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जमानत कानून पर सुप्रीम कोर्ट को सलाह देना जज को पड़ा महंगा, शीर्ष अदालत ने मांगी सफाई

नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के एक जज के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है. दरअसल, जज ने सुप्रीम कोर्ट को जमानत कानून को लेकर बिन मांगी सलाह दे दी थी. कोर्ट ने इस मामले में रजिस्ट्री को संबंधित जज से स्पष्टीकरण मांगने का निर्देश दिया है.

मामला पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले का है. यहां बारासात के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश एक आपराधिक मामले की सुनवाई कर रहे थे. सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 में इस मामले की सुनवाई तीन महीने में पूरी करने का निर्देश दिया था.

तीन महीने की तय अवधि में ट्रायल पूरा नहीं हो सका. इसके बाद जज ने 11 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट के असिस्टेंट रजिस्ट्रार को एक पत्र लिखा. इसमें ट्रायल पूरा करने के लिए और समय मांगा गया.

जज ने पत्र में बताया कि मामले की सुनवाई पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय की जरूरत है. लेकिन लेटर के आखिरी दो पैराग्राफ में उन्होंने जमानत को लेकर SC को सलाह दे दी. उन्होंने लिखा कि यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि उच्च अदालत को किन मामलों में जमानत देनी चाहिए और किन मामलों में जमानत नहीं देनी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने जताई कड़ी नाराजगी
जज के इस पत्र पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ काफी असहज हुई. जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस पर कड़ी टिप्पणी की.

पीठ ने कहा कि ट्रायल जज ने जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखकर अतिरिक्त समय मांगा, उससे वह काफी परेशान है. कोर्ट ने साफ कहा कि किसी पीठासीन अधिकारी का काम सुप्रीम कोर्ट को यह सलाह देना नहीं है कि उसे कब जमानत देनी चाहिए और कब नहीं.

सुप्रीम कोर्ट ने पत्र की भाषा और उसमें दी गई सलाह पर गंभीर आपत्ति जताई. कोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि संबंधित जज से जल्द से जल्द स्पष्टीकरण मांगा जाए. कोर्ट ने यह भी जानना चाहा कि आखिर जज ने इस तरह की टिप्पणी क्यों की. अब जज के जवाब के बाद ही इस मामले में आगे की कार्रवाई पर फैसला होगा.

इसी तरह के एक दूसरे मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के जजों को अहम सलाह दी है. जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर की पीठ ने जमानत याचिकाओं की सुनवाई को लेकर टिप्पणी की.

पीठ ने कहा कि जजों को अपने निजी नैतिक विचार या व्यक्तिगत मूल्य फैसलों पर नहीं थोपने चाहिए. जमानत याचिका पर फैसला कानून और मामले के तथ्यों के आधार पर होना चाहिए. कोर्ट की इस टिप्पणी का मतलब साफ है कि जमानत जैसे मामलों में न्यायिक फैसले व्यक्तिगत सोच से नहीं, बल्कि कानून और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर होने चाहिए.
 

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