Category: विदेश

  • पाकिस्तानी सेना में अंदरूनी कलह? जनरल की पिटाई पर हुक्मरानों की सफाई चर्चा में

    पाकिस्तानी सेना में अंदरूनी कलह? जनरल की पिटाई पर हुक्मरानों की सफाई चर्चा में

    इस्लामाबाद 
     पाकिस्तान में ए
    क बार फिर से सेना की थू-थू हो रही है. पूरे देश में पूर्व सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा की गंभीर चोटों को लेकर चर्चाएं हैं. वो अस्पताल में भर्ती हैं और उनका स्कल फ्रैक्चर बताया जा रहा है. जब पाकिस्तान भर में खुसुर-फुसुर शुरू हुई तो सेना और परिवार ने आधिकारिक तौर पर बयान जारी करके कहा है कि ‘बाथरूम में फिसल जाने’ से उनका ये हाल हुआ है. हालांकि, भारतीय और अन्य अंतरराष्ट्रीय खुफिया सूत्र को अंदर की बात पता चली है. CNN न्यूज18 को खुफिया सूत्रों ने बताया है कि बाजवा पर ये अटैक असल में फौजियों ने ही किया है.

    ‘बाथरूम में फिसले बाजवा’

    दावा किया जा रहा है बाजवा के साथ ये घटना 10 फरवरी 2026 की सुबह तड़के 4:30 बजे हुई, ISPR और परिवार ने स्टेटमेंट जारी करते हुए कहा है कि जनरल बाथरूम में फिसल गए और उनके सिर पर गंभीर चोटें आ गई. रावपिंडी के कंबाइंड मिलिट्री हॉस्पिटल (CMH) के आईसीयू में भर्ती बाजवा की खोपड़ी में फ्रैक्चर हुआ है और उनकी स्थिति नाजुक बनी हुई है. इस घटना ने पाकिस्तान सेना के भीतर पनप रहे आंतरिक असंतोष और बदले की आग को एक बार फिर सतह पर ला दिया है.
    जनरल बाजवा के साले नईम घुम्मन ने बताया कि जनरल नंगे पैर थे और बाथरूम में फिसल गए, जिससे उनके सिर पर गंभीर चोट आई. इसके बाद ISPR ने भी तुरंत पुष्टि की कि यह एक घरेलू दुर्घटना है और उनका सफल ऑपरेशन हो चुका है.

    Military Attack या कुछ और?

    हालांकि, खुफिया सूत्रों का मानना है कि यह कोई साधारण बाथरूम में फिसल जाने वाली घटना नहीं है. असल में जनरल बाजवा को तीन सैन्य कर्मियों ने घेर कर पीटा है. उन पर तब तक अटैक किया गया जब तक स्कल फ्रैक्चर नहीं हो गया.

    सूत्रों का दावा है कि 2022 में इमरान खान की सरकार गिराने के दौरान जनरल बाजवा ने ISI को कुछ ऐसे अधिकारियों के परिवारों को निशाना बनाने का आदेश दिया था जो इस तख्तापलट का विरोध कर रहे थे. माना जा रहा है कि यह हमला उन्हीं पीड़ित अधिकारियों के परिजनों या जूनियर कर्मियों ने किया है.

  • दो-तिहाई बहुमत के साथ BNP की वापसी, जमात को बड़ा झटका; मोदी ने तारिक रहमान को दी बधाई

    दो-तिहाई बहुमत के साथ BNP की वापसी, जमात को बड़ा झटका; मोदी ने तारिक रहमान को दी बधाई

    ढाका 

    सत्ता के लिए 20 साल का इंतज़ार खत्म करते हुए, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) 13वें आम चुनावों में बहुमत का आंकड़ा पार करने के बाद अगली सरकार बनाने के लिए तैयार है. यह एक अहम जनादेश है, जो उथल-पुथल से जूझ रहे देश की सियासी दिशा में एक बड़ी तब्दीली की तरफ इशारा करता है. 

    तारिक रहमान के नेतृत्व वाली पार्टी ने आखिरी बार 2001 में चुनाव जीता था. आज पार्टी ने जीत का ऐलान कर दिया है क्योंकि गिनती के ट्रेंड्स में भारी जीत का इशारा मिल रहा था, जिससे दो दशकों के बाद सत्ता में उसकी वापसी पक्की हो गई.

    इस बीच, जमात-ए-इस्लामी को बड़ा झटका लगा है, जो नतीजों के धीरे-धीरे आने के बावजूद डबल-डिजिट सीटों तक ही सीमित रही. स्थानीय मीडिया ने बताया कि सुबह-सुबह हुई वोटिंग में BNP गठबंधन ने 209 सीटें जीतीं.

    कैसा रहा जमात-ए-इस्लामी का प्रदर्शन?

    BNP के प्रदर्शन ने उसे सिंपल मेजॉरिटी के लिए ज़रूरी 151 सीटों की लिमिट से आगे पहुंचा दिया, जिससे पार्टी अगली सरकार बनाने के लिए मज़बूत स्थिति में आ गई. कई चुनाव क्षेत्रों में वोटों की गिनती जारी रही, लेकिन कुल मिलाकर ट्रेंड्स से पता चला कि फ़ाइनल टैली में बड़े बदलाव की गुंजाइश कम है. सुबह करीब 4 बजे तक, जमात-ए-इस्लामी ने 56 सीटें जीत ली थीं.

    बांग्लादेश के रेफरेंडम के अनऑफिशियल नतीजों से जुलाई चार्टर के लिए लोगों के मज़बूत सपोर्ट का भी पता चलता है, जो 2024 के विद्रोह से बना एक सुधार डॉक्यूमेंट है जिसमें बड़े संवैधानिक बदलावों का प्रस्ताव है.

    The Daily Star के मुताबिक, गिने गए वोटों में से करीब 72.9 फीसदी चार्टर को अपनाने के पक्ष में थे, जबकि 27.1 परसेंट इसके खिलाफ थे. 

