 

     जैविक उम्र का मतलब होता है कि उसके शरीर के अंग जैसे हार्ट, किडनी, लिवर, लंग्स, स्किन, हड्डियां सहित कोशिकाओं की सटीक उम्र क्या हुई है. अब इसी मॉडल को अपग्रेड करके शोधकर्ताओं ने कैंसर मरीजों की संभावित आयु का अनुमान लगाने के लिए AI मॉडल को ट्रेन किया है. बायलॉजिकल रूप से देखा जाए तो बीमारी के दौरान शरीर के अंदर क्या बदलाव आ रहे हैं और कौन से शारीरिक पैरामीटर्स को AI पकड़ रहा है, यह इस रिसर्च पेपर में नहीं बताया गया है. जैसे कोशिकाओं या टिशू या शरीर की कमजोरी को AI किस तरह पकड़ रहा है, इसका पूरा स्पष्टीकरण इस रिसर्च पेपर में नहीं है. यह आगे के अध्ययनों में ही साफ हो सकेगा। 

    90 दिनों में मौत की भविष्यवाणी से बेहतर संकेत
    रिसर्च के आंकड़ों को समझाते हुए डॉ. रवि शंकर बताते हैं कि अध्ययन में FAHR-FaceSurvival मॉडल के जरिए ’90-डेज मोर्टिलिटी’यानी 90 दिनों के भीतर मौत की दर को जांचा गया. यह बहुत ही दिलचस्प है और इससे भविष्य के संकेतों को परखा गया है. इसमें पाया गया कि जिन मरीजों का AI रिस्क स्कोर सबसे ज्यादा था, उनमें से 50% मरीजों की मौत 90 दिनों के भीतर हो गई जबकि सबसे कम रिस्क स्कोर वाले समूह में यह दर सिर्फ 2% थी. जैविक रूप से यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण और ध्यान देने योग्य संकेत है, जिसे पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता. हालांकि यह अभी बेहद शुरुआती (Premature) डेटा है और इसमें कई कमियां (Flaws) हैं, इसलिए इसके आधार पर फिलहाल अस्पतालों में मरीजों का क्लीनिकल इलाज तय नहीं किया जा सकता। 

    भविष्य में संभावनाएं बेहतर होंगी
    डॉ. रवि शंकर ने स्पष्ट किया कि इस समय यह AI मॉडल केवल मरीज के जीवित रहने की अवधि का एक मोटा अनुमान भर दे सकता है. इससे कोई ऐसा निश्चित या जैविक रूप से निर्णायक डेटा नहीं मिलता, जिससे मरीज की लाइन ऑफ ट्रीटमेंट या इलाज के तरीकों को बदला जा सके या उसकी उम्र को वास्तव में बढ़ाया जा सके. फिर भी, एक ऑन्कोलॉजिस्ट के नजरिए से चेहरे के बायोमार्कर से स्वास्थ्य का अंदाजा लगाना एक बेहद दिलचस्प वैज्ञानिक शुरुआत है. भविष्य में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह AI तकनीक जैविक स्तर पर और कितनी सटीक रूप से विकसित होती है। 

  • Cancer Treatment: कैंसर के इलाज में आएगी तेजी! नई रेडियोथेरेपी तकनीक से ट्यूमर पर रहेगी पल-पल नजर

    Cancer Treatment: कैंसर के इलाज में आएगी तेजी! नई रेडियोथेरेपी तकनीक से ट्यूमर पर रहेगी पल-पल नजर

