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  • घरेलू हिंसा मामले में पत्नी के रिश्तेदार भी आरोपी हो सकते हैं

    घरेलू हिंसा मामले में पत्नी के रिश्तेदार भी आरोपी हो सकते हैं

    बिलासपुर.

    हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले में सुनवाई करते हुए कहा है कि घरेलू हिंसा के मामलों में केवल पति ही नहीं, बल्कि परिवार के अन्य सदस्य जैसे सास, बहू, ननद और उसके मायके पक्ष के लोग भी दायरे में आ सकते हैं.

    हाईकोर्ट के सिंगल बेंच ने बहू और उसके परिजनों की याचिका खारिज करते हुए कहा है कि साझा घर और पारिवारिक रिश्तों से जुड़े विवादों का फैसला बिना सबूतों और गवाहों के शुरुआती स्तर पर नहीं किया जा सकता, इसके लिए ट्रायल जरूरी है. इस मामले में महत्वपूर्ण बात यह है कि यहां शिकायत किसी बहू ने अपनी सास के खिलाफ नहीं बल्कि सास और ननद ने अपनी बहू और उसके मायके पक्ष के लोगों के खिलाफ दर्ज कराई थी.

    दरअसल रायपुर निवासी निर्मला अग्निवंशी और उनकी बेटी श्रुति अग्निवंशी ने रायपुर की निचली अदालत में घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 की धारा 12 के तहत एक शिकायत दर्ज कराई थी. इस शिकायत में उन्होंने अपनी बहू अनिशा अग्निवंशी और बहू के मायके पक्ष के भाई बहनों व अन्य रिश्तेदारों सुषमा सिंह, अभिषेक सिंह, अविनाश सिंह, अंजू सिंह और अलका सिंह को आरोपी बनाया था. इन पर आरोप लगाया कि बहू और उसके परिवार के लोग लगातार उसके साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं, मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहे हैं और उन्हें घर से अलग करने के लिए दवाब बना रहे हैं.

    बहू और उसके परिजनों ने निचली अदालत में तर्क पेश करते हुए कहा कि वे साझा घर में एक साथ नहीं रहते हैं इसलिए उनपर घरेलू हिंसा का कानून लागू नहीं होता. निचली अदालत ने उनके तर्क को खारिज कर दिया, जिसके वे निचली अदालत के निर्णय के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंचे, जहां हाईकोर्ट ने भी याचिकाकर्ताओं को राहत नहीं दी है.

  • PoK Election Violence: रावलकोट से आई खौफनाक तस्वीरें, चुनाव में धांधली के आरोप; कई लोगों की मौत का दावा

    PoK Election Violence: रावलकोट से आई खौफनाक तस्वीरें, चुनाव में धांधली के आरोप; कई लोगों की मौत का दावा

    रावलकोट

    पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoJK) में स्थानीय चुनावों के पहले चरण के दौरान भारी हिंसा, खूनखराबा और अराजकता फैल गई है। एक ओर जहां राजनीतिक पार्टियां एक-दूसरे पर खुलेआम चुनाव में धांधली का आरोप लगा रही हैं, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तानी सुरक्षा बलों की गोलीबारी ने रावलकोट और कोटली जैसे इलाकों को युद्धक्षेत्र में बदल दिया है।

    रावलकोट के भयावह हालात: सड़कों पर लाशें और खून
    रावलकोट में पिछले 52 दिनों से चल रहे 'जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी' (JAAC) के प्रदर्शनों को कुचलने के लिए पाकिस्तानी बलों द्वारा की गई कार्रवाई ने खौफनाक रूप ले लिया है। स्थानीय लोगों के बयान बेहद डरावने हैं। रावलकोट में मौजूद चश्मदीद और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर अकील भाई ने वीडियो जारी कर बताया कि वहां हर तरफ लाशें और घायल लोग नजर आ रहे हैं। उन्होंने भारी हथियारों से की गई फायरिंग का जिक्र करते हुए कहा कि कश्मीरियों का खून सड़कों पर बह रहा है।

    प्रदर्शनकारियों का दावा है कि पाकिस्तानी रेंजर्स ने शांतिपूर्ण तरीके से मार्च कर रहे लोगों पर सीधे गोलियां चलाईं। एक घटना में 15 से 20 लोगों को गोली लगने की पुष्टि हुई है, जिससे हताहतों की संख्या काफी अधिक होने की आशंका है।

    अस्पतालों में एंबुलेंस और गाड़ियां कम पड़ गई हैं, और लोग अपने कंधों पर घायलों को ले जाने के लिए मजबूर हैं। स्थानीय लोगों ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया और मानवाधिकार संगठनों से तत्काल हस्तक्षेप की गुहार लगाई है।

    एक चश्मदीद ने बताया, "हालात बहुत ज्यादा खराब हो चुके हैं। रावलकोट में लाशें ही लाशें हैं। जख्मी ही जख्मी हैं। खुदा हमारा साथ दे। अभी अपनी जान बचाकर आया हूं। जो भी नेशनल मीडिया देख रही है, प्लीज हमारा साथ दें। बेशुमार लाशें पड़ी हैं।"

    चुनाव में खुलेआम धांधली और हत्या
    मीरपुर डिवीजन की 13 विधानसभा सीटों पर हो रहे मतदान का पहला चरण बड़े पैमाने पर चुनावी अनियमितताओं और राजनीतिक हिंसा का शिकार हुआ है। कोटली जिले के निक्याल में मतदान के दौरान पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) के 35 वर्षीय कार्यकर्ता मुख्तार यूनुस की गोली मारकर हत्या कर दी गई।

    PPP के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो-जरदारी ने चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाते हुए हत्या और बूथ कैप्चरिंग का सीधा आरोप पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) के समर्थकों पर लगाया है।

    पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) ने इस चुनाव का पूरी तरह बहिष्कार किया है। स्थानीय अधिकारियों का आरोप है कि इस चुनाव के नतीजे पाकिस्तान की सेना पहले ही तय कर चुकी है, ताकि क्षेत्र में उनका नियंत्रण और कड़ा हो सके।

    विरोध प्रदर्शन की मुख्य वजह
    PoJK में यह गुस्सा अचानक नहीं भड़का है। लगातार चल रहे इस जन-आंदोलन की प्रमुख वजहें इस प्रकार हैं।

        600 से अधिक नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है, जिनकी रिहाई की मांग हो रही है। सरकार ने नागरिक अधिकारों की बात करने वाली समिति JAAC को प्रतिबंधित कर दिया है।

        लोग महंगाई, बिजली-पानी की कमी और संसाधनों के भारी शोषण के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं।

        विधानसभा में शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों को खत्म करने की मांग को लेकर भी लंबे समय से तनाव बना हुआ था, जिसे प्रशासन ने खारिज कर दिया।

    चुनाव की आड़ में पाकिस्तानी सेना और प्रशासन द्वारा नागरिक अधिकारों के दमन ने PoJK में मानवाधिकारों का गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। धांधली और राज्य प्रायोजित हिंसा ने वहां के लोगों को बगावत पर मजबूर कर दिया है।