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  • लंबी लड़ाई के लिए चीन तैयार! नए कानून से नागरिकों से लेकर निजी कंपनियों तक पर बढ़ेगा सरकार का नियंत्रण

    लंबी लड़ाई के लिए चीन तैयार! नए कानून से नागरिकों से लेकर निजी कंपनियों तक पर बढ़ेगा सरकार का नियंत्रण

     बीजिंग
    चीन लंबे और बड़े संघर्ष की तैयारी को अब केवल सेना तक सीमित नहीं रख रहा। संशोधित राष्ट्रीय रक्षा लामबंदी कानून के जरिए वह नागरिकों, निजी संपत्ति और प्रौद्योगिकी कंपनियों को भी अपने युद्धकालीन तंत्र में खींच रहा है। 28 अगस्त को पारित और 1 अक्टूबर से प्रभावी यह कानून राज्य को रक्षा-सहायता कर्तव्य लागू करने, निजी संसाधन तत्काल अधिग्रहित करने तथा नागरिक तकनीक और डेटा को सैन्य अभियानों से जोड़ने की व्यापक शक्ति देता है। रिपोर्ट के अनुसार, बीजिंग सिर्फ युद्ध शुरू करने नहीं, उसे लंबे समय तक चलाने की तैयारी कर रहा है।

    दरअसल, यह संशोधन 2010 के पुराने कानून का 16 वर्षों बाद पहला बड़ा बदलाव है। आधिकारिक परिभाषा के अनुसार, रक्षा लामबंदी अब केवल सैनिकों की भर्ती नहीं, बल्कि संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता, सुरक्षा और विकास हितों पर खतरे के समय शांतिकाल से युद्धकाल में तेजी से संक्रमण तथा आर्थिक-सामाजिक शक्ति को रक्षा शक्ति में बदलने की व्यवस्था है। यानी उद्योग, परिवहन, डेटा, नवाचार और नागरिक श्रम, सब युद्ध क्षमता का हिस्सा माने जा सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इस नये कानून में पांच ऐसे प्रावधान है, जिनका आम चीनी नागरिकों, निजी मालिकों और कंपनियों पर सबसे सीधा और गंभीर असर पड़ सकता है।

    नागरिकों पर अनिवार्य रक्षा कर्तव्य
    बताया जा रहा है कि लामबंदी आदेश जारी होने के बाद 18 से 60 वर्ष के पुरुष और 18 से 55 वर्ष की महिला नागरिकों के लिए रक्षा-सहायता कर्तव्य अनिवार्य हो सकते हैं। गर्भावस्था, बीमारी या कुछ विशेष सेवाओं जैसे सीमित अपवादों को छोड़कर कामकाजी उम्र का बड़ा हिस्सा युद्ध प्रयास से बाहर नहीं रह सकेगा। नागरिकों को मोर्चे पर हथियार लेकर भेजना जरूरी नहीं। उन्हें रसद, परिवहन, नागरिक सुरक्षा, निकासी, मरम्मत, गोदाम प्रबंधन या सैन्य सहायता अभियानों में लगाया जा सकता है। व्यवहार में इसका अर्थ यह है कि युद्ध या आपात स्थिति में व्यक्ति यह नहीं चुन सकेगा कि वह युद्ध प्रयास में शामिल होगा या नहीं। राज्य तय करेगा कि उसकी श्रमशक्ति कहां लगेगी।

    शीर्ष खुफिया सूत्रों का कहना है कि बीजिंग नागरिक लामबंदी इसलिए बढ़ा रहा है क्योंकि लंबे युद्ध को केवल नियमित सक्रिय-ड्यूटी बलों से नहीं चलाया जा सकता। आधुनिक संघर्ष में मोर्चे के पीछे का काम ( ईंधन, पुर्जे, भोजन, संचार, चिकित्सा और साइबर सहायता)उतना ही निर्णायक हो सकता है जितना अग्रिम पंक्ति में तैनात बव

