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  • अब AI खुद करेगा आपके रोजमर्रा के काम! Meta ने लॉन्च किया Muse, ईमेल, ट्रैवल बुकिंग और शॉपिंग तक होगा ऑटोमेटिक

    अब AI खुद करेगा आपके रोजमर्रा के काम! Meta ने लॉन्च किया Muse, ईमेल, ट्रैवल बुकिंग और शॉपिंग तक होगा ऑटोमेटिक

     नई दिल्ली

    हर दिन के काम को आसान बनाने के लिए मेटा ने नया ऑटोनोमस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) एजेंट लॉन्च किया है. यह AI आपके कई काम खुद कर सकता है. जैसे ईमेल भेजना, गाड़ी बेचने के लिए लिस्ट करना और कहीं घूमने जाने के लिए टिकट बुक करना। 

    मेटा इस नए ऐप के साथ नॉर्मल एआई से हटकर कुछ करना चाहता है. कंपनी ऐसी AI तैयार कर रही है, जो सिर्फ जवाब देने के बजाय आपके लिए काम भी कर सके. इसकी मदद से रोज के कई काम आसानी से किए जा सकते हैं. आइए जानते हैं इसके बारे मे। 

    जानिए Meta Muse AI क्या है?

    मेटा का नया एआई एक पर्सनल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एजेंट है. इसे हर दिन के काम को ऑटोमेट करने के लिए बनाया गया है. इसकी मदद से कई ऐसे काम किए जा सकते हैं, जिन्हें करने में ज्यादा समय लगता है। 

    यह नॉर्मल चैटबॉट की तरह नहीं है. दूसरे एआई ऐप्स आमतौर पर आपके सवालों के जवाब दे सकते हैं, लेकिन खुद से कोई ऐप खोलकर मैसेज करना या कई स्टेप वाला काम पूरा करना उनके लिए आसान नहीं होता. वहीं, मेटा का Muse खास तौर पर ऐसे कामों को ऑटोमेट करने के लिए बनाया गया है. यूजर को सिर्फ टास्क देना होता है और एआई उसे पूरा करने की कोशिश करता है। 

    जानिए कैसे आ सकता है काम
    Muse AI आपके सवालों के जवाब देने के साथ-साथ कई दूसरे काम भी कर सकता है. जैसे कोई फॉर्म पूरा करना, वेबसाइट पर ब्राउजिंग करना, कोई चीज खरीदना, इमेज बनाना और डॉक्यूमेंट तैयार करना.इसकी मदद से यूजर को कई छोटे-छोटे काम खुद करने की जरूरत नहीं पड़ेगी. एआई इन कामों को अपने तरीके से पूरा करने में मदद कर सकता है। 

    जानिए कैसे कर पाता है टास्क आसानी से
    जो एआई खुद से किसी काम को पूरा कर सकता है, उसे एजेंटिक AI कहा जाता है. मेटा का Muse भी एक एजेंटिक AI है, जिसे यूजर के काम को आसान बनाने के लिए तैयार किया गया है। 

    जब आप इसे कोई टास्क देते हैं, तो यह काम पूरा करने के लिए जरूरी बिल्ट-इन स्किल्स को चेक करता है. इसके बाद उन्हीं स्किल्स की मदद से टास्क पूरा करने की कोशिश करता है. इसके साथ दूसरे ऐप्स की कनेक्टिविटी भी मिलती है, जिसकी मदद से यह कई स्टेप वाले काम कर सकता है। 

    फ्री में कर सकते हैं इस्तेमाल
    Meta Muse AI का इस्तेमाल फ्री में किया जा सकता है. इसे Apple App Store या Google Play Store से डाउनलोड किया जा सकता है. हालांकि, फ्री इस्तेमाल के साथ कुछ यूसेज लिमिट भी देखने को मिल सकती है। 

  • Meta को बड़ा झटका! समझौते में चुकाने पड़ेंगे सवा 1 लाख करोड़ रुपये, पहले यूजर्स को लगाया था फोन का चस्का

    Meta को बड़ा झटका! समझौते में चुकाने पड़ेंगे सवा 1 लाख करोड़ रुपये, पहले यूजर्स को लगाया था फोन का चस्का

    कैलिफोर्निया

    Meta को लगा बड़ा झटका और अब देने पड़ेंगे 18 अरब डॉलर (1.15 करोड़ रुपये) की रकम है. कंपनी ने इस मोटी रकम पर समझौता करने पर सहमति दर्ज की है और कंपनी के खिलाफ चल रही एक बड़ी कानूनी लड़ाई को खत्म कर दिया है। 

    मेटा के खिलाफ ये केस कैलिफोर्निया के ओकलैंड स्थित कोर्ट में चल रहा था और अब समझौते के बाद यह मुकदमा खत्म होने जा रहा है. साथ ही दूसरे केस में भी मेटा को राहत मिलेगी। 

    केस में मेटा के ऊपर आरोप था कि उसने जानबूझकर ऐसे फीचर्स तैयार किए हैं, जो बच्चों को इन प्लेटफॉर्म की लत लगा रहे हैं. अब समझौते के तहत कंपनी की मोटी रकम भी देनी होगी और बच्चों की सुरक्षा के मद्देनजर नए निमयों के साथ अपने प्लेटफॉर्म का ऑपरेशन भी करना होगा। 

    दरअसल, मेटा पर अमेरिका की कई अदालतों में केस चल रहे हैं और कैलिफोर्निया कोर्ट में चल रहा केस उन्हीं में से एक है. इस केस में समझौते के बाद अन्य केस में भी मेटा को राहत मिल सकती है. साथ ही मेटा को अब नए नियमों को पालन करना होगा। 