    जगह-जगह से हिंसा की खबरें

    लोकल मीडिया के मुताबिक, बांग्लादेश के कई हिस्सों में चुनाव के दौरान हिंसा की भी घटनाएं सामने आईं. वोटिंग से जुड़ी झड़पों में 70 से ज़्यादा लोग घायल बताए गए हैं.

    बांग्लादेशी अखबार द डेली स्टार ने कहा कि 14 अलग-अलग घटनाओं में करीब 72 लोग घायल हुए, जिनमें से कई पोलिंग स्टेशन के पास या अंदर हुए. पुलिस ने इस हंगामे के सिलसिले में कम से कम नौ लोगों को हिरासत में लिया. सबसे बुरी हिंसा नोआखली जिले के हटिया में हुई, जहां BNP और नेशनल सिटीजन पार्टी के समर्थकों के बीच हुई झड़प में 31 लोग घायल हो गए.

    वोटिंग सुबह 7:30 बजे शुरू हुई और नौ घंटे तक बिना रुके चलती रही. वोटरों ने दो अलग-अलग बैलेट पेपर इस्तेमाल किए- एक पार्लियामेंट्री चुनाव के लिए और दूसरा रेफरेंडम के लिए, जिन्हें देश भर के 42,659 पोलिंग स्टेशनों पर ट्रांसपेरेंट बैलेट बॉक्स में रखा गया था.

    देश के 300 में से 299 चुनाव क्षेत्रों में चुनाव हुए. शेरपुर-3 में एक पार्लियामेंट्री उम्मीदवार की मौत के बाद वोटिंग टाल दी गई. बांग्लादेश इलेक्शन कमीशन (EC) के मुताबिक, देश भर में 60.69 फीसदी वोटिंग हुई, जिसमें पोस्टल बैलेट का इस्तेमाल 80.11 परसेंट और कुल वैलिड वोट रेट 70.25 परसेंट रहा. कई वोटरों ने कहा कि 2008 के पार्लियामेंट्री चुनावों के बाद यह पहला शांतिपूर्ण और खुशी वाला चुनाव था जो उन्होंने देखा.

    वोटों की गिनती के बीच, जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश के चीफ, शफीकुर रहमान ने कहा कि उनकी पार्टी अपने फायदे के लिए 'विपक्ष की राजनीति' नहीं करेगी, जिससे गिनती जारी रहने पर चुनाव के नतीजों को मानने का संकेत मिला. उन्होंने रिपोर्टर्स से कहा, "हम पॉजिटिव पॉलिटिक्स करेंगे."

    PM मोदी ने तारिक रहमान को दी बधाई

    विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के नेता तारिक रहमान को बांग्लादेश चुनावों में उनकी पार्टी की बड़ी जीत के बाद बधाई देते हुए PM मोदी का बयान दोबारा पोस्ट किया. PM मोदी ने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, "भारत एक लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और सबको साथ लेकर चलने वाले बांग्लादेश के समर्थन में खड़ा रहेगा. मैं हमारे कई तरह के रिश्तों को मजबूत करने और हमारे साझा विकास लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए आपके साथ काम करने का इंतजार कर रहा हूं."

    बांग्लादेश में हुए 13वें संसदीय चुनावों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की प्रचंड जीत के बाद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारिक रहमान को गर्मजोशी से बधाई दी है. पीएम मोदी ने सोशल मीडिया (X) पर साझा किए अपने संदेश में इस जीत को बांग्लादेश की जनता का उनके नेतृत्व पर अटूट विश्वास बताया.

    प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा, "संसदीय चुनावों में बीएनपी को निर्णायक जीत दिलाने के लिए मैं तारिक रहमान को हार्दिक बधाई देता हूं. यह जीत आपके नेतृत्व में बांग्लादेशी लोगों के भरोसे को दर्शाती है." उन्होंने आगे कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और समावेशी बांग्लादेश के समर्थन में खड़ा रहेगा और दोनों देशों के साझा विकास लक्ष्यों को मजबूत करने के लिए मिलकर काम करने को उत्सुक है.

    शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद यह बांग्लादेश में पहला बड़ा चुनाव था. 17 साल के वनवास के बाद तारिक रहमान की पार्टी की सत्ता में वापसी दक्षिण एशिया की राजनीति के लिए एक बड़ा 'टर्निंग पॉइंट' है. भारत ने इस बधाई संदेश के जरिए स्पष्ट संकेत दिया है कि वह नई सरकार के साथ भी मजबूत द्विपक्षीय संबंधों को प्राथमिकता देगा.

    आपको बता दें कि बांग्लादेश में गुरुवार को आम चुनाव के लिए वोट डाले गए थे और शाम को ही मतगणना शुरू हो गई है. अभी तक जो नतीजे सामने आए हैं उसमें रहमान की पार्टी वाले गठबंधन ने 209 सीटें जीतकर 300 सदस्यों वाले जातीय संसद या देश के सदन में दो-तिहाई बहुमत हासिल कर लिया है. 

    बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने चुनाव में जीत का दावा करते हुए देशवासियों को बधाई दी है लेकिन समर्थकों से जश्न न मनाने की अपील की है.पार्टी ने कहा कि विजय उत्सव के बजाय कार्यकर्ता और समर्थक पूरे देश में शुक्रवार की नमाज़ अदा करें और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया को याद करें. 

    तारिक रहमान को ऐतिहासिक जीत पर US ने दी बधाई

    बांग्लादेश के 13वें आम चुनाव में ऐतिहासिक जीत के लिए तारिक रहमान और BNP को बधाई देने वाला यूनाइटेड स्टेट्स पहला देश बन गया.

    बांग्लादेश में US के राजदूत ने सोशल मीडिया पर लिखा, "बांग्लादेश के लोगों को सफल चुनाव के लिए और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और तारिक रहमान को आपकी ऐतिहासिक जीत के लिए बधाई. यूनाइटेड स्टेट्स आपके साथ मिलकर दोनों देशों की खुशहाली और सुरक्षा के साझा लक्ष्यों को पूरा करने के लिए काम करने का इंतज़ार कर रहा है."