    इंदौर 

    कैंसर मरीजों के लिए राहत भरी खबर सामने आ रही है। जानकारी के लिए बता दें कि आधुनिक रेडियोथेरेपी तकनीक पर हो रहे शोध से संभावना है कि उपचार के दौरान कैंसर के ट्यूमर पर नजर रखते हुए रेडिएशन दिया जा सकेगा। इससे कैंसरग्रस्त हिस्से पर सटीक निशाना लगाने और आसपास के स्वस्थ अंगों को नुकसान से बचाने में मदद मिलेगी। भविष्य में ऐसी व्यवस्था विकसित करने का लक्ष्य है, जिसमें सुबह बीमारी की पहचान हो, दोपहर तक जांच और इलाज की प्रक्रिया शुरू हो जाए और उपचार के बाद मरीज को जल्द घर भेजा जा सके। यह बात इंग्लैंड में इंस्टीट्यूट ऑफ कैंसर रिसर्च और द रॉयल मार्सडेन एनएचएस फाउंडेशन ट्रस्ट के ज्वाइंट डिपार्टमेंट ऑफ फिजिक्स के प्रमुख प्रो. उवे ओएल्फके ने कैंसर उपचार में रेडियोथेरेपी की बदलती तकनीक पर चर्चा में कही।

    कैंसर के आधुनिक उपचार में कर रहे शोध
    वे करीब दो दशक से रेडियोथेरेपी, मेडिकल फिजिक्स और कैंसर के आधुनिक उपचार से जुड़ी तकनीकों पर शोध कर रहे हैं। वे इंटरनेशनल साइंटिफिक एक्सचेंज प्रोग्राम मीट द प्रोफेसर के तहत इंदौर पहुंचे थे। यहां उन्होंने ऑन्कोलॉजी के जटिल और अस्पष्ट पहलुओं पर काम करना, रेडिएशन थेरेपी अनुसंधान की चुनौतियां और अवसर विषय पर विचार साझा किए। उन्होंने एक दिन पहले आरआर कैट में भी विशेष सत्र लेकर इसी विषय पर चर्चा की। उनके मुताबिक, कैंसर के बेहतर उपचार के लिए आधुनिक तकनीक के साथ वैज्ञानिक शोध और अंतरराष्ट्रीय सहयोग महत्वपूर्ण है।

    भारतीय कैंसर केंद्रों की सराहना

    प्रो. ओएल्फके ने रियल टाइम ट्यूमर थेरेपी पर कहा कि इस तकनीक में उपचार के दौरान ट्यूमर की स्थिति पर लगातार नजर रखी जाती है। सांस लेने जैसी शारीरिक गतिविधियों के कारण भी कुछ ट्यूमर की स्थिति बदल सकती है। ऐसे में इमेजिंग तकनीक से ट्यूमर की वास्तविक स्थिति के अनुसार रेडिएशन देने की दिशा में काम किया जा रहा है। प्रो. ओएल्फके के शोध का प्रमुख क्षेत्र यह भी है कि रेडिएशन थेरेपी को प्रभावी कैसे बनाया जाए। उन्होंने भारत में रेडियोथेरेपी की आधुनिक सुविधाओं पर संतोष जताया। मुंबई के टाटा मेमोरियल कैंसर अस्पताल का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां उपलब्ध सुविधाएं यूरोप के कैंसर केंद्रों के स्तर की हैं।

  • मध्य प्रदेश में तेजी से बढ़ रहा माउथ कैंसर, गुटखा-तंबाकू बने बड़ी वजह; मरीजों में 40% इजाफा

    मध्य प्रदेश में तेजी से बढ़ रहा माउथ कैंसर, गुटखा-तंबाकू बने बड़ी वजह; मरीजों में 40% इजाफा

    भोपाल 
     मध्यप्रदेश में जुगाड़ का गुटखा मुंह के कैंसर के मामलों में हर साल बढ़ोत्तरी कर रहा है. मुंह के कैंसर के बढ़ते मामलों को देखते हुए मध्यप्रदेश में करीबन 14 साल पहले गुटखा की बिक्री पर रोक लगाई गई थी, लेकिन इसके बाद पाउच का स्थान 'जुगाड़ के गुटखे' ने ले लिया. तंबाकू-चूने और जुगाड़ के गुटखे के चलते देश में सबसे ज्यादा मुंह के कैंसर के मरीज मध्य प्रदेश में सामने आ रहे हैं. मध्यप्रदेश में साल 2025 में 48 हजार 694 कैंसर के मरीज मिले थे, जिनमें से करीबन 40 फीसदी मरीज ओरल कैंसर के थे। 