    मेटा जैसे कई प्लेटफॉर्म पर आरोप 
    Meta, TikTok, Snapchat और YouTube जैसे प्लेटफॉर्म पर आरोप लगते रहे हैं कि वह बच्चों की मानसिक मानसिक सेहत पर नेगेटिव इफेक्ट डाल रहे हैं। 

    मार्क जकरबर्ग समेत कई लोगों की होनी थी गवाही
    मेटा ने जिस कोर्ट में समझौता किया है, वह हाल ही के दिनों में काफी चर्चा में रहा है. इस केस मेटा CEO मार्क जकरबर्ग समेत कई लोगों की गवाही होने की संभावना थी, हालांकि सुनवाई के दूसरे सप्ताह में ही यह केस समझौते पर पहुंच चुका है. इस मामले में कैलिफोर्निया, कोलोराडो, केंटकी और न्यू जर्सी के केस भी शामिल थे। 

    बाकी केस में भी मिलेगी राहत 
    इस केस में  कई दर्जनों राज्यों में शामिल थे, जिन्होंने तीन साल पहले Meta के प्लेटफॉर्म्स के डिजाइन फीचर्स और उनसे बच्चों को हुए नुकसान को लेकर मुकदमा दायर किए जा चुके हैं. इस केस में बाकी 25 राज्यों में बाद में मुकदमे चलने थे मगर अब इस समझौते के चलते वे मामले भी आगे नहीं बढ़ेंगे। 

  • बच्चों को एडिक्ट बना रहा सोशल मीडिया? अमेरिका में Meta पर बढ़ा दबाव, बैन के पक्ष में ज्यादातर लोग

    बच्चों को एडिक्ट बना रहा सोशल मीडिया? अमेरिका में Meta पर बढ़ा दबाव, बैन के पक्ष में ज्यादातर लोग

    वाशिंगटन

    सोशल मीडिया हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है. सुबह उठते ही इंस्टाग्राम खोलना हो या फेसबुक पर दोस्तों और परिवार की खबर लेना, करोड़ों लोग इन प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन अब अमेरिका में इन्हीं सोशल मीडिया कंपनियों के खिलाफ लोगों का गुस्सा बढ़ता दिख रहा है. एक नए Reuters/Ipsos सर्वे में 61 फीसदी अमेरिकियों ने कहा है कि सोशल मीडिया कंपनियों पर सरकार को और सख्त नजर रखनी चाहिए. इतना ही नहीं, 66 फीसदी लोग चाहते हैं कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने के लिए कंपनियों के लिए उम्र की वेरिफिकेशन जरूरी किया जाए। 

    अमेरिका में लोगों का मूड क्यों बदल रहा है?
    Reuters/Ipsos का यह सर्वे 4,505 अमेरिकी लोगों के बीच किया गया था और इसमें करीब 2 फीसदी का मार्जिन ऑफ एरर है. सर्वे में 61 फीसदी लोगों ने सोशल मीडिया कंपनियों पर ज्यादा सख्त निगरानी की मांग की. दिलचस्प बात यह है कि यह सोच सिर्फ किसी एक पोलिटिकल पार्टी तक सीमित नहीं है. 71 फीसदी डेमोक्रैक्ट और 62 फीसदी रिपब्लिकन ने ज्यादा निगरानी का समर्थन किया। 

    सबसे ज्यादा चिंता बच्चों को लेकर है. 66 फीसदी लोगों ने ऐसे कानूनों का समर्थन किया जिनमें सोशल मीडिया कंपनियों को 16 साल से कम उम्र के यूजर्स की उम्र चेक करनी पड़े. रिपब्लिकन्स में इसका समर्थन 74 फीसदी और डेमोक्रैट्स में 69 फीसदी रहा. यानी बच्चों को सोशल मीडिया से बचाने का मुद्दा अमेरिका में काफी हद तक दोनों तरफ के लोगों को एक साथ ला रहा है। 

    लोग खुद मानते हैं कि सोशल मनीडिया की लत लग सकती है
    सर्वे का एक और आंकड़ा काफी चौंकाने वाला है. 85 फीसदी अमेरिकियों का मानना है कि सोशल मीडिया बच्चों के लिए एडिक्टिव हो सकता है. लगभग इतनी ही बड़ी संख्या मानती है कि इसका इस्तेमाल बच्चों की मेंटल हेल्थ के लिए नुकसानदेह हो सकता है. वहीं दूसरी तरफ सोशल मीडिया को पसंद करने वालों की संख्या भी बहुत ज्यादा है. 70 फीसदी लोगों ने कहा कि इन प्लेटफॉर्म्स पर समय बिताना उन्हें मजेदार लगता है. 52 फीसदी लोगों ने माना कि वे सोशल मीडिया पर जरूरत से ज्यादा समय बिताते हैं। 

    यानी समस्या यह नहीं है कि लोग फेसबुक या इंस्टाग्राम इस्तेमाल ही नहीं करना चाहते. समस्या यह है कि लोग चाहते हैं कि इन कंपनियों पर कुछ नियम हों, खासकर जब बात बच्चों की हो। 

    मेटा के खिलाफ बढ़ता जा रहा है कानूनी दबाव
    यह सर्वे ऐसे समय आया है जब मेटा के खिलाफ अमेरिका में कई मामलों में कानूनी दबाव बढ़ रहा है. हाल ही में न्यू मेक्सिको की एक अदालत ने मेटा को 567 मिलियन डॉलर का भुगतान करने का आदेश दिया. यह पैसा युवाओं की मेंटल हेल्थ से जुड़े कामों के लिए इस्तेमाल किया जाना है. इससे पहले इसी मामले में Meta पर 375 मिलियन डॉलर का जूरी अवॉर्ड लगाया गया था. दोनों को जोड़ें तो इस मामले में कंपनी की कुल फाइनांशियल लाइब्लिटी करीब 942 मिलियन डॉलर हो जाती है 