     तारिक रहमान ने जुलूस के बजाय नमाज़ पढ़ने की अपील की

    बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के चेयरपर्सन तारिक रहमान ने 13वें आम चुनाव में पार्टी की भारी जीत के बाद समर्थकों से नमाज़ पढ़ने और जीत का जुलूस न निकालने की अपील की.नतीजे ऑफिशियली घोषित होने के बाद पार्टी प्रेयर महफ़िल रखेगी.

    टाइट सिक्योरिटी के बीच वोटिंग

    पूरे देश में सिक्योरिटी कड़ी कर दी गई थी, कई पोलिंग सेंटर्स पर आर्मी के जवान तैनात थे और बड़े शहरों में पुलिस पेट्रोलिंग दिख रही थी. ज़्यादातर सेंटर्स पर CCTV कैमरे लगाए गए थे, जिसमें वोटिंग बूथ के पास भी शामिल थे. हालांकि, कुछ जगहों पर कम्पार्टमेंट के अंदर कैमरे नहीं थे.

    चुनाव अधिकारियों ने बताया कि बढ़ी हुई सिक्योरिटी और मॉनिटरिंग से वोटर्स का भरोसा बढ़ाने में मदद मिली. अधिकारियों ने चुनाव से जुड़ी हिंसा से जुड़ी किसी मौत की खबर नहीं दी. सिक्योरिटी पक्का करने के लिए आर्म्ड फोर्सेज़, बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश और पुलिस के करीब 10 लाख लोगों को तैनात किया गया था.

    बांग्लादेश का यह चुनाव 2024 की सियासी उथल-पुथल और तीन दशकों में पहली बार बैलेट से अवामी लीग की गैरमौजूदगी के बाद पहला नेशनल वोट था.

  • US ने माना झुकाव, जाह्नवी कंदुला मामले में 2.6 अरब का हर्जाना भारत को मिलेगा

    US ने माना झुकाव, जाह्नवी कंदुला मामले में 2.6 अरब का हर्जाना भारत को मिलेगा

    सिएटल
     अमेरिका के सिएटल शहर ने 2023 में एक पुलिस अधिकारी की तेज रफ्तार गाड़ी की टक्कर से जान गंवाने वाली भारत की 23 साल की छात्रा जाह्नवी कंदुला के परिवार के साथ 2.9 करोड़ डॉलर (2.62 अरब रुपये) के समझौते पर सहमति दी है. कंदुला को अधिकारी केविन डेव की गाड़ी ने उस वक्त टक्कर मारी थी जब वह ड्रग्स से जुड़ी एक कॉल के बाद 40 किलोमीटर प्रति घंटे की सीमा वाले इलाके में 119 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से जा रहे थे. उनकी गाड़ी की इमरजेंसी लाइट जल रही थी और चौराहों पर सायरन भी बज रहा था. सिटी अटॉर्नी एरिका इवांस ने बुधवार को बयान में कहा, ‘जाह्नवी कंदुला की मौत बहुत दुखद है और शहर को उम्मीद है कि यह समझौता कंदुला परिवार को कुछ हद तक संतोष देगा. जाह्नवी कंदुला का जीवन बहुत अहम था. यह उनके परिवार, दोस्तों और हमारे समुदाय के लिए मायने रखता था.’

    जाह्नवी कंदुला कौन थीं?

    कंदुला सिएटल की नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी में सूचना प्रणाली में मास्टर डिग्री कर रही थीं. कंदुला के परिवार के वकीलों ने तुरंत कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. दोनों पक्षों ने पिछले शुक्रवार को किंग काउंटी सुपीरियर कोर्ट में समझौते की जानकारी दी. स्थानीय वेबसाइट ‘पब्लिकॉला’ ने सबसे पहले इस समझौते की खबर दी थी. कंदुला की मौत के बाद बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए थे. लोगों का गुस्सा तब और बढ़ गया जब एक अधिकारी के बॉडी कैमरा की रिकॉर्डिंग सामने आई जिसमें वह हंसते हुए कंदुला के जीवन को ‘मामूली’ बताते और कहते सुनाई दिए कि शहर को ‘बस एक चेक लिख देना चाहिए.’

    अमेरिका में पुलिसवालों की हुई बर्खास्तगी

    भारत के राजनयिकों ने भी मामले की जांच की मांग की थी. शहर के नागरिक निगरानी प्राधिकरण ने पाया कि यूनियन नेता रहे अधिकारी डैनियल ऑडरर की टिप्पणियों से विभाग की साख को नुकसान पहुंचा और लोगों का भरोसा कमजोर हुआ. ऑडरर को बर्खास्त कर दिया गया और उन्होंने गलत तरीके से सेवा समाप्ति के खिलाफ शहर पर मुकदमा किया. उन्होंने कहा कि उनकी टिप्पणियां इस बात की आलोचना करने के लिए थीं कि वकील इस मौत पर शायद कैसे प्रतिक्रिया देंगे.

    पुलिस विभाग ने वाहन चला रहे अधिकारी को भी बर्खास्त कर दिया. उन्हें लापरवाही से वाहन चलाने का दोषी पाया गया और 5,000 डॉलर का जुर्माना भरने का आदेश दिया गया. किंग काउंटी के अभियोजकों ने उनके खिलाफ गंभीर आपराधिक आरोप लगाने से इनकार किया क्योंकि यह साबित नहीं हुआ कि उन्होंने जानबूझकर सुरक्षा की अनदेखी की. समझौते की करीब दो करोड़ डॉलर की राशि शहर की बीमा पॉलिसी के तहत कवर होने की संभावना है.