    निजी संपत्ति पर राज्य का तत्काल अधिकार
    कानून का दायरा श्रम से आगे जाकर नागरिकों और निजी संगठनों की संपत्ति तक फैला हुआ है। लामबंदी की जरूरत पर अधिकारी निजी वाहन, आवास और अचल संपत्ति, संचार नेटवर्क, सुविधाएं, उपकरण और अन्य संसाधन मांग सकते हैं। यह प्रावधान मालिक के नियंत्रण को उस क्षण निलंबित कर देता है जब राज्य यह तय करे कि वह संसाधन लामबंदी के लिए आवश्यक है। संघर्ष या आपात काल में नागरिक कार, गोदाम, दफ्तर, फैक्ट्री लाइन या नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर बीजिंग के निपटान में आ सकते हैं।

    और भी कठोर पहलू यह है कि अधिग्रहण आदेश मिलते ही संपत्ति तुरंत सौंपनी होगी। वित्तीय मूल्यांकन या मुआवजे का निपटारा पहले पूरा होना जरूरी नहीं। मुआवजा बाद में लामबंदी ढांचे के तहत तय हो सकता है। यानी तत्काल आर्थिक और भौतिक नुकसान उस व्यक्ति या कंपनी पर पड़ता है जिसे संपत्ति सौंपने का आदेश दिया गया है। मालिक अदालत या बाजार भाव का इंतजार करके आदेश टाल नहीं सकेगा।

    बता दें कि पुराने कानून में मुख्य रूप से 'अस्थायी उपयोग' की भाषा थी, जबकि नई व्यवस्था में संग्रहण और अधिग्रहण दोनों का दायरा बढ़ाया गया है। इससे राज्य न केवल अस्थायी कब्जा ले सकता है, बल्कि जरूरत पड़ने पर संसाधनों को रक्षा तंत्र में अधिक स्थायी रूप से खपा सकता है।

    नागरिक तकनीक और डेटा का सैन्यीकरण
    तीसरा बड़ा बदलाव डिजिटल अर्थव्यवस्था को युद्ध मशीन से जोड़ने का है। नागरिक प्रौद्योगिकी कंपनियों, डिजिटल प्लेटफॉर्म संचालकों और डेटा-इंफ्रास्ट्रक्चर प्रबंधकों को रक्षा लामबंदी के लिए तकनीकी पहुंच, परिचालन सहायता और बुनियादी ढांचे पर नियंत्रण देना अनिवार्य हो सकता है।

    इसका सीधा अर्थ है कि शांतिकाल में निजी मानी जाने वाली सेवाएं ( क्लाउड, मैपिंग, लॉजिस्टिक्स सॉफ्टवेयर, भुगतान प्रणाली, सोशल प्लेटफॉर्म का डेटा ढांचा, एआई मॉडल या साइबर सुरक्षा उपकरण) युद्धकाल में सैन्य उपयोग के लिए खुल सकती हैं। नागरिक उच्च-तकनीक गतिविधि और सैन्य अभियान के बीच की रेखा धुंधली पड़ जाती है।

    रिपोर्ट के अनुसार, साइबर क्षमता और डेटा सिस्टम की अनिवार्य तैनाती पीएलए को दोहरे उपयोग वाले नागरिक नवाचार तक तत्काल पहुंच देगी। चीन के सैन्य सुधारों में बार-बार यह कमी रेखांकित हुई है कि पारंपरिक बल आधुनिक सूचना युद्ध की गति से मेल नहीं खाते। नया कानून इसी अंतर को नागरिक क्षेत्र से पाटने की कोशिश दिखता है।

    आधिकारिक भाषा में भी 'उन्नत तकनीक का रक्षा लामबंदी में उपयोग' और 'उभरते क्षेत्रों में लामबंदी शक्ति विकसित करना' जोड़ा गया है। यानी कम ऊंचाई वाली अर्थव्यवस्था, ड्रोन, उपग्रह सेवाएं, महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला और डेटा सेवाएं अब रक्षा तैयारी का हिस्सा मानी जाएंगी।

    आदेश मानने से इनकार पर जुर्माना और मुकदमा
    लामबंदी तभी काम करती है जब आदेश का पालन तेज और बिना शर्त हो। इसीलिए दंड प्रावधानों को कानून की रीढ़ बताया गया है। स्थानीय अधिकारियों को उन उद्यमों पर भारी जुर्माना लगाने और कार्रवाई करने का अधिकार दिया गया है जो मसौदा आह्वान, श्रम आदेश या संपत्ति अधिग्रहण मानने से इनकार करें।