    भोपाल में सबसे ज्यादा मुंह का कैंसर
    नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम इंवेस्टीगेटर की रिपोर्ट के मुताबिक, मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में मुंह के कैंसर के सबसे ज्यादा मामले सामने आते हैं. राजधानी भोपाल में 1 लाख लोगों की आबादी में 41 लोग मुंह के कैंसर से पीड़ित मिल रहे हैं. इसके अलावा प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में भी मुंह के कैंसर से पीड़ित मरीज बड़ी संख्या में मिल रहे हैं। 

    गुटखे पर पाबंदी तो जुगाड़ वाला गुटखा चला
    कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉ. श्याम अग्रवाल के मुताबिक, '' मुंह के कैंसर पर रोक लगाने के लिए ही 1 अप्रेल 2012 को मध्यप्रदेश में तंबाकू पाउच की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, लेकिन इसके बाद जुगाड़ का पाउच आ गया. अब एक पाउच में सादा गुटखा होता है, और दूसरे में तंबाकू, चूना आदि. इस सबको मिलाकर यह वहीं तंबाकू का गुटखा बन जाता है, जिस पर प्रतिबंध लगाया गया था. यही वजह है कि प्रदेश में मुंह के कैंसर के रोगी कम होने के स्थान पर बढ़ गए हैं। 

    अब युवाओं में आ रहे कैंसर के मामले, एमपी में सबसे तेज
    डॉ. श्याम अग्रवाल कहते हैं, '' अब मुंह के कैंसर के मरीजों के मामले में एक अहम बदलाव आया है. कुछ साल पहले तक मुंह के कैंसर के मरीज की औसत उम्र 50 साल और उससे अधिक ही होती थी, लेकिन अब 20-25 साल की नई उम्र के युवा भी कैंसर मरीज बन रहे हैं. कारण सिर्फ तंबाकू का सेवन है. पूरे विश्व में भारत, पाकिस्तान सहित कुछ देशों में ही मुंह के कैंसर के मरीज सामने आते हैं, इसमें भी मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा. मध्यप्रदेश में कैंसर के मरीजों की संख्या में हर साल 10.55 फीसदी की बढ़ोत्तरी हो रही है, जबकि इसमें मुंह के कैंसर के मरीज 40 फीसदी बढ़ रहे हैं। 

    जानकारी देते कैंसर विशेषज्ञ 
    भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय महामारी विज्ञान संस्थान के अनुसार मध्यप्रदेश में साल 2021 से 2025 के दौरान कैंसर के मरीजों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। 

    40 फीसदी मामले माउथ कैंसर के ही
    प्रदेश में मुंह के कैंसर के मामले औसत कैंसर के मामलों से ज्यादा बढ़ रहे हैं. देश में भी मिलने वाले कैंसर के कुल मामलों में 40 फीसदी सिर्फ मुंह के कैंसर के मामले होते हैं. भोपाल स्थिति जवाहरलाल नेहरू कैंसर हॉस्पिटल के आंकड़ों को देखें तो हॉस्पिटल में साल 2012 में मुंह के कैंसर के मरीजों की संख्या 1836 थी, जो साल 2025 में बढ़कर 2614 तक पहुंच गई हैं. यहां इलाज कराने के लिए प्रदेश के कई जिलों से मरीज पहुंचते हैं. मुंह के कैंसर के मरीजों की संख्या में लगातार बढ़त देखी जा रही है, जो खतरनाह है। 

    साल 2020 में हॉस्पिटल में 2118 ओरल कैंसर के मरीज मिले थे, जो साल 2021 में बढ़कर 2519 हो गए. साल 2022 में यहां 2492 मरीज इलाज कराने पहुंचे. वहीं, साल 2023 में 2566 मरीज, 2024 में 2743 और साल 2025 में 2614 ओरल कैंसर के मरीज सामने आए हैं। 