  • रूस-अमेरिका टकराव: पुतिन का जुकरबर्ग को सबक, चीन पर भी नजर

    रूस-अमेरिका टकराव: पुतिन का जुकरबर्ग को सबक, चीन पर भी नजर

    मॉस्को 

    मैसेजिंग प्लेटफॉर्म WhatsApp ने आरोप लगाया है कि रूस ने देश में उसकी सेवाओं को पूरी तरह ब्लॉक करने की कोशिश की है, ताकि यूजर्स को स्‍टेट सपोर्टेड डोमेस्टिक ऐप की ओर मोड़ा जा सके. Meta Platforms के स्वामित्व वाले इस ऐप के प्रवक्ता ने बताया कि रूस का यह कदम इंटरनेट स्पेस पर नियंत्रण बढ़ाने और विदेशी टेक कंपनियों की भूमिका सीमित करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है. तो क्‍या रूस भी चीन की राह पर चलने की तैयारी कर रहा है. दिलचस्‍प है कि चीन ने मैसेजिंग एप से लेकर सोशल साइट्स तक खुद की डेवलप की है. बीजिंग का उद्देश्‍य है कि इसके जरिये देश में पश्चिमी देशों के प्रभाव को रोका जा सकेगा और अमेरिका-यूरोप के टेक्‍नोलॉजी मोनोपोली पर लगाम लगाया जाएगा. अब रूस के कदम ने एक तरफ जहां मेटा चीफ मार्क जुकरबर्ग को उनकी औकात दिखा दी तो दूसरी तरफ अमेरिकी दादागिरी को भी ठोस चुनौती दी है.

    यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब फरवरी 2022 में यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद मॉस्को और वेस्‍टर्न टेक्‍नोलॉजिकल कंपनियों के बीच तनाव लगातार बढ़ा है. रूसी अधिकारी घरेलू स्तर पर विकसित ऐप ‘MAX’ को बढ़ावा दे रहे हैं, जिसे सरकार समर्थित बताया जा रहा है. हालांकि, आलोचकों का कहना है कि इस ऐप का इस्तेमाल यूजर्स की निगरानी और डेटा ट्रैकिंग के लिए किया जा सकता है, लेकिन सरकारी मीडिया ने इन आरोपों को निराधार करार दिया है. WhatsApp ने कहा कि रूस द्वारा उठाए गए कदम यूजर्स को एक सरकारी-स्वामित्व वाले सर्विलांस ऐप की ओर धकेलने की कोशिश है. कंपनी ने एक बयान में कहा, ‘हम उपयोगकर्ताओं को जुड़े रखने के लिए हर संभव प्रयास जारी रखेंगे.’ हालांकि, कंपनी ने यह स्पष्ट नहीं किया कि रूस में सेवा बहाली को लेकर आगे की रणनीति क्या होगी.

    WhatsApp पर सख्‍ती
    इस बीच, क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने सरकारी समाचार एजेंसी TASS को दिए वीडियो बयान में कहा कि WhatsApp की वापसी रूसी कानूनों के पालन पर निर्भर करेगी. उन्होंने कहा, ‘अगर Meta कॉरपोरेशन कानून का पालन करती है और रूसी अधिकारियों के साथ संवाद करती है, तो समझौते की संभावना बन सकती है. लेकिन यदि कंपनी अडिग रुख अपनाती है और कानून के अनुरूप ढलने के लिए तैयार नहीं होती, तो कोई संभावना नहीं है.’ फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, रूस के संचार नियामक रोसकोमनादज़ोर ने WhatsApp को अपने ऑनलाइन डायरेक्टरी से हटा दिया है. बताया जाता है कि रूस में इस ऐप के करीब 10 करोड़ यूजर्स हैं, जो इसे देश के सबसे लोकप्रिय मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स में से एक बनाता है. इस कदम को रूस की डिजिटल नीति में एक और सख्ती के तौर पर देखा जा रहा है.

    Apple पर भी गाज
    रूस ने पिछले साल WhatsApp और टेलीग्राम जैसी विदेशी मैसेजिंग सेवाओं पर कुछ कॉल सुविधाओं को सीमित करना शुरू कर दिया था. अधिकारियों का आरोप है कि ये प्लेटफॉर्म धोखाधड़ी और आतंकवाद से जुड़े मामलों में कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ जानकारी साझा करने से इनकार करते हैं. इसके अलावा दिसंबर में Apple के वीडियो-कॉलिंग ऐप FaceTime को भी ब्लॉक कर दिया गया था. टेलीग्राम के रूसी मूल के संस्थापक पावेल ड्यूरोव पहले ही कह चुके हैं कि उनकी कंपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और यूजर्स की गोपनीयता की रक्षा के प्रति प्रतिबद्ध रहेगी. वहीं, मानवाधिकार संगठनों और डिजिटल राइट ग्रुप्‍स का कहना है कि रूस द्वारा घरेलू प्लेटफॉर्म्स को बढ़ावा देना और विदेशी सेवाओं को सीमित करना इंटरनेट स्वतंत्रता पर गंभीर असर डाल सकता है.

    डिजिटल संप्रभुता
    विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल तकनीकी कंपनियों और सरकारों के बीच नियामक संघर्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि यह डिजिटल संप्रभुता, डेटा नियंत्रण और नागरिकों की ऑनलाइन स्वतंत्रता जैसे व्यापक मुद्दों से भी जुड़ा हुआ है. WhatsApp जैसे प्लेटफॉर्म के संभावित पूर्ण प्रतिबंध से रूस में लाखों यूजर्स की रोजमर्रा की संचार व्यवस्था प्रभावित हो सकती है. संकेत साफ है कि रूस और वेस्‍टर्न टेक कंपनियों के बीच टकराव आने वाले समय में और गहरा सकता है, जिसका असर वैश्विक डिजिटल इकोसिस्टम पर भी पड़ सकता है.