    गंभीर उल्लंघन पर व्यक्तियों और संगठनों के खिलाफ आपराधिक अभियोजन भी हो सकता है। व्यावहारिक भाषा में, युद्धकालीन लामबंदी आदेश का प्रतिरोध केवल प्रशासनिक चूक नहीं, अपराध बन सकता है। इससे कंपनियां कानूनी जोखिम के डर से पहले ही राज्य के साथ तालमेल बढ़ाने को मजबूर हो सकती हैं, चाहे वे वाहन बेड़ा चलाती हों, गोदाम रखती हों या सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म संचालित करती हों।

    अर्थव्यवस्था, प्रतिबंध और लंबी लड़ाई की तैयारी
    इन चार प्रावधानों के पीछे पांचवां, अधिक रणनीतिक तर्क है। सूत्रों के अनुसार, पुनर्गठन का उद्देश्य चीन को लंबे संघर्ष के आर्थिक दबाव से निपटने योग्य बनाना भी है। आर्थिक सुरक्षा, रसद और आपूर्ति श्रृंखलाओं को लामबंदी प्रोटोकॉल में लाने से बीजिंग अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को अपेक्षाकृत तेजी से अवशोषित कर सकता है और साथ ही ईंधन, पुर्जे, खाद्य सामग्री, इलेक्ट्रॉनिक्स और महत्वपूर्ण कच्चे माल की आपूर्ति बनाए रख सकता है।

    बता दें कि आधुनिक युद्ध केवल तोप और जहाज का नहीं, फैक्ट्री शिफ्ट, बंदरगाह क्षमता, रेलवे स्लॉट, चिप लाइन, क्लाउड सर्वर और ट्रक बेड़े का भी युद्ध है। नया कानून इन्हीं नागरिक स्तंभों को कानूनी रूप से रक्षा तंत्र से बांधता है। लंबे संघर्ष में जो देश अपनी नागरिक अर्थव्यवस्था को तेजी से युद्ध अर्थव्यवस्था में बदल सके, वही टिका रह सकता है।

    भारत के लिए इसका क्या मतलब है?
    अब सवाल उठता है कि भारत के लिए इसका क्या मतलब है? दरअसल, विस्तारित लामबंदी क्षमता बीजिंग को वास्तविक नियंत्रण रेखा सहित विवादित मोर्चों पर दीर्घकालिक रसद बनाए रखने में मदद कर सकती है। एलएसी जैसे ऊंचाई वाले मोर्चे पर निर्णायक तत्व अक्सर सिर्फ टुकड़ियों की संख्या नहीं, बल्कि सर्दी में ईंधन, राशन, गोला-बारूद, इंजीनियरिंग सामग्री, चिकित्सा सहायता और संचार लिंक को महीनों तक बनाए रखना होता है। यदि नागरिक ट्रक, गोदाम, निर्माण कंपनियां, टेक प्लेटफॉर्म और डेटा नेटवर्क कानूनी रूप से लामबंदी में खिंच सकते हैं, तो सीमा पर टिकाऊ तैनाती की लागत और गति दोनों बदल सकती है।

    इससे साफ है कि चीन न केवल किसी संघर्ष में प्रवेश करने की प्रारंभिक लामबंदी की तैयारी कर रहा है, बल्कि उस संघर्ष को लंबे समय तक चलाने के लिए जरूरी संसाधन ( श्रम, संपत्ति, तकनीक, डेटा और आपूर्ति श्रृंखला) भी पहले से कानूनी ढांचे में समेट रहा है।

  • इजरायल-ईरान में फिर जंग का खतरा! ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमलों से दुनिया की बढ़ सकती है चिंता

    इजरायल-ईरान में फिर जंग का खतरा! ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमलों से दुनिया की बढ़ सकती है चिंता