    न्यू मेक्सिको के जज ब्रायन बीडशीड ने Meta के फेसबुक और इंस्टाग्राम के डिजाइन और बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठाए. अदालत ने मेटा को कई बदलाव करने का आदेश दिया है. इनमें बच्चों की उम्र की बेहतर जांच, नाबालिगों के लिए इस्तेमाल की कुछ सीमाएं, रात और स्कूल के समय नोटिफिकेशन्स बंद करना और कुछ मामलों में पेरेंट्स की अनुमति जैसी चीजें शामिल हैं. मेटा इस फैसले के खिलाफ अपील करने की तैयारी में है। 

    इस मामले में एक खास बात यह भी है कि अदालत ने मेटा के प्लेटफॉर्म्स को सिर्फ किसी एक बच्चे को नुकसान पहुंचाने वाली चीज के तौर पर नहीं देखा, बल्कि बड़े स्तर पर समाज पर असर डालने वाली समस्या के रूप में देखा. रॉयटर्स के मुताबिक जज ने Meta के डिजाइन को लेकर काफी सख्त रुख अपनाया. हालांकि अदालत के आदेश का असर सीधे न्यू मेक्सिको में है, वहां के अटॉर्नी जनरल का कहना है कि यह फैसला दूसरे मामलों के लिए एक उदाहरण बन सकता है। 

    फेसबुक और इंस्टाग्राम पर क्या बदल सकता है?
    इसका मतलब यह नहीं है कि कल से फेसबुक या इंस्टाग्राम बंद हो जाएंगे. बल्कि आने वाले समय में इन प्लेटफॉर्म्स पर एज वेरिफिकेशन और चाइल्ड सेफ्टी से जुड़े नियम और सख्त हो सकते हैं। 

    मिसाल के लिए न्यू मेक्सिको के आदेश में नाबालिगों के लिए रात और स्कूल के समय पुश नोटिफिकेशन पर रोक, उम्र की बेहतर जांच और बच्चों के अकाउंट को लेकर ज्यादा सख्त नियम शामिल हैं. कुछ मामलों में प्लेटफॉर्म को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि कम उम्र के बच्चे सिस्टम में अपनी सही उम्र छिपाकर अकाउंट न बना सकें 

    अमेरिका के कई राज्यों में पहले से ही बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर अलग-अलग कानून बनाए जा चुके हैं. कुछ जगहों पर एज वेरिफिकेशन, कुछ जगहों पर पेरेंट कंसेंट और कुछ जगहों पर बच्चों के लिए एडिक्टिव फीचर्स को लिमिट करने की कोशिश हो रही है। 

    Meta के लिए सबसे बड़ी चिंता सिर्फ जुर्माना नहीं है
    मेटा जैसी कंपनियों के लिए समस्या सिर्फ करोड़ों डॉलर का Fine नहीं है. अगर अलग-अलग राज्यों और अदालतों से ऐसे नियम आने लगते हैं जिनमें एज वेरिफिकेशन, नोटिफिकेशन रिकॉमेंडेशन और बच्चों के लिए दूसरे फीचर्स में बदलाव करना पड़े, तो कंपनियों को अपने पूरे प्रोडक्ट डिजाइन में बदलाव करना पड़ सकता है। 

    रॉयटर्स के मुताबिक 29 अमेरिकी राज्यों से जुड़ा एक अलग फेडरल ट्रायल भी 12 अगस्त से कैलिफोर्निया में शुरू होने वाला है. इसमें मेटा समेत दूसरी कंपनियों पर बच्चों और टीनेजर्स को लेकर इसी तरह के आरोपों की सुनवाई होनी है. मेटा इन 
    आरोपों से इनकार करता है। 

  • Meta के बाद अब अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सरकार की नजर, होगी जांच

    Meta के बाद अब अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सरकार की नजर, होगी जांच

    भारत सरकार मेटा के बाद अब अन्य प्लेटफॉर्म को भी बुलाने की योजना बना रही है. सरकार जांच करेगी कि वह अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं या नहीं. हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फेसबुक वीडियो को हटाने वाले मामले में मेटा को माफी मांगनी पड़ी है. अब सरकार अन्य प्लेटफॉर्म्स को भी बुलाने की योजना बना रही है.  

    सरकार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को बुलाकर यह जांच करेगी कि भारतीय कानून के तहत वे इंटरमीडियरी की परिभाषा में आते हैं या नहीं. ये जानकारी सूत्र के हवालों से मिली है.

    अगर Meta या अन्य प्लेटफॉर्म यह तय करते हैं कि कौन-सा कंटेंट किसे दिखाया जाए, तो यह पब्लिशिंग के कंटेंट के तहत आते हैं. ऐसे में प्लेटफॉर्म को अपने काम की जिम्मेदारी लेनी होगी.

    प्लेटफॉर्म तय करता है कि यूजर्स क्या देखें?
    सूत्र के मुताबिक, जब किसी प्लेटफॉर्म का रिकमेंडेशन सिस्टम यह तय करता है कि किस यूजर को कौन-सा कंटेंट दिखाया जाए, या वह पेड कंटेंट को प्रमोट करता है, तो उसके इंटरमीडियरी स्टेटस पर सवाल खड़े होते हैं.