    मुंह में सफेद, लाल दाग तो सर्तक हो जाएं
    जवाहरलाल नेहरू कैंसर हॉस्पिटल भोपाल के मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. विजय भार्गव कहते हैं, '' गुटखा, पाउच, तंबाखू खाने और सिगरेट पीने वाले लोग मुंह में होने वाले शुरुआती लक्षणों को बिलकुल भी नजरअंदाज न करें. यदि धीरे-धीरे मुंह खुलना कम हो जाए या मुंह में किसी तरह के लाल-सफेद धब्बे बन जाएं तो तुरंत तंबाकू, गुटखा खाना बंद कर दें और चैकअप कराएं. शुरुआती स्तर पर ही जांच और दवा के जरिए गंभीर बीमारी को टाला जा सकता है। 

    तंबाकू और गुटखा मुंह के कैंसर का सबसे बड़ा कारण
    डॉक्टर आगे कहते हैं, ''लगातार तंबाकू, गुटखा खाने वालों और सिगरेट पीने वालों के मुंह में सफेद या लाल धब्बे बन जाते हैं, यह एक तरह की चेतावनी होती है, जो शरीर आपको देता है. ऐसी स्थिति में तुरंत तंबाकू-पाउच खाना बंद करना चाहिए. कई बार लोग तर्क देते हैं कि सिर्फ तंबाकू और चूना खाने से कुछ नहीं होता, लेकिन जब तंबाकू को चूना के साथ मिलाया जाता है तो यह निकोटीन को खून में तेजी से घोलता है और इससे तंबाकू की लत को और मजबूत करता है, इसके साथ ही और मुंह में छाले बनाता है, जो आगे चलकर कैंसर का कारण बन जाता है। 

  • स्टेज-4 ब्रेस्ट कैंसर में नई दवाओं से बढ़ी उम्मीद, एम्स में मरीजों के इलाज के बेहतर विकल्प

    स्टेज-4 ब्रेस्ट कैंसर में नई दवाओं से बढ़ी उम्मीद, एम्स में मरीजों के इलाज के बेहतर विकल्प

    भोपाल

    स्तन कैंसर की चौथी स्टेज सुनते ही मरीज और परिवार अक्सर उम्मीद छोड़ने लगते हैं, लेकिन हेर-टू पॉजिटिव स्तन कैंसर के मामले में इलाज की तस्वीर अब बदल रही है। आधुनिक लक्षित दवाओं ने उन मरीजों के लिए भी उपचार के नए रास्ते खोले हैं, जिनका कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों तक फैल चुका है। एम्स भोपाल की चिकित्सा कैंसर विज्ञान एवं रक्त रोग विभाग की संकाय सदस्य डॉ. आकांक्षा चौधरी ने भोपाल ऑन्कोलॉजी अपडेट्स 2026 में हेर-टू पॉजिटिव मेटास्टेटिक स्तन कैंसर के एक मामले पर विशेषज्ञ चर्चा में हिस्सा लिया। उन्होंने नई लक्षित दवाओं और मरीज की बीमारी के अनुसार उपचार चुनने की आधुनिक पद्धति की जानकारी साझा की।

    बीमारी की पहचान से तय होगा इलाज
    डॉ. चौधरी के अनुसार अब कैंसर का उपचार केवल यह देखकर तय नहीं किया जाता कि बीमारी किस अंग में है या किस चरण में पहुंची है। कैंसर कोशिकाओं की विशेषताओं की जांच कर यह पता लगाया जाता है कि मरीज के लिए कौन-सा उपचार अधिक प्रभावी हो सकता है। हेर-टू एक प्रोटीन है, जो कुछ स्तन कैंसर कोशिकाओं की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में पाया जाता है। ऐसे कैंसर को हेर-टू पॉजिटिव स्तन कैंसर कहा जाता है। जब यह स्तन से निकलकर शरीर के दूसरे हिस्सों तक फैल जाता है तो इसे मेटास्टेटिक यानी चौथी स्टेज का कैंसर माना जाता है।