    तेहरान 
    मध्य-पूर्व में हाल में लंबे समय से थमी जंग एक बार फिर शुरू हो सकती है। इज़रायली मीडिया के अनुसार, इज़रायल की नेतन्याहू सरकार ईरान पर एक और हमला करने की तैयारी कर रही है, जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनका प्रशासन वॉशिंगटन और तेहरान के बीच बढ़ते तनाव का कूटनीतिक समाधान खोजने की कोशिश कर रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इज़रायल के ऊर्जा मंत्री एली कोहेन ने कहा है कि तेल अवीव अमेरिका और ईरान के बीच हुए किसी भी समझौते से बंधा हुआ महसूस नहीं करेगा और ईरान पर हमले करेगा।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि इजरायल अब ईरान के ऊर्जा ठिकानों को निशाना बनाने की प्लानिंग कर रहा है। मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि पारंपरिक सैन्य विकल्पों के खत्म होने और कूटनीतिक प्रयासों के विफल होने के संकेतों के बीच, अब इज़रायल और ईरान दोनों ही देश एक-दूसरे के ऊर्जा ठिकानों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। बता दें कि ईरान पहले ही खाड़ी क्षेत्र में तेल और गैस सुविधाओं पर हमला करने की अपनी क्षमता दिखा चुका है।

    इजरायली ऊर्जा ठिकानों के लिए चिंता
    इससे यह चिंता भी बढ़ गई है कि इजरायल का कोई भी एकतरफा हमला ईरान की ओर से व्यापक जवाबी कार्रवाई को भड़का सकता है, जिसमें पूरे क्षेत्र में ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया जा सकता है। ऐसे में अगर दोनों देशों के बीच फिर से जंग शुरू हुई तो इज़रायल की ऊर्जा संपत्तियां भी ईरान के सीधे हमलों की चपेट में आ सकती हैं, जिससे किसी भी नए संघर्ष का असर सैन्य लक्ष्यों से कहीं आगे तक फैल सकता है।

    अमेरिका बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ रहा
    मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि एक तरफ इजरायल जहां ईरान संग तनाव बढ़ाने के संकेत दे रहा है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका इस तनाव से बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ रहा है। इसलिए, मिसाइलों के नए दौर से ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर टकराव के केंद्र में आ सकता है, और हमले सैन्य ठिकानों से आगे बढ़कर महत्वपूर्ण ऊर्जा सुविधाओं तक फैल सकते हैं। तनाव में ऐसी बढ़ोतरी क्षेत्रीय ऊर्जा आपूर्ति को बाधित कर सकती है और वैश्विक तेल की कीमतों में और बढ़ोतरी का दबाव बना सकती है, जिससे इस संघर्ष में एक आर्थिक पहलू भी जुड़ जाएगा।

  • अमेरिका से ट्रेड वॉर में कूदा कनाडा! PM कार्नी ने कहा- ‘हम जंग में’, 50% टैरिफ के जवाब में लिया बड़ा फैसला

    अमेरिका से ट्रेड वॉर में कूदा कनाडा! PM कार्नी ने कहा- ‘हम जंग में’, 50% टैरिफ के जवाब में लिया बड़ा फैसला

    ओटावा 
    कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने अमेरिका पर 'डॉलर टू डॉलर' जवाबी टैरिफ लगाने का ऐलान किया है. कार्नी ने शनिवार को ओटावा में बोलते हुए कहा कि नए कनाडाई टैरिफ, अमेरिकी इस्पात, डेयरी और इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्‍य उद्योगों पर 8 सितंबर से लागू होंगे। 

    कार्नी ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि कनाडा अपने श्रमिकों, किसानों, परिवारों और व्यवसायों की रक्षा के लिए अमेरिका द्वारा लगाए गए नए टैरिफ का डटकर मुकाबला करेगा। 

    कनाडा की ओर से यह टैरिफ अमेरिका द्वारा लगाए गए 50 फीसदी टैरिफ के बाद लगाया गया है. कनाडा-अमेरिका के बीच तीन दिन तक चले गहन बातचीत के बाद, जब दोनों देशों में व्‍यापार को लेकर सहमति नहीं बन पाई तो अमेरिका ने 50 फीसदी टैरिफ लगा दिया, जिसके जवाब में कनाडा ने टैरिफ लगाने का ऐलान किया है. इन दोनों देशों द्वारा टैरिफ लगाने के बाद एक ट्रेड वाार की शुरुआत हो चुकी है। 