  • ट्रंप का गुस्सा: महिला नेता की बात से प्रभावित, देश पर बढ़ाया टैरिफ

    ट्रंप का गुस्सा: महिला नेता की बात से प्रभावित, देश पर बढ़ाया टैरिफ

    वाशिंगटन 

    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्विट्जरलैंड पर टैरिफ बढ़ा दिया था। अब उन्होंने खुलकर इसकी वजह पर भी बात की है। उन्होंने कहा है कि उन्हें स्विट्जरलैंड की महिला नेता का बात करने का तरीका पसंद नहीं आया। अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी बताया कि महिला नेता छोटा देश होने का हवाला देते हुए टैरिफ में राहत की मांग भी कर रही थीं।

    फॉक्स न्यूज से बातचीत में ट्रंप ने स्विस फेडरल काउंसिल की सदस्य कैरिन कैलर सटर से हुई बातचीत का जिक्र किया। ट्रंप ने कहा कि उन्होंने स्विस नेता को बता दिया कि छोटा देश होने के बाद अमेरिका के साथ उसका 42 बिलियन डॉलर का ट्रेड डेफिसिट है।

    ट्रंप ने कहा, 'मैंने 30 फीसदी टैरिफ लगाया था, जो काफी कम था। इसके बाद मुझे कॉल आया, जो मुझे लगा कि स्विट्जरलैंड की प्रधानमंत्री का था। और वह बहुत आक्रामक, लेकिन अच्छे से बात कर रहीं थीं। वह बहुत आक्रामक थीं। उन्होंने मुझसे कहा कि सर हम छोटे से देश हैं। हम ऐसा नहीं कर पाएंगे। हम ऐसा नहीं कर सकते। वह फोन रखने को तैयार ही नहीं थीं।'

    ट्रंप ने कहा, 'नहीं, नहीं, हम एक छोटा देश हैं। बार-बार एक ही बात। वह फोन रखने के लिए तैयार ही नहीं थीं और टैरिफ 30 फीसदी था। और जिस तरह से उन्होंने मुझसे बात की मुझे अच्छा नहीं लगा। ऐसे में उन्हें रियायत देने के बजाए, मैंने उसे बढ़ाकर 39 प्रतिशत कर दिया था।' उन्होंने दावा किया कि स्विट्जरलैंड अपना सामान अमेरिका निर्यात कर रहा था, लेकिन कोई भी टैरिफ नहीं दे रहा था।
    पहले भी किया था दावा

    दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में भी ट्रंप ने स्विट्जरलैंड की नेता से बात करने का दावा किया था। उन्होंने कहा था, 'मुझे लगता है प्रधानमंत्री थीं। मुझे नहीं पता राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री किसका फोन था। एक महिला थीं। वह एक ही बात बार-बार दोहरा रही थीं। वह कह रही थीं, नहीं नहीं आप ऐसा नहीं कर सकते। 30 फीसदी टैरिफ। हम बहुत छोटे देश हैं। लेकिन मैंने कहा कि आप भले ही छोटे हैं, लेकिन डेफिसिट बड़ा है।'

    खास बात है कि स्विट्जरलैंड में प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति नहीं होता। यहां सरकार की अगुवाई फेडरल काउंसिल की तरफ से की जाती है, जिसमें सात सदस्य होते हैं।
    भारत के साथ डील

    हाल ही में अमेरिका ने भारत के साथ ट्रेड डील की है, जिसके बाद टैरिफ घटकर 18 प्रतिशत पर आ गया है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच 'ट्रुथ सोशल' पर बीते सोमवार को घोषणा की थी कि भारत और अमेरिका एक व्यापार समझौते पर सहमत हुए हैं।

  • टंबलर रिज स्कूल फायरिंग: कनाडा में बड़ा हमला, कई की जान गई, दर्जनों जख्मी

    टंबलर रिज स्कूल फायरिंग: कनाडा में बड़ा हमला, कई की जान गई, दर्जनों जख्मी

    टंबलर रिज

    कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया (BC) प्रांत के टंबलर रिज शहर से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है. मंगलवार को एक माध्यमिक स्कूल और एक रिहायशी घर में गोलीबारी हुई, जिसमें हमलावर समेत कुल 7 लोगों की मौत हो गई. वहीं, इस फायरिंग में 25 लोग घायल भी हो गए. 

    रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस (RCMP) के मुताबिक, दोपहर लगभग 1:20 बजे 'टंबलर रिज सेकेंडरी स्कूल' में एक सक्रिय शूटर के होने की रिपोर्ट मिली. पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए इलाके में 'पुलिस इनिशिएटेड पब्लिक अलर्ट' (PIPA) जारी किया और स्कूल को चारों ओर से घेर लिया.

    स्कूल में दाखिल होने पर पुलिस अधिकारियों को 7 लोगों के शव मिले. पुलिस अधिकारी ने बताया कि एक संदिग्ध के मारे जाने की आशंका है, लेकिन अभी इस बात की जांच की जा रही है कि क्या कोई दूसरा हमलावर भी इस घटना में शामिल है. 

    स्कूल और घर से 9 शव बरामद

    जांच में स्कूल से जुड़ी इस घटना के तार एक स्थानीय निवास से भी जुड़ा पाए गए. वहां तलाशी के दौरान पुलिस को दो और लोगों के शव बरामद हुए. स्थिति को काबू में देख पुलिस ने शाम 5:45 बजे पब्लिक अलर्ट वापस ले लिया था और अब आगे की जांच जारी है. पुलिस हमलावर के मकसद पता लगाने की कोशिश कर रही है.

    लोगों को घरों में रहने की सलाह

    इस मामले की गंभीरता को देखते हुए 'BC RCMP मेजर क्राइम' विभाग ने जांच की कमान संभाल ली है. इलाके में इमरजेंसी रिस्पांस टीम और फ्रंटलाइन अधिकारियों के साथ-साथ विक्टिम सर्विसेज को भी तैनात किया गया है, ताकि प्रभावित परिवारों को मानसिक और सामाजिक सहायता प्रदान की जा सके.

    कस्बे की करीब 2400 की आबादी को घरों के अंदर रहने की सलाह दी गई है, क्योंकि पड़ोसी इलाकों से अतिरिक्त पुलिस बल बुलाया गया है.

    बंद किए गए सेकेंडरी और एलिमेंट्री स्कूल

    सुरक्षा के मद्देनजर टंबलर रिज के सेकेंडरी और एलिमेंट्री दोनों स्कूलों को फिलहाल बंद कर दिया गया है. स्थानीय विधायक लैरी न्यूफेल्ड ने जानकारी दी है कि समुदाय की मदद के लिए बड़ी संख्या में पुलिस (RCMP) और एम्बुलेंस की टीमें तैनात की गई हैं. उन्होंने सुरक्षा कारणों से फिलहाल ज्यादा जानकारी साझा करने से मना किया है, ताकि चल रहे ऑपरेशन में कोई परेशानी न आए. 