    नई दवाओं से बढ़े उपचार के विकल्प
    विशेषज्ञ चर्चा में ट्रास्टुजुमैब डेरक्सटेकैन, पर्टुजुमैब और टुकाटिनिब जैसी नई लक्षित दवाओं पर चर्चा हुई। इन उपचारों ने चौथी स्टेज के हेर-टू पॉजिटिव स्तन कैंसर में बीमारी को नियंत्रित करने की संभावनाएं बढ़ाई हैं। इनके साथ मरीजों के लंबे समय तक बेहतर जीवन जीने की उम्मीद भी पहले की तुलना में बढ़ी है। डॉ. चौधरी ने बताया कि कुछ वर्ष पहले हेर-टू पॉजिटिव स्तन कैंसर के उपचार के विकल्प काफी सीमित थे। लगातार हो रही चिकित्सा प्रगति के कारण अब मरीज की बीमारी की विशेषताओं के आधार पर कई उपचार विकल्प उपलब्ध हैं।

    राहत: आयुष्मान से लक्षित इलाज
    एम्स भोपाल में हेर-टू पॉजिटिव स्तन कैंसर के मरीजों के लिए आधुनिक लक्षित उपचार  उपलब्ध हैं। ट्रास्टुजुमैब आधारित लक्षित उपचार आयुष्मान भारत योजना के तहत निःशुल्क उपलब्ध है।

    इसके अलावा एम्स भोपाल के चिकित्सा कैंसर विज्ञान विभाग में स्तन कैंसर समेत उन्नत कैंसर के मरीजों के लिए लक्षित दवाओं, इम्यूनोथेरेपी और मरीज की बीमारी के अनुसार व्यक्तिगत उपचार की सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। 

    महिलाओं के लिए जरूरी संदेश
    हेर-टू पॉजिटिव स्तन कैंसर की रिपोर्ट आने का मतलब यह नहीं है कि उपचार के विकल्प खत्म हो गए। खासकर बीमारी के शरीर में फैल जाने के बाद भी आधुनिक उपचार से बीमारी को नियंत्रित करने की संभावनाएं मौजूद हैं। इसलिए स्तन में गांठ, आकार में बदलाव, त्वचा या निप्पल में असामान्य परिवर्तन जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर जांच, कैंसर की सही पहचान और विशेषज्ञ चिकित्सक से उपचार शुरू करना सबसे महत्वपूर्ण है। 

  • Cancer Alert: मोटापा और तनाव बना रहे बीमारी की वजह, पुरुषों में ओरल- महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर बढ़ा

    Cancer Alert: मोटापा और तनाव बना रहे बीमारी की वजह, पुरुषों में ओरल- महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर बढ़ा

    मुंबई
     तनाव, मोटापे और बिगड़ी हुई जीनवशैली की वजह से शहरों में कैंसर के मामले तेज़ी से बढ़े हैं. टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के डेटा के मुताबिक भारत में उत्तर पूर्व के राज्य बिहार, बंगाल उड़ीसा में ओरल कैंसर के साथ लंग्स कैंसर इसोफेगस और स्टमक कैंसर के मामले बहुत तेजी से बढ़े हैं. और ये आंकड़ा राष्ट्रीय औसत के भी आगे निकल गया है। 

    पुरुषों में अगर सबसे ज्यादा मामले ओरल कैंसर के हैं तो महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर. सर्वाइकल कैंसर ग्रामीण इलाकों के मुकाबले शहरों में तेजी से बढ़ा है. कैसे टाटा मेमोरियल अब कैंसर को लेकर अवेयरनेस के साथ कैंसर फैलने से पहले उसके बचाव की रणनीति पर काम कर रहा है. आर्युवेद पर शुरु होने वाले क्लीनिकल ट्रायल क्या कैंसर के उपचार में नई खोज साबित होंगे. टाटा मैमोरियल हॉस्पिटल क्यों प्राइमरी स्क्रीनिंग पर सबसे ज्यादा जोर दे रहा है। 

    शहरी जिंदगी का तनाव और मोटापा कैंसर की जड़
    टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के रिसेप्शन से लेकर रेडियोलॉजी डिपार्टमेंट तक मरीज और उनके परिजन ही दिखाई देते हैं. कैंसर के इलाज की पहली और आखिरी उम्मीद है ये अस्पताल. उम्मीद की यहां आ गए तो ज़िंदगी बच सकती है. रेडियोलॉजी एंव एकेडेमिक्स डिपार्टमेंट के हेड डॉ. सुयश कुलकर्णी बताते हैं, ''देश भर से यहां लोग आते हैं. हालांकि हमारे और सेंटर भी हैं, लेकिन एक ट्रेडिशनल जो मरीज का रहता है उसे भरोसा होता है कि अगर मुंबई टाटा मेमोरियल में पहुंच गए तो सब ठीक हो जाएगा। 