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से लगाए गए नए टैरिफ से शराब, फर्नीचर, डेयरी उत्पाद, सीमेंट, कपड़े, मछली पकड़ने की छड़ें और हॉकी उपकरण सहित कई क्षेत्र प्रभावित हुए हैं, और ये लगभग 20 अरब डॉलर मूल्य के सामान, या अमेरिका को कनाडा के निर्यात का 5.5 प्रतिशत, को कवर करते हैं। 

    शर्तें मानने लायक नहीं थीं 
    कनाडा के पीएम ने कहा कि ट्रंप की ओर से ऐसी शर्तें पेश की गईं, जो मानने के लायक नहीं थीं. यह आर्थिक तौर पर अनुचित थीं और कनाडा के लिए कुल लाभों को कम करती थीं और किसी भी समझौते की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती थीं. उन्होंने आगे कहा कि ये शर्तें कनाडा की नए व्यापार समझौते करने की क्षमता को सीमित कर रही थीं। 

    अपने 22 मिनट के भाषण में कार्नी ने कहा कि अगर अमेरिका अपने टैरिफ में काफी कमी करता है, तो कनाडा भी अमेरिकी एल्युमीनियम, स्टील और मोटर वाहनों पर मौजूदा जवाबी टैरिफ हटाने के लिए तैयार है. उन्होंने यह भी कहा कि कनाडा अमेरिकी शराब की बिक्री फिर से शुरू करने के लिए भी तैयार है। 

    हम पर हुआ हमला 
    उन्‍होंने आगे कहा कि जब आप पर हमला होता है तो आप जंग की स्थिति में होते हैं और हमपर हमला हुआ है, हम अब व्‍यापार जंग कि स्थिति में हैं… कनाडा के पीएम ने कहा कि ट्रंप प्रशासन द्वारा प्रस्तावित अंतिम शर्तें अस्वीकार्य थीं. उन्होंने बहुत अधिक मांग की और बहुत कम पेशकश की. हम उनकी पेशकश स्वीकार नहीं कर सकते और हम उनकी मांग पूरी नहीं करेंगे. हम कनाडा की संप्रभुता से समझौता करने या अपने प्रमुख उद्योगों को कमजोर करने के लिए तैयार नहीं थे। 

    कार्नी ने कहा कि व्यापार युद्ध ने कनाडा और उसके दक्षिणी पड़ोसी के संबंधों में एक मौलिक बदलाव ला दिया है. उन्होंने कहा कि हमने शुरू से ही यह स्वीकार किया है कि अमेरिका बदल गया है. हम यह भी मानते हैं कि कभी-कभी, उसके हस्ताक्षर पेंसिल से लिखे जाते हैं. अब हम पुराने संबंधों की ओर वापस नहीं जा रहे हैं. 

    अमेरिका पर निर्भर है कनाडा
    गौरतलब है कि कनाड अमेरिका पर ज्यादा निर्भर है. कनाडा अमेरिका से 70 फीसदी चीजें आयात करता है. ऐसे में नए टैरिफ से कनाडा में महंगाई का खतरा बढ़ गया है, लेकिन फिर भी कनाडा के पीएम ने अमेरिका को कड़ा रुख दिखाया है.
     

  • क्या ईरान युद्ध लंबा खिंचेगा? 100 दिन तक चल सकती है जंग, अमेरिकी सेना ने बढ़ाई इंटेलिजेंस तैनाती

    क्या ईरान युद्ध लंबा खिंचेगा? 100 दिन तक चल सकती है जंग, अमेरिकी सेना ने बढ़ाई इंटेलिजेंस तैनाती

    वाशिंगटन
    अमेरिकी सेना ने ईरान के खिलाफ चल रहे सैन्य अभियानों का समर्थन करने के लिए पेंटागन से अतिरिक्त खुफिया कर्मियों की मांग की है। सेना कम से कम 100 दिनों के लिए यह मदद चाह रही है, जिससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि यह युद्ध शुरुआती अनुमानों की तुलना में काफी लंबा चल सकता है।