  • US-बांग्लादेश डील: ट्रंप ने टैरिफ घटाए, यूनुस की भी की सराहना

    US-बांग्लादेश डील: ट्रंप ने टैरिफ घटाए, यूनुस की भी की सराहना

    ढाका 

    भारत के बाद अमेरिका ने बांग्लादेश से भी डील कर ली है। खबर है कि अमेरिका सरकार ने बांग्लादेश पर लगाए टैरिफ को कम किया है। साथ ही कुछ कपड़ा उत्पादों पर शुल्क शून्य करने का भी फैसला किया है। खास बात है कि यह डील ऐसे समय पर हुई है, जब खबरें थीं कि अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस डील जल्द ही अमेरिका के साथ सीक्रेट डील करने वाले हैं।

    अमेरिका ने बांग्लादेश पर लगाए 20 फीसदी टैरिफ को घटाकर 19 प्रतिशत कर दिया है। साथ ही कुछ ऐसे कपड़ों पर जवाबी टैरिफ शून्य कर दिया है, जिन्हें बनाने का सामान अमेरिका से आयात किया जाता है। सोमवार को दोनों देशों के बीच एक द्विपक्षीय समझौता हुआ। दोनों देशों की तरफ से औपचारिक अधिसूचना जारी किए जाने के बाद यह समझौता प्रभाव में आ जाएगा।

    खबर है कि बांग्लादेश की तरफ से कॉमर्स एडवाइजर शेख बशीरुद्दीन और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार खलील उर रहमान की तरफ से दस्तखत किए गए। जबकि, अमेरिकी पक्ष की तरफ से राजदूत जेमीसन ग्रीर मौजूद रहे। ग्रीर ने इस समझौते के लिए यूनुस और उनकी वार्ताकार टीम की तारीफ भी की है। उन्होंने कहा है कि यह समझौता अमेरिकी व्यापार नीति में बांग्लादेश की स्थिति को मजबूत करेगा।

    गारमेंट सेक्टर को बड़ी राहत

    दरअसल, गारमेंट सेक्टर बांग्लादेशी अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है। बांग्लादेश को निर्यात से करीब 80 प्रतिशत आय इसी से होती है। इसमें 40 लाख से ज्यादा लोग काम करते हैं और इनमें मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग शामिल हैं। जानकारों का कहना है कि कम टैरिफ रेट बांग्लादेशी निर्माताओं को अमेरिका बाजार में टिके रहने का मौका देंगे।

    पहले कितना था टैरिफ

    बीते साल अप्रैल में अमेरिका ने जवाबी शुल्क का ऐलान किया था। उस दौरान बांग्लादेश पर 37 फीसदी टैरिफ लगाया गया था। बाद में अगस्त में इसे घटाकर 20 प्रतिशत किया गया था। अब ताजा समझौते के बाद यह घटकर 19 फीसदी पर आ गया है।

  • बांग्लादेश चुनाव में विदेशी हस्तक्षेप: ‘प्रो-इंडिया’ BNP के सामने खड़ी है ‘अमेरिकी’ जमात

    बांग्लादेश चुनाव में विदेशी हस्तक्षेप: ‘प्रो-इंडिया’ BNP के सामने खड़ी है ‘अमेरिकी’ जमात

    ढाका    

    बांग्लादेश में 12 फरवरी को चुनाव होना है. इस बीच राजनीति का माहौल गरम है. लोग रोज नई बातें सुनते हैं. खासकर यह कि किस पर किस देश का असर है. काफी बार कहा जा रहा है कि BNP और जमात-ए-इस्लामी विदेशी ताकतों से जुड़े हैं. कुछ लोग इसे सच मानते हैं. कुछ इसे दुष्प्रचार कहते हैं. लेकिन असल बात क्या है, इसे समझना जरूरी है.

    बांग्लादेश में आम तौर पर लोकल मुद्दे जबकि चुनाव का मुख्य विषय होना चाहिए. जैसे रोजगार, महंगाई और नागरिकों की रोजमर्रा की परेशानियां. लेकिन इस बार चीजें थोड़ी अलग हैं. चुनाव भले लोकल है, लेकिन दूसरे देशों के नाम जमकर उछाले जा रहे हैं. खासकर भारत और अमेरिका. पता लगाया जा रहा है कि कौन किसके साथ है. भारत और अमेरिका का पहले भी बांग्लादेश के चुनाव से रिश्ता रहा है. लेकिन इस बार तो पाकिस्तान और तुर्की का नाम भी उठ रहा है.

    प्रो अमेरिका जमात

    सबसे पहले बात जमात-ए-इस्लामी की. जमात पर यह आरोप तब उठे जब वॉशिंगटन पोस्ट अखबार में यह खबर छपी कि अमेरिका के कुछ राजनयिक मानते हैं कि जमात इस चुनाव में अच्छा प्रदर्शन कर सकती है. यह रिपोर्ट कहती थी कि शायद अमेरिका जमात के साथ अपने रिश्ते को मजबूत करना चाहता है. यह भी इशारा किया गया था कि अमेरिका जमात को दोस्त मान सकता है.

    बाद में इस रिपोर्ट को लेकर बहस शुरू हो गई. कुछ लोगों ने कहा कि अमेरिका सीधे जमात को सपोर्ट कर रहा है. यह बात जल्दी ही आग की तरह फैल गई. सोशल मीडिया पर कई पोस्ट वायरल हुईं. लोगों ने इसी को आधार बनाकर कह दिया कि जमात अब अमेरिकी पार्टी बन चुकी है.

    जमात-ए-इस्लामी की तरफ से इसका जवाब भी आया. पार्टी के लोग कहते हैं कि किसी भी विदेशी देश से उनकी कोई सीधी दोस्ती या गठजोड़ नहीं है. उन्होंने कहा कि एक अखबार की रिपोर्ट से यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं. उनका कहना है कि उनके पास किसी भी तरह का आधिकारिक अमेरिकी समर्थन नहीं है.

