मध्य प्रदेश

OBC क्रीमीलेयर नियम पर हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी, प्रमोशन और वेतन आधार नहीं

 ग्वालियर
 मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने ओबीसी प्रमाण पत्र को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि माता-पिता के वेतनमान और पदोन्नति के आधार पर ही संतान को क्रीमीलेयर में नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा ओबीसी प्रमाण पत्र का आवेदन खारिज करने के आदेश को रद कर दिया और मामले पर नियमों के अनुसार दोबारा विचार करने के निर्देश दिए।

2020 में खारिज हुआ था आवेदन
मामला रागिनी राठौर से जुड़ा है। उनके ओबीसी प्रमाण पत्र के आवेदन को अनुविभागीय अधिकारी ने 23 अक्टूबर 2020 को खारिज कर दिया था। इसके बाद रागिनी ने अपर कलेक्टर के समक्ष अपील की, लेकिन 29 नवंबर 2022 को वहां भी एसडीओ के आदेश को बरकरार रखा गया।

इसके बाद रागिनी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दोनों आदेशों को चुनौती दी।

पिता की सरकारी नौकरी और वेतन को बनाया था आधार
याचिका में बताया गया कि अधिकारियों ने रागिनी के पिता की आय को केवल वेतन के आधार पर देखते हुए उन्हें क्रीमीलेयर की श्रेणी में माना और इसी आधार पर ओबीसी प्रमाण पत्र का आवेदन खारिज कर दिया।

रागिनी के पिता की प्रारंभिक नियुक्ति सिविल जज वर्ग-दो के पद पर हुई थी। इसके बाद 16 जून 2008 को 40 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद उन्हें सिविल जज वर्ग-एक के पद पर पदोन्नति मिली। याचिका के अनुसार, उनके पिता की आय का स्रोत केवल वेतन था।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला
हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन मामले में 11 मार्च 2026 को दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि क्रीमीलेयर का निर्धारण करते समय केवल माता-पिता के वेतन, वेतनमान या पदोन्नति को आधार बनाकर निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

खंडपीठ ने प्रशासनिक अधिकारियों के आदेश रद करते हुए कहा कि मामले के सभी प्रासंगिक पहलुओं की जांच सक्षम प्राधिकारी द्वारा की जानी चाहिए।
OBC प्रमाण पत्र जारी करने पर कोर्ट ने नहीं दिया अंतिम आदेश

हालांकि, हाई कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि उसके आदेश का मतलब रागिनी राठौर को स्वतः ओबीसी प्रमाण पत्र जारी करना नहीं है। कोर्ट ने उनके दावे पर कोई अंतिम राय नहीं दी है।

प्रमाण पत्र जारी किया जाएगा या नहीं, इसका निर्णय सक्षम अधिकारी को लागू नियमों और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर नए सिरे से करना होगा। यानी हाई कोर्ट ने सिर्फ प्रशासनिक आदेशों को रद कर मामले पर नियमानुसार पुनर्विचार का रास्ता साफ किया है।

 

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