    हम ये पूरी कोशिश करते भी हैं. लेकिन चुनौती ये है कि कैंसर के मामले अब तेजी से बढ़ रहे हैं. और ग्रामीण इलाकों के मुकाबले शहरी इलाकों में इनकी तादाद ज्यादा है.'' डॉ. कुलकर्णी बताते हैं, ''शहरी जिंदगी का तनाव मोटापा और बिगड़ती लाइफस्टाइल इसकी सबसे बड़ी वजह है. दूसरा एक खतरा पेस्टिसाइड्स से भी है.'' वे कहते हैं, ''तनाव सीधे आपके शरीर के सेल्फ डिफेंस सिस्टम पर अटैक करता है. सीधे इम्यूनिटी प्रभावित होती है. तनाव से दूरी योग और एक्सरसाइज ये लाइफ स्टाइल में शामिल किये जाने की जरुरत है। 

    ये राज्य हैं जहां तेजी से फैल रहा है कैंसर
    भारत में उत्तर पूर्व के राज्य बिहार, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा इन राज्यों में इसोफेगस कैंसर, लंग्स कैंसर ओरल कैंसर और स्टमक कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल की डॉक्टर शर्मिला पिंपरे के मुताबिक, ''अगर हम एक औसत देखें तो अगर हर एक लाख लोगों में 110 लोगों को कैंसर है तो इन राज्यों में ये आंकड़ा 210 तक पहुंच रहा है. यहां पर मुख्य वजह फूड हैबिट्स के साथ स्मोकिंग भी है. इसी तरह से अगर हम महिलाओं में देखें तो ग्रामीण इलाकों से ज्यादा मामले ब्रेस्ट और सर्वाइकल कैंसर के हैं। 

    आर्युवेद कैंसर में कितना कारगर क्लीनिकल ट्रायल की तैयारी
    कैंसर पर किस तरह से पूरी रोकथाम हो सके, इसके लिए प्रयास चिकित्सा की दूसरी विधाओं में भी किए जा रहे हैं. टाटा मैमोरियल हॉस्पिटल एक पूरा सैटअप तैयार कर रहा है. जहां पर आयुष के डॉक्टर्स के साथ पहले आर्युवेद का मेडिकल कल्टिनेशन किया जाएगा. उसके बाद क्लीनिकल ट्रायल भी शुरु होंगे. महाराष्ट्र के खोपोली में इसकी तैयारी हो रही है। 

    डॉ. शर्मिला बताती हैं, ''आयुष युनानी जो भी दूसरी पद्धतियां हैं उनके भी क्लीनिकल ट्रायल होंगे और फिर एविडेंस के साथ हम इस निश्कर्ष पर पहुंच सकेंगे कि ये कितना कारगर है. खोपोली में 27 एकड़ में ये तैयारी चल रही है.'' वे कहती हैं, ''अभी लोग कीमोथैरेपी छोड़कर आर्युवेद ट्रीटमेंट लेते हैं. लेकिन क्लनिकली साबित हो जाने के बाद ही इस पर जाना चाहिए. इसके लिए ही हम प्रयास कर रहे हैं कि क्या एलोपैथिक के साथ इन दवाओं की भी मदद ली जा सकती है. लेकिन क्लीनिकल ट्रायल के बाद ही परिणाम जान लेने के बाद ही इस मामले में कुछ स्पष्ट हो सकेगा। 