    क्या हुआ था कि कुछ बयानों में यह भी सुनने को मिला कि अमेरिका और जमात के नेता कुछ बातचीत कर रहे थे. जमात ने ब्रिटिश और अमेरिकी राजदूतों से मुलाकात की. मुलाकात के दौरान राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर बातें हुईं. इन बैठकों को कुछ लोगों ने बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया. इससे और अफवाहें पनपीं.

    BNP का भारत से गुप्त समझौता

    दूसरी तरफ BNP पर यह आरोप उभरने लगे कि वह प्रो-इंडिया पार्ट‍ी है. इसका आधार क्या है? इसके पीछे की कहानी थोड़ी अलग है. चुनाव शुरू होने से पहले कुछ नेताओं और सोशल मीडिया अकाउंट्स ने यह दावा किया कि BNP भारत के साथ किसी गुप्त समझौते के जरिये सत्ता में आना चाहती है. ऐसा कहा गया कि BNP के बड़े नेताओं ने भारत के प्रतिनिधियों से प्राइवेट बैठक की है.

    इन आरोपों को फैलाने वाले लोग यह भी कहते हैं कि BNP का नेतृत्व भारत के दबाव में काम कर रहा है. यह बात सोशल मीडिया पोस्ट, वीडियो और कुछ भाषणों में सुनी गई. लोग इसे बार-बार दोहरा रहे हैं. धीरे-धीरे यह धारणा बन गई कि BNP प्रो-इंडिया है.

    BNP ने एक आधिकारिक बयान में इन बातों को गलत बताया. पार्टी ने कहा कि भारत के साथ कोई शर्तों वाला समझौता नहीं हुआ है. कोई गुप्त डील नहीं है. BNP की नीति के बारे में पार्टी नेता बार-बार कहते रहे कि बांग्लादेश पहले है. उन्होंने यह साफ कहा कि वह किसी भी देश का एजेंडा नहीं अपनाएंगे.

    BNP का अध्यक्ष तारिक रहमान कई सभाओं में यही कहते दिखे कि राजनीति विदेशों के बारे में नहीं है. उनका कहना है कि देश की जनता ही तय करेगी कि कौन किसे चुनता है. वह कहते हैं कि दिल्ली या पिंडी या कोई और देश चर्चा का विषय नहीं होना चाहिए.

    लेकिन इन आरोपों का असर चुनावी राजनीति में दिख रहा है. दोनों पक्ष अपने विरोधियों को कमजोर दिखाने की कोशिश कर रहे हैं. किसी पार्टी को विदेशी समर्थक बताना आसान होता है. इससे विरोधी वोटरों को डराया जा सकता है. यह तरीका पुराना है. राजनीति में अक्सर विपक्ष को विदेशी ताकतों से जोड़कर देखा जाता है.

    वे लोग जो यह आरोप लगा रहे हैं, वे यह भी कहते हैं कि चुनाव संचालन में विदेशी तत्वों की मौजूदगी महसूस की जा रही है. वे दावा करते हैं कि वीडियो, इमेज और सोशल मीडिया सामग्री इस काम में मदद कर रहे हैं. कई बार ऐसी चीजें फैलती हैं जो असली नहीं होतीं. इनसे धारणा जल्दी बन जाती है.

    भारत-अमेरिका का है बांग्लादेश से पुराना याराना

    बांग्लादेश मीडिया प्रोथोम आलो के लिए पत्रकार मनोज डे लिखते हैं कि भारत और अमेरिका दोनों की बांग्लादेश में दिलचस्पी है. यह कोई गोपनीय बात नहीं. दोनों देश देख रहे हैं कि बांग्लादेश की राजनीति किस दिशा में जाए. लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि अब किसी पार्टी ने उनके एजेंडे को अपनाया है. कूटनीतिक संबंध और राजनीतिक गठबंधन में फर्क होता है.

    असल में यह चुनाव नैरेटिव की लड़ाई बन गया है. पार्टियां मुद्दों की बजाय नैरेटिव पर जोर दे रही हैं. कौन सा नेता किस देश के साथ है, यह चर्चा से हटकर एक बड़ा विषय बन गया है. लेकिन सवाल यह है कि क्या इन आरोपों के पीछे सच्चाई है या सिर्फ प्रचार का हिस्सा? इसका जवाब अभी साफ नहीं है.

    अंत में यह भी याद रखना होगा कि इन आरोपों को साबित करने वाला कोई ठोस सार्वजनिक सबूत सामने नहीं आया है. जमात के मामले में अमेरिकी समर्थन की कोई ऑफ़िशियल घोषणा नहीं हुई. BNP के प्रो-इंडिया होने का कोई लिखित समझौता नहीं दिखा. हर तरफ बातें हैं, दस्तावेज कम हैं.

    बांग्लादेश के चुनाव में जब वोट पड़ेगा, तब पता चलेगा कि जनता इन आवाजों को किस नजर से देखती है. तब यह साफ होगा कि लोग विदेशी आरोपों के आधार पर फैसला करते हैं या देश के अपने मुद्दों को अहमियत देते हैं.

     

  • नोबेल विजेता नरगिस मोहम्मदी को नई सजा, ईरान में 44 साल की जेल की सजा का सामना

    नोबेल विजेता नरगिस मोहम्मदी को नई सजा, ईरान में 44 साल की जेल की सजा का सामना

    तेहरान 

    ईरान में महिलाओं के हक के लिए आवाज उठाने वाली नोबेल शांति पुरस्कार विजेता नरगिस मोहम्मदी की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं. ईरानी कोर्ट ने उन्हें एक बार फिर दो अलग-अलग मामलों में कुल साढ़े सात साल की नई जेल की सजा सुनाई है.
    वकील ने सोशल मीडिया पर दी जानकारी 

    नरगिस के वकील मुस्तफा नीली ने सोशल मीडिया पर बताया कि मशहद शहर की एक अदालत ने उन्हें दो बड़े आरोपों में सजा दी है. पहली सजा 6 साल की है, जो ‘गुटबाजी और साजिश’ के लिए दी गई है. दूसरी सजा डेढ़ साल की है, जो ‘सरकार के खिलाफ प्रचार’ करने के लिए मिली है. इसके अलावा, उन पर 2 साल का ट्रैवल बैन (विदेश जाने पर रोक) लगाया गया है और उन्हें देश के ही एक दूरदराज इलाके ‘खुस्फ’ में 2 साल के निर्वासन (Exile) की सजा भी दी गई है.
    क्यों हुई ताजा गिरफ्तारी?