    सितंबर तक चल सकता है युद्ध
    'पॉलिटिको' की रिपोर्ट में आंतरिक दस्तावेजों के हवाले से लिखा है कि यूनाइटेड स्टेट्स सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने अमेरिकी रक्षा विभाग से फ्लोरिडा स्थित अपने मुख्यालय में और अधिक सैन्य खुफिया कर्मचारियों को भेजने का आग्रह किया है। इसका उद्देश्य आने वाले महीनों में ईरान के खिलाफ अभियानों को सुचारू रूप से चलाना है। इस अतिरिक्त कर्मचारियों की मांग से पता चलता है कि अमेरिका एक लंबे अभियान की योजना बना रहा है, जो सितंबर तक खिंच सकता है।

    यह स्थिति राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उन पिछली टिप्पणियों के बिल्कुल उलट है, जिनमें उन्होंने युद्ध शुरू होने के तुरंत बाद कहा था कि यह अभियान लगभग चार सप्ताह या उससे भी कम समय में पूरा हो सकता है। एक अमेरिकी अधिकारी ने पॉलिटिको को बताया कि रक्षा अधिकारी इस क्षेत्र में अतिरिक्त वायु रक्षा प्रणालियां तैनात करने की तैयारी कर रहे हैं। इनमें विशेष रूप से छोटी और कम खर्चीली 'एंटी-ड्रोन तकनीक' शामिल हैं, जिन्हें पेंटागन ने हाल के वर्षों में विकसित किया है।

    'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी'
    अमेरिका और इजरायल द्वारा संयुक्त रूप से शुरू किया गया यह युद्ध 28 फरवरी को 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' के नाम से शुरू हुआ था। इस अभियान के पहले ही दिन ईरान की राजधानी तेहरान में एक बड़े हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई उनके आवास पर मारे गए थे। रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ने इस युद्ध के व्यापक परिणामों का पूरी तरह से अनुमान नहीं लगाया था। नतीजतन, अमेरिकी विदेश विभाग ने पूरे मध्य पूर्व से अपने राजनयिक कर्मचारियों को सुरक्षित निकालने के लिए अतिरिक्त संसाधन लगाने शुरू कर दिए हैं। निकासी प्रक्रिया का सीधा नियंत्रण अब विदेश विभाग के वरिष्ठ नेतृत्व के हाथों में है। इस अभियान के दौरान अब तक छह अमेरिकी सैनिक अपनी जान गंवा चुके हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने चेतावनी दी है कि आने वाले समय में और भी अमेरिकी सैनिक हताहत हो सकते हैं।

    पड़ोसी देशों पर खतरा
    इस संघर्ष का असर अब फारस की खाड़ी के अन्य देशों पर भी पड़ने लगा है। ईरानी ड्रोन और मिसाइलें संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन, कुवैत और अन्य पड़ोसी देशों के हवाई क्षेत्र की ओर उड़ती देखी गई हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया भर में तेल निर्यात के लिए सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है, वहां से जहाजों की आवाजाही काफी हद तक रुक गई है। ड्रोन हमलों के बढ़ते खतरे के कारण व्यापारिक और तेल के जहाज इस रास्ते से गुजरने से बच रहे हैं।

    इन युद्धों में लंबा फंसा अमेरिका
        वियतनाम युद्ध
    लगभग 20 साल (अमेरिकी सैनिकों की प्रमुख मौजूदगी करीब 8 साल)।
    परिणाम: अमेरिका को भारी नुकसान (58,000+ अमेरिकी मौतें।

    2. अफगानिस्तान युद्ध
    20 साल – अमेरिका की सबसे लंबी जंग।
    परिणाम: ट्रिलियंस डॉलर खर्च, हजारों अमेरिकी मौतें, लेकिन 2021 में वापसी के साथ तालिबान फिर सत्ता में आ गया।

    3. इराक युद्ध
    मुख्य ऑपरेशन करीब 8 साल, लेकिन ISIS के खिलाफ 2014 से आगे भी जारी (कुल 20+ साल का प्रभाव)।
    परिणाम: लाखों मौतें, क्षेत्र में अस्थिरता, और ISIS जैसी नई समस्याओं का जन्म।