    मेटा ऑफिसर ने कहा, जो हुआ गलत हुआ
    हाल ही में अमेरिका से भारत आए मेटा के चीफ ग्लोबल अफेयर्स ऑफिसर जोएल कैपलन ने लिखित बयान में माफी मांगी. उन्होंने नरेंद्र मोदी के फेसबुक पोस्ट पर लगी पोस्ट रिमूव होने पर खेत जताया. साथ ही मेटा सीईओ मार्क जकरबर्ग ने कुछ मामलों के लेकर खेत जताता है.

    केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव के साथ हुई थी मीटिंग
    मेटा अधिकारियों की ये मीटिंग केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव के साथ हुई. मेटा से पूछा गया कि क्या कंपनी पैसे लेकर कुछ अलग तरह के कंटेंट को प्रमोट करती है.

    नियम ना मानने पर खत्म होगा अधिकार  
    मेटा के साथ बातचीत के दौरान सरकार ने  सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की धारा 79 का जिक्र किया है. अगर कोई प्लेटफॉर्म मीडिएटर के रूप में अपनी कानूनी जिम्मेदारी का पालन नहीं करते हैं तो उनको मिलने वाली सेफ हार्बर सुविधा को खत्म किया जाएगा. सेफ हार्बर एक तरह की कानूनी सुरक्षा होती है.

  • मेटा की एल्गोरिद्म गलती पर सवाल, अब चाहिए टेक कंपनियों से जवाबदेही

    मेटा की एल्गोरिद्म गलती पर सवाल, अब चाहिए टेक कंपनियों से जवाबदेही

    साल 2016 था. तारीख 8 सितंबर. नॉर्वे के बड़े अखबार Aftenposten के पहले पन्ने पर एक खुला खत छपा. यह खत Meta के CEO मार्क जुकरबर्ग के नाम था. इसमें अखबार के एडिटर ने लिखा था कि उन्हें डर है कि दुनिया का सबसे बड़ा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अभिव्यक्ति की आजादी बढ़ाने के बजाय उसे खत्म कर रहा है. और कई बार यह काम ऐसे तरीके से हो रहा है, जो किसी लोकतांत्रिक समाज के लिए ठीक नहीं है.

    इस खत की वजह फेसबुक की एक बड़ी गलती थी. प्लेटफॉर्म ने वियतनाम युद्ध की एक मशहूर तस्वीर हटा दी थी. यह वही तस्वीर थी, जिसे पुलित्जर पुरस्कार मिला था. लेकिन फेसबुक के एल्गोरिद्म और ऑटोमैटिक फिल्टर ने उसे न्यूडिटी पॉलिसी का उल्लंघन मान लिया और पोस्ट डिलीट कर दी. जब इस फैसले पर दुनिया भर में सवाल उठे, तब फेसबुक ने माना कि उससे गलती हुई है. कंपनी ने कहा कि यह सब एक तकनीकी गड़बड़ी की वजह से हुआ.

    अब साल 2026 है. तारीख 28 जुलाई. इस बार फेसबुक ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो हटा दिया. वीडियो में ऐसा कुछ भी नहीं था, जिसे आपत्तिजनक कहा जा सके. लेकिन मेटा ने फिर वही जवाब दिया. कंपनी ने कहा कि यह एक तकनीकी गलती थी. दस साल का फर्क है. दोनों बार पोस्ट हटाई गई. दोनों बार बाद में वापस भी आ गई. और दोनों बार वजह बताई गई – तकनीकी गड़बड़ी.

    यही मेटा का तरीका बन चुका है. कंपनी की ओर से जब भी कोई बड़ी गलती होती है, उसके पीछे एल्गोरिद्म या तकनीकी गड़बड़ी का बहाना सामने आ जाता है. सवाल यह है कि क्या हर बार यही जवाब काफी है? क्या दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियां सिर्फ सॉरी बोलकर अपनी जिम्मेदारी खत्म कर सकती हैं?

    असल समस्या एल्गोरिद्म नहीं हैं. असली समस्या जवाबदेही की है. टेक कंपनियां लंबे समय से अपने प्रोडक्ट और सर्विस की जिम्मेदारी लेने से बचती रही हैं. वे नियमों के दायरे में काम करना कम पसंद करती हैं और अपने सिस्टम को एक ऐसे ब्लैक बॉक्स की तरह पेश करती हैं, जिसे कोई समझ नहीं सकता.

    मार्क जुकरबर्ग ने फेसबुक के शुरुआती दिनों में एक मशहूर लाइन कही थी – 'Move fast and break things' यानी तेजी से आगे बढ़ो, चाहे रास्ते में कुछ टूटता ही क्यों न हो. सिलिकॉन वैली की सोच लंबे समय तक इसी लाइन के आसपास घूमती रही. पहले प्रोडक्ट लॉन्च करो, बाद में अगर गलती होगी तो देख लेंगे. लेकिन अब सवाल यह है कि जब इन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल अरबों लोग कर रहे हैं, सरकारें कर रही हैं और दुनिया के बड़े नेता भी इन्हीं पर मौजूद हैं, तब क्या यही सोच सही मानी जा सकती है?

    भारत के लिए प्रधानमंत्री मोदी के वीडियो वाला मामला एक मौका भी है. यह सिर्फ एक पोस्ट हटने का मामला नहीं है. यह इस बात पर बहस शुरू करने का मौका है कि क्या बड़ी टेक कंपनियों को अपने एल्गोरिद्म और ऑटोमैटिक सिस्टम के लिए भी जवाबदेह बनाया जाना चाहिए. पिछले कुछ सालों में टेक कंपनियों ने एल्गोरिद्म को एक ऐसे ब्लैक बॉक्स में बदल दिया है, जिसके अंदर क्या हो रहा है, इसकी जानकारी किसी को नहीं होती. एल्गोरिद्म इंसानों ने बनाए हैं, इंसान ही उन्हें ट्रेन करते हैं और लगातार बदलते भी हैं. लेकिन जब कोई सवाल पूछा जाता है, तो जवाब मिलता है कि यह तो एल्गोरिद्म का फैसला था.