    नरगिस (53 साल) को दिसंबर में तब गिरफ्तार किया गया था, जब वे वकील खुसरो अलीकोर्दी की शोक सभा में शामिल होने गई थीं. अलीकोर्दी अपने दफ्तर में मृत पाए गए थे. ईरानी अधिकारियों के मुताबिक, नरगिस ने वहां ‘भड़काऊ बातें’ की थीं. नरगिस के परिवार ने आरोप लगाया है कि गिरफ्तारी के दौरान उनके साथ मारपीट की गई, जिसकी वजह से उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था.
    कोर्ट को बताया ‘दिखावा’, शुरू की भूख हड़ताल

    नरगिस का समर्थन करने वाले ‘नरगिस फाउंडेशन’ ने शनिवार को हुई कोर्ट की इस सुनवाई को ‘दिखावा’ करार दिया है. फाउंडेशन के मुताबिक, अपनी अवैध गिरफ्तारी और जेल की खराब स्थिति के विरोध में नरगिस ने 2 फरवरी से भूख हड़ताल शुरू कर दी थी. उनकी सेहत इतनी बिगड़ गई थी कि उन्हें जेल से अस्पताल ले जाना पड़ा, लेकिन फिर वापस जेल भेज दिया गया.
    परिवार का दर्द- यह फैसला क्रूर है

    नरगिस के पति तघी रहमानी ने बीबीसी को बताया कि यह सजा बेहद नाइंसाफी भरी और क्रूर है. उन्होंने कहा कि नरगिस ने कोर्ट में अपना बचाव करने से भी इनकार कर दिया क्योंकि वे इस न्याय व्यवस्था को सही नहीं मानतीं. उन्होंने न तो कोर्ट में एक शब्द बोला और न ही किसी कागज पर साइन किए. वहीं, पेरिस में रह रही उनकी बेटी कियाना भी अपनी मां की गिरती सेहत को लेकर काफी डरी हुई हैं.
    10 साल से जेल में, बच्चों से भी नहीं मिल पाईं

    नरगिस मोहम्मदी पिछले एक दशक का ज्यादातर समय जेल की सलाखों के पीछे ही गुजार चुकी हैं.

    कुल सजा: फाउंडेशन के अनुसार, ताजा फैसले के बाद उनकी कुल सजा अब 44 साल की हो गई है.

    दूरी का गम: नरगिस साल 2015 से अपने जुड़वां बच्चों से नहीं मिल पाई हैं, जो पेरिस में रहते हैं.

    बीमारी में भी राहत नहीं: दिसंबर 2024 में उन्हें ट्यूमर के ऑपरेशन के लिए 3 हफ्ते की पैरोल मिली थी, लेकिन ठीक होते ही उन्हें फिर जेल भेज दिया गया.
    कौन हैं नरगिस मोहम्मदी और क्यों मिला नोबेल?

    नरगिस को साल 2023 में नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया था. उन्हें यह सम्मान ईरान में महिलाओं के दमन के खिलाफ लड़ने, मानवाधिकारों की रक्षा और फांसी की सजा (Capital Punishment) के खिलाफ आवाज उठाने के लिए मिला था. जब उन्हें यह अवॉर्ड मिला, तब भी वे जेल में ही थीं और उनकी तरफ से उनके बच्चों ने यह पुरस्कार लिया था.
    एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट 

    एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार, ईरान दुनिया में चीन के बाद सबसे ज्यादा फांसी देने वाला देश है. नरगिस इसी सिस्टम के खिलाफ लड़ रही हैं, जिसके कारण उन पर बार-बार ‘देश की सुरक्षा को खतरा’ पहुंचाने के आरोप लगते रहे हैं. हालांकि, उनके वकील को अब भी उम्मीद है कि उनकी सेहत को देखते हुए उन्हें इलाज के लिए जमानत मिल सकती है और इस फैसले के खिलाफ अपील की जाएगी.

  • बांग्लादेश में चुनावी गर्मी, BNP और जमात में भिड़ंत, 40 लोग हुए घायल

    बांग्लादेश में चुनावी गर्मी, BNP और जमात में भिड़ंत, 40 लोग हुए घायल

    ढाका 

    बांग्लादेश में आम चुनाव से ठीक 72 घंटे पहले राजनीति एक बार फिर सड़क पर उतर आई. शनिवार देर रात बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और जमात-ए-इस्लामी के कार्यकर्ताओं के बीच हुई हिंसक झड़प में महिलाओं समेत 40 से ज्यादा लोग घायल हो गए. यह घटना ऐसे वक्त पर हुई है, जब 12 फरवरी को होने वाले मतदान से पहले चुनाव प्रचार सोमवार सुबह 7:30 बजे खत्म होने वाला है. प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, एक देर रात के कार्यक्रम में जमात पर पैसे बांटने का आरोप लगाते हुए BNP कार्यकर्ता विरोध दर्ज कराने पहुंचे. इसके बाद दोनों पक्षों ने समर्थक जुटाए और बात हाथापाई से लेकर पत्थरबाजी तक पहुंच गई. रातभर चले टकराव को मौजूदा चुनाव अभियान की सबसे गंभीर हिंसा बताया जा रहा है.
    बांग्लादेश का चुनावी माहौल तनावपूर्ण

    पिछले छह हफ्तों में अलग-अलग इलाकों में चुनावी