    कैंसर रोकने अवेयरनेस कैम्प 13 से 15 साल के बच्चे टारगेट
    टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल केवल रोकथाम ही नहीं कैंसर के लिए जरुरी सावधानी क्या रखनी चाहिए इसके लिए भी जागरुकता अभियान चला रहा है. खास बात ये है कि ये कैम्पेन स्कूल के 13 से 15 साल के बच्चों को टारगेट करके डिजाइन किया गया है. टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल की डॉ मंजूर सैंगर बताती हैं, ''असल में इस एज ग्रुप को चुनने की खास वजह ये है कि ये बच्चे खुद तो स्मोकिग करने से पहले संभाल लेंगे. ये परिवार में भी एक कैटेलिस्ट बनेंगे और सिगरेट से लेकर एल्कोहल रोकने का काम करेंगे. ये बच्चे अगर इस उम्र में संभल गए तो कॉलेज में भी ये इस सबसे दूर रहेंगे। 

  • कैंसर से जूझ रही महिला को जिला अस्पताल में भर्ती, कलेक्टर ने दिए उपचार के निर्देश

    कैंसर से जूझ रही महिला को जिला अस्पताल में भर्ती, कलेक्टर ने दिए उपचार के निर्देश

    कैंसर पीड़ित महिला को जिला अस्पताल में कराया गया भर्ती, कलेक्टर ने बेहतर उपचार के दिए निर्देश

    मरीज को बेहतर उपचार के लिए मेकाहारा में करवाया जायेगा एडमिट

    थायराइड कैंसर के चौथे स्टेज से पीड़ित है महिला, बीते नवंबर एम्स में करवाई गई थी कीमोथेरेपी

    एक साल तक रायपुर में एम्स व मेकाहारा में इलाज के बाद टाटा मेमोरियल मुंबई में भी हुआ है उपचार
    रायपुर

    काटाबहरा (नगवाही) निवासी समलू मरकाम जिनकी पत्नी कपूरा मरकाम थायराइड कैंसर के चौथे स्टेज से पीड़ित है और चलने फिरने में असमर्थ है। उन्हें बाइक में लेकर कलेक्ट्रेट पहुंचे थे। यहां कलेक्टर श्री गोपाल वर्मा ने मामला संज्ञान में आते ही तत्काल एम्बुलेंस बुलवा कर पीड़िता को जिला अस्पताल में भर्ती करवाया और मुख्य चिकित्सा अधिकारी को उपचार के लिए निर्देशित किया। महिला को बेहतर उपचार के लिए रायपुर में एडमिट करवाया जाएगा।

        मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी ने बताया कि 11 नवंबर को ग्राम कांटाबहरा (नगवाही) के श्री समलु मरकाम द्वारा थायराइड कैंसर पीड़ित पत्नी श्रीमती कपूरा मरकाम को उपचार के लिए बाइक में लिटा कर उपचार के लिए ले जाने की सूचना संज्ञान में आने पर स्वास्थ्य विभाग की टीम 12 नवंबर को पीड़िता के घर पहुंची और उसे 108 एम्बुलेंस में बेहतर उपचार के लिए मेकाहारा रायपुर भेजा गया। यहां महिला को कैंसर रिसर्च युनिट में भर्ती कराया गया है जहां कैंसर विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में उनका इलाज हुआ। 

       उन्होंने आगे बताया कि पूर्व में पीड़िता के स्वास्थ्य समस्या की जानकारी मिलने पर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र रेगांखार/सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र बोड़ला विकासखण्ड बोड़ला स्वास्थ्य विभाग के टीम द्वारा पीड़ित कपूरा मरकाम पति समलू मरकाम के ग्राम काटाबहरा (नगवाही) के निवास स्थान पर जाकर निरीक्षण करने पर पाया गया कि श्री समलू मरकाम द्वारा अपनी पत्नी कपूरा मरकाम के गले का गांठ में दर्द होने पर प्राथ. स्वा. रेगांखर जंगल में ईलाज के लिए ले जाया गया। वहां पदस्थ डाक्टर द्वारा जिला स्वासस्थ्य विभाग के अधिकारियों से मरीज के बीमारी के संबंध में चर्चा कर उपचार के लिए रायपुर रिफर किया गया। जहां वर्ष 2024 में एक वर्ष तक एम्स, मेकाहारा तथा डीकेएस अस्पताल सहित कुछ निजी अस्पतालों में ईलाज चला। इसके पश्चात जनवरी 2025 में टाटा मेमोरियल मुंबई में एक माह तक ईलाज चला। वहां से ईलाज उपरांत घर लाया गया। पीड़िता की परेशानी पुनः बढ़ने पर उन्हें 12 नवंबर को स्वास्थ्य विभाग द्वारा रायपुर विशेषज्ञ चिकित्सकों के पास ईलाज के लिए ले जाया गया। जहां वे 12 और 13 नवंबर को मेकाहारा में भर्ती रही और 14 से 19 नवंबर 2025 तक एम्स में भर्ती कर कीमोथेरेपी दी गई। जिसके पश्चात 20 नवंबर को मरीज को वापस घर लाया गया। जिसके पश्चात घर पर रहकर वह स्वास्थ्य लाभ ले रही थी। जिसके पश्चात महिला को आज फिर स्वास्थ्य खराब होने पर जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है। यहां से उन्हें रायपुर में एडमिट करवाया जाएगा।