    ऐसे उदाहरण हर दिन देखने को मिलते हैं. ई-कॉमर्स वेबसाइट एक ही प्रोडक्ट अलग-अलग लोगों को अलग कीमत पर दिखाती हैं. वजह बताई जाती है – एल्गोरिद्म. Uber, Ola और Rapido कभी किराया बढ़ा देते हैं, कभी घटा देते हैं. इसके पीछे भी एल्गोरिद्म का हवाला दिया जाता है. इंस्टाग्राम पर कई लोगों के अकाउंट बिना किसी साफ वजह के सस्पेंड हो जाते हैं. जवाब मिलता है कि सिस्टम ने ऐसा किया. कई बार किसी अपमानजनक पोस्ट पर लाखों व्यूज आते रहते हैं और कोई कार्रवाई नहीं होती. वहीं दूसरी तरफ कोई सामान्य सवाल पूछने वाला यूजर भी अचानक बैन हो जाता है. वजह फिर वही – एल्गोरिद्म.

    यानी एल्गोरिद्म अब सिर्फ यह तय नहीं कर रहे कि आपको कौन-सी पोस्ट दिखेगी. वे यह भी तय कर रहे हैं कि आपकी आवाज कितने लोगों तक पहुंचेगी, कौन दिखेगा, कौन नहीं दिखेगा और किसका अकाउंट चलता रहेगा. अब 2026 है. और ऐसा लगता है कि एल्गोरिद्म की इस दुनिया से किसी को छूट नहीं है. यहां तक कि किसी देश के प्रधानमंत्री का वीडियो भी इससे नहीं बच पाया.

    इसीलिए अब सिर्फ माफी काफी नहीं है. Meta ने वीडियो वापस बहाल कर दिया है और माफी भी मांग ली है. आने वाले दिनों में यह भी हो सकता है कि खुद मार्क जुकरबर्ग भी माफी मांग लें. लेकिन भारत को बात सिर्फ माफी तक सीमित नहीं रखनी चाहिए.

    भारत को जवाबदेही मांगनी चाहिए. यह पूछना चाहिए कि आखिर ऐसा हुआ कैसे? एल्गोरिद्म किस आधार पर फैसला लेते हैं? तकनीकी गड़बड़ी कितनी बार हो सकती है? और जब ऐसी गलती होती है, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? अगर हर बार एल्गोरिद्म और टेक्निकल ग्लिच ही बचने का रास्ता बन जाएंगे, तो जवाबदेही का कोई मतलब नहीं बचेगा.

     

  • इंस्टाग्राम पर बच्चों से जुड़े आपत्तिजनक विज्ञापनों पर सरकार सख्त, मेटा से मांगा जवाब

    इंस्टाग्राम पर बच्चों से जुड़े आपत्तिजनक विज्ञापनों पर सरकार सख्त, मेटा से मांगा जवाब

    सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है. आरोप है कि इंस्टाग्राम पर ऐसे विज्ञापन दिखाई दे रहे थे, जो कथित तौर पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़े आपत्तिजनक कंटेंट तक पहुंच का दावा कर रहे थे. कुछ विज्ञापनों में यह भी कहा गया कि ऐसे वीडियो महज 99 रुपये में खरीदे जा सकते हैं. इस खुलासे के बाद भारत सरकार ने कड़ा रुख अपनाया है. इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने मेटा को तत्काल ऐसे सभी विज्ञापन और कंटेंट हटाने का आदेश दिया है. साथ ही कंपनी से सात दिनों के भीतर विस्तृत जवाब मांगा गया है. सरकार का कहना है कि बच्चों के यौन शोषण से जुड़े किसी भी कंटेंट के प्रति किसी तरह की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी.

    यह मामला सामने आने के बाद मेटा की कंटेंट मॉडरेशन व्यवस्था और उसके एल्गोरिदम पर भी सवाल उठने लगे हैं. सरकार ने केवल आपत्तिजनक विज्ञापन हटाने का निर्देश नहीं दिया है, बल्कि यह भी पूछा है कि आखिर ऐसे कंटेंट को प्लेटफॉर्म पर बढ़ावा कैसे मिला. सरकार ने मेटा से एल्गोरिदमिक प्रमोशन को रोकने के लिए सुधारात्मक कदम उठाने को कहा है. यह मामला सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही और ऑनलाइन बच्चों की सुरक्षा को लेकर एक बड़ी बहस का कारण बन गया है.

    सरकार हुई सख्त
    बीबीसी की एक जांच रिपोर्ट में दावा किया गया कि इंस्टाग्राम पर ऐसे कई पेड विज्ञापन दिखाई दिए जो कथित तौर पर चाइल्ड सेक्सुअल एक्सप्लॉइटेशन एंड एब्यूज मैटेरियल (CSEAM) तक पहुंच का प्रचार कर रहे थे. रिपोर्ट के अनुसार इन विज्ञापनों में यूजर्स को टेलीग्राम चैनलों पर भेजा जाता था, जहां कथित तौर पर 99 रुपये जैसी छोटी रकम लेकर अवैध सामग्री उपलब्ध कराने का दावा किया जाता था. इसी रिपोर्ट के सामने आने के बाद भारत सरकार ने मेटा अधिकारियों को तलब किया और जवाब मांगा.

    सरकारी सूत्रों के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने मेटा को स्पष्ट निर्देश दिया है कि इंस्टाग्राम पर मौजूद ऐसे सभी विज्ञापन और कंटेंट तुरंत हटाए जाएं, जो बच्चों के यौन शोषण से जुड़े अवैध कंटेंट तक पहुंच को बढ़ावा देते हों. साथ ही कंपनी को सात दिन के भीतर यह बताना होगा कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए वह कौन-कौन से तकनीकी और प्रशासनिक कदम उठाएगी.

    एल्गोरिदम पर भी उठे गंभीर सवाल
    सरकार ने इस मामले में केवल कंटेंट हटाने तक खुद को सीमित नहीं रखा है. मंत्रालय ने मेटा से यह भी पूछा है कि आखिर इंस्टाग्राम का एल्गोरिदम ऐसे विज्ञापनों और कंटेंट को यूजर्स तक पहुंचाने में कैसे भूमिका निभा रहा था. सरकार चाहती है कि कंपनी अपने सिस्टम में ऐसे बदलाव करे, जिससे भविष्य में किसी भी तरह के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट का प्रचार या प्रसार न हो सके.

    मेटा ने क्या कहा?
    मेटा ने बयान जारी कर कहा है कि कंपनी की नीति बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की है. कंपनी के अनुसार वह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और विशेषज्ञ टीमों की मदद से ऐसे कंटेंट की पहचान कर उसे हटाने का लगातार प्रयास करती है. मेटा ने यह भी कहा कि अपराधी लगातार नए तरीके अपनाते हैं, इसलिए प्लेटफॉर्म अपनी सुरक्षा तकनीकों को लगातार मजबूत कर रहा है और अन्य कंपनियों के साथ भी जरूरी सूचनाएं साझा करता है.

    भारतीय कानून क्या कहता है?
    भारत में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की धारा 67(B) के तहत बच्चों को यौन रूप से स्पष्ट या शोषण से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक कंटेंट का प्रकाशन, प्रसारण या प्रचार दंडनीय अपराध है. राष्ट्रीय साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल के अनुसार CSEAM उन सभी तस्वीरों, वीडियो या डिजिटल सामग्री को कहा जाता है, जिनमें किसी बच्चे का यौन शोषण या दुरुपयोग दर्शाया गया हो. ऐसे मामलों में संबंधित एजेंसियां कानूनी कार्रवाई कर सकती हैं और सोशल मीडिया कंपनियों की भी जवाबदेही तय की जाती है.

    सरकार ने समय-समय पर उन वेबसाइट को भी ब्लॉक किया है जिनमें बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामाग्री होती है. यह कार्रवाई इंटरपोल से मिली सूची के आधार पर की गई है, जो भारत की नेशनल नोडल एजेंसी सीबीआई को मिलती है. इस सप्ताह दूसरी बार मेटा नियामकीय जांच के दायरे में आया है.

    इससे पहले बुधवार को केंद्र सरकार ने मेटा को एक नोटिस जारी करके व्हाट्सऐप पर प्रस्तावित ‘यूजरनेम फीचर’ के बारे में सवाल पूछा. सरकार को चिंता है कि इससे ऑनलाइन धोखाधड़ी, ‘फिशिंग’, डिजिटल अरेस्ट घोटाला और किसी और का रूप धारण किए जाने वाले हमले काफी बढ़ सकते हैं. सरकार ने मंच को निर्देश दिया है कि जब तक इस मुद्दे पर सरकार की संतुष्टि के अनुसार बातचीत पूरी नहीं हो जाती, तब तक इस फीचर को रोक दिया जाए. सूत्रों का कहना है कि व्हाट्सऐप ‘यूजरनेम फीचर’ को पेश करने में देरी करेगा.

  • मेटा ने लॉन्च किया इंस्टाग्राम प्लस, भारत में 299 रुपये मंथली सब्सक्रिप्शन

    मेटा ने लॉन्च किया इंस्टाग्राम प्लस, भारत में 299 रुपये मंथली सब्सक्रिप्शन

    Meta ने अब इंस्टाग्राम प्लस पेड सब्सक्रिप्शन प्लान को पेश कर दिया है, जिसकी कीमत भारत में 299 रुपये मंथली है. इस प्लान के तहत यूजर्स को कई नए फीचर्स मिलेंगे.

    इंस्टाग्राम प्लस प्लान के तहत यूजर्स चोरी छिपे दूसरों की स्टोरीज भी देख सकेंगे. कंपनी ने कुछ दिन पहले ही अपने पॉपुलर ऐप्स इंस्टाग्राम, फेसबुक, WhatsApp के लिए नए सब्सक्रिप्शन प्लान लॉन्च किए हैं.

    इंस्टाग्राम प्लस के तहत यूजर्स को एडिशनल फीचर्स, बेहतर इनसाइट्स और बहुत से एक्सक्लूसिव फीचर्स भी मिलेंगे. हालांकि स्टैंडर्ड वर्जन भी मुफ्त में काम करता रहेगा, लेकिन जो यूजर्स एक्स्ट्रा और एडवांस्ड फीचर्स चाहते हैं, उनको 299 रुपये मंथली चार्ज देना होगा.

    सीक्रेट तरीके से देख सकेंगे स्टोरी
    इंस्टाग्राम प्लस के तहत कई खास फीचर्स स्टोरीज से जुड़े हैं. इस प्लान के तहत यूजर्स आसानी से किसी दूसरे शख्स की स्टोरी का सीक्रेट प्रीव्यू देख सकेंगे. साथ ही सब्सक्राइबर ये भी जान सकेंगे कि कितने लोगों ने उनकी स्टोरी को दोबारा देखा है.