  • औषधीय पौधे में कैंसर का उपचार ढूंढने वाटिका पर खर्च होंगे 30 करोड़

    औषधीय पौधे में कैंसर का उपचार ढूंढने वाटिका पर खर्च होंगे 30 करोड़

    भागलपुर.

    जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज सूबे का पहला मेडिकल कॉलेज होगा, जहां हर्बल वाटिका बनेगी। दो माह के अंदर हर्बल वाटिका तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है। हर्बल वाटिका तैयार होने के बाद छात्र आयुर्वेद और एलोपैथी के बीच के संबंध पर शोध करेंगे।

    औषधीय पौधों पर अध्ययन कर कैंसर, हृदय रोग सहित अन्य गंभीर बीमारियों के उपचार की संभावनाएं तलाशेंगे। कॉलेज परिसर में बनने वाली हर्बल वाटिका में बीएयू का सहयोग लिया जा रहा है। यह वाटिका बीएयू के वानिकी विभाग के अध्यक्ष की देखरेख में लगाई जा रही है।

    चालीस डिस्मिल जमीन पर लगेगी वाटिका
    मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. अविलेश कुमार ने बताया कि कॉलेज के मुख्य भवन के पीछे, जहां एनिमल हाउस बनाया गया है, वहीं लगभग 40 डिस्मिल खाली जमीन है। इसी जमीन पर हर्बल वाटिका लगाने की योजना है। फार्माकोलॉजी विभाग के एचओडी डॉ. जीतेंद्र कुमार ने बताया कि हर्बल वाटिका में एलोवेरा, पुदीना, लेमनग्रास, लौंग, हरसिंगार, सप्तपर्णी, अजवाइन, अश्वगंधा, शतावर, तितराज, कपूर, शंखपुष्पी, शुगर क्योर, पत्थरचूर समेत 100 से अधिक औषधीय पौधे लगाए जाएंगे। यहां लगाया जाने वाला प्रत्येक पौधा किसी न किसी रोग के उपचार में उपयोगी साबित होगा।

    आयुर्वेद एवं एलोपैथी के संबंधों पर होगा शोध

    • इस वाटिका को बनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य आयुर्वेद और एलोपैथी के संबंध को समझना है। डॉ. जीतेंद्र ने बताया कि यह वाटिका एमबीबीएस एवं फार्माकोलॉजी में पीजी कर रहे छात्रों के लिए बेहतर अनुभव लेकर आएगी। वाटिका की देखरेख की जिम्मेदारी फार्माकोलॉजी विभाग की होगी।
    • फार्माकोलॉजी के छात्र यह अध्ययन करेंगे कि औषधीय पौधों से किस प्रकार की दवाएं बनाई जा सकती हैं। कई अंग्रेजी दवाएं भी औषधीय पौधों से बनती हैं।
    • हृदय रोग के लिए दी जाने वाली दवा डिजिटलिस, फाक्सग्लोव नामक औषधीय पौधे की पत्तियों से बनती है। वहीं, यहां इस बात पर भी शोध होगा कि क्या औषधीय पौधों से कैंसर की दवा बनाई जा सकती है।