    इंस्टाग्राम प्लस के तहत स्टोरी टाइम ड्यूरेशन को 24 घंटे से बढ़ाकर 48 घंटे तक हो जाती है. साथ ही यूजर्स हर सप्ताह एक स्टोरी को एक्स्ट्रा विजिबिलिटी के लिए स्पॉटलाइट कर सकते हैं.

    इंस्टाग्राम प्लस सब्सक्राइबर ये भी जान सकेंगे कि उनकी स्टोरी देखने वालों की लिस्ट में जाकर यह देख सकेंगे कि वह कौन-कौन सा कंटेंट देख रहा है.

    स्पेशल इमोजी और स्पेशल फॉन्ट्स भी मिलेंगे
    इंस्टाग्राम प्लस के तहत यूजर्स को एनिमेटेड सुपर हार्ट रिएक्शन मिलेंगे, जिनमें इंटरैक्शन के दौरान रंग बिरंगे एनिमेटेड हार्ट स्क्रीन पर दिखाई देगा. साथ ही सब्सक्राइबर्स को इंस्टाग्राम और क्रिएटर्स के लिए डिजाइन किए गए कस्टम ऐप आइकन व बायो के लिए स्पेशल फॉन्ट्स का एक्सेस मिलेगा.

    प्रोफाइल पिन्स फीचर भी मिलेगा
    इंस्टाग्राम प्लस के तहत एक और खास फीचर्स प्रोफाइल पिन्स मिलेगा, जिसकी मदद से यूजर्स अपने प्रोफाइल पर मैक्सिमम छह पोस्ट को पिन करके सबसे जरूरी पोस्ट को ऊपर रख सकेंगे.

    इंस्टाग्राम प्लस के तहत मिलने वाले फीचर्स
    स्टोरी रिवॉच काउंट : कितने लोगों ने स्टोरी दोबारा देखी, यह पता चलेगा.
    अनलिमिटेड स्टोरी ऑडियंस लिस्ट: क्लोज फ्रेंड्स के जैस ही  कई तरह कई कस्टम ऑडियंस लिस्ट तैयार कर सकेंगे.
    सीक्रेट स्टोरी प्रिव्यू: किसी भी शख्स की स्टोरी देखेंगे तो व्यूअर लिस्ट में आपका नाम नजर नहीं आएगा.
    48 घंटे तक स्टोरीजः स्टोरीज टाइमलाइन 24 घंटे की जगह 48 घंटे के लिए मिलेगी.
    वीकली स्टोरी स्पॉटलाइट : हर हफ्ते एक स्टोरी को एडिशनल विजिबिलिटी के प्रमोट कर सकेंगे.
    स्टोरी व्यूअर सर्चः स्टोरी देखने वाले लोगों की लिस्ट में किसी भी व्यक्ति को सर्च कर सकेंगे.

    मेटा ने रेवेन्यू स्ट्रैटेजी में किया बदलाव
    मेटा ने रेवेन्यू स्ट्रैटेजी को बदलते हुए सिर्फ विज्ञापन पर निर्भरता को कम करते हुए पेड प्लान को लॉन्च किया है, जिसके तहत कंपनी को रेवेन्यू के कई नए ऑप्शन मिलेंगे. कंपनी का कहना है कि आने वाले दिनों में प्लस सब्सक्राइबर के लिए और नए फीचर्स को शामिल किया जाएगा. 

  • Meta में बड़े पैमाने पर layoffs, कर्मचारियों की नींद खुली तो इनबॉक्स में था नौकरी खत्म होने का ईमेल

    Meta में बड़े पैमाने पर layoffs, कर्मचारियों की नींद खुली तो इनबॉक्स में था नौकरी खत्म होने का ईमेल

     नई दिल्ली

    मेटा ने बड़े स्तर पर छंटनी की शुरुआत कर दी है, जिसके लिए कंपनी ने 20 मई की सुबह 4 बजे कई लोगों को ईमेल नौकरी से निकालने का ईमेल किया. इसकी जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स मिली है. पुरानी रिपोर्ट्स में भी दावा किया जा चुका था कि 20 मई को कंपनी बड़े स्तर पर छंटनी करेगी। 

    मेटा अपनी ग्लोबल वर्कफोर्स में से 10 परसेंट यानी करीब 8 हजार कर्मचारियों को बाहर का रास्ते दिखाएगी. कंपनी ने इसकी शुरुआत सिंगापुर बेस्ड टीम के साथ की है. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में बताया है कि सिंगापुर के स्थानीय समय के अनुसार सुबह 4 बजे लोगों को ईमेल आया है। 

    मार्क जकरबर्ग का प्लान आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) में बड़ी इनवेस्टमेंट का है और इस साल भी वह अरबों डॉलर्स की रकम इनवेस्ट करने जा रहे हैं. मेटा ने बताया है कि दुनियाभर में उसके करीब 78 हजार कर्मचारी हैं। 

    7 हजार कर्मचारियों को न्यू AI टीम में डालने जा रही है
    मेटा के चीफ पीपुल ऑफिसर जेनेला गाले ने एक इनहाउस मेमो में कहा है कि 8 हजार नौकरी खत्म करने के अलावा कंपनी करीब 7 हजार कर्मचारियों को न्यू AI टीम में डालने जा रही है. कंपनी का फोकस अब छोटी टीम्स तैयार करना है। 

    छंटनी से प्रभावित कर्मचारियों की संख्या 16,000 तक पहुंच सकती है
    इन प्रस्तावित छंटनियों से अकेले शुरुआती चरण में ही मेटा के वैश्विक कर्मचारियों में से लगभग 10 प्रतिशत कमचारियों के प्रभावित होने की उम्मीद है। हालांकि कंपनी ने छंटनी की पूरी सीमा की आधिकारिक तौर पर पुष्टि नहीं की है, लेकिन सूत्रों ने रॉयटर्स को बताया कि 2026 में बाद में और भी नौकरियां कम होने की संभावना है, जिससे प्रभावित कर्मचारियों की कुल संख्या बढ़कर लगभग 16,000 तक पहुंच सकती है।

    रिपोर्ट के अनुसार, मेटा के अधिकारी अभी भी कर्मचारियों की प्रोडक्टिविटी और AI में हुई प्रोग्रेस के आधार पर छंटनी से जुड़ी जानकारियों को अंतिम रूप दे रहे हैं।

    हालांकि, ये छंटनी अचानक नहीं की जा रही है। मेटा के सीईओ मार्क जकरबर्ग ने पिछले एक साल में कई बार इस बात पर जोर दिया है कि कंपनी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में लीडर बनना चाहती है, जेनरेटिव टूल्स से लेकर उस इंफ्रास्ट्रक्चर तक, जो बड़े पैमाने पर मशीन लर्निंग सिस्टम को चलाता है। इस बदलाव को सपोर्ट करने के लिए, मेटा कथित तौर पर बड़े पैमाने पर पैसा खर्च की योजना बना रही है, जिसका अनुमान इस साल के लिए लगभग $135 बिलियन है; इसमें से ज्यादातर हिस्सा AI से जुड़े निवेशों, जैसे डेटा सेंटर, चिप और सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, के लिए रखा गया है।

    मेटा ने महामारी के दौर में 21,000 लोगों को निकाला था
    अगर Meta छंटनी की प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है, तो यह पिछले कुछ सालों में कंपनी में हुई नौकरियों की कटौती की एक और कड़ी होगी। यह मेटा में 2022 और 2023 में हुई छंटनी के पिछले दौर जैसा ही है, जब कंपनी ने धीमी ग्रोथ और महामारी के दौर में हुए जरूरत से ज्यादा विस्तार के नतीजों के चलते लगभग 21,000 नौकरियां खत्म कर दी थीं। उस दौर को, जिसे जकरबर्ग नें year of efficiency नाम दिया था, ऑपरेशन्स को सुव्यवस्थित करने, मैनेजमेंट के स्तरों को कम करने और वित्तीय अनुशासन को बेहतर बनाने के लिए किए गए ठोस प्रयासों के लिए जाना जाता है।

    हालांकि, अब होने वाली छंटनी एक ज्यादा सुगठित संगठन बनाने की बड़ी मुहिम का हिस्सा है। कहा जा रहा है कि कंपनी अधिकारी मैनेजमेंट के स्तरों को कम करने और AI-बेस्ड प्रोसेस पर ज्यादा निर्भरता बढ़ाने पर जोर दे रही है। अंदरूनी तौर पर, मेटा ने अपनी AI प्राथमिकताओं के हिसाब से टीमों को फिर से व्यवस्थित करना शुरू कर दिया है। इंजीनियरों को ऐसे प्रोजेक्ट्स पर काम करने के लिए फिर से नियुक्त किया गया है जो कोड लिखने और मुश्किल कामों को संभालने में सक्षम ऑटोनॉमस सिस्टम बनाने पर केंद्रित हैं, जबकि AI-बेस्ड प्रोडक्ट्स को तेजी से बाजार में लाने के लिए नई यूनिट्स बनाई गई हैं।

    2026 में बड़े पैमाने पर छंटनी, अब तक 73,000 की नौकरी गई
    इस बदलाव में Meta अकेली नहीं है। इन बदलावों का असर पूरी टेक इंडस्ट्री में महसूस किया जा रहा है, जहां बड़ी कंपनियां एक तरफ नौकरियों में कटौती कर रही हैं, तो वहीं दूसरी तरफ AI में अपना निवेश बढ़ा रही हैं। उदाहरण के लिए, Amazon ने हाल के महीनों में कथित तौर पर लगभग 30,000 कॉर्पोरेट पदों को खत्म कर दिया है, जो उसके व्हाइट-कॉलर वर्कफोर्स का लगभग 10 प्रतिशत है। इसी तरह, फिनटेक कंपनी Block ने भी अपने वर्कफोर्स में काफी कटौती की है।

    Layoffs.fyi के आंकड़ों से इस बदलाव के पैमाने का पता चलता है। इस प्लेटफॉर्म के अनुसार, इस साल अब तक दुनिया भर की 95 कंपनियों में 73,000 से ज्यादा टेक कर्मचारियों को नौकरी से निकाला जा चुका है।

    मेटा ने बीते महीने कर दिया था कंफर्म
    छंटनी की रिपोर्ट्स सामने आने के बाद बीते महीने ही मेटा ने कंफर्म कर दिया था कि वह करीब 8 हजार लोगों की छंटनी करने जा रहे हैं. इसके बाद कर्मचारियों को मनोबल गिर गया। 
    मेटा सीईओ मार्क जकरबर्ग ने AI को कंपनी की सबसे बड़ी प्राथमिकता पर ला दिया है. दरअसल, Meta, Google और OpenAI जैसी कंपनियों की बराबरी करने के लिए AI लेवल पर नए इनोवेशन करना जरूरी है. मेटा बीते महीने ही कह चुका है कि वह इस साल 125 अरब डॉलर से 145 अरब डॉलर के बीच AI पर इनवेस्टमेंट का प्लान बना रहे हैं। 

    दूसरी कंपनियां भी छंटनी की तैयारी में
    बीते सप्ताह Cisco ने पिछले हफ्ते 4 हजार लोगों को बाहर निकालने की जानकारी दी थी. वहीं माइक्रोसॉफ्ट, ऐमेजॉन और अन्य कंपनियां भी हाल ही में छंटनी की जानकारी दे चुकी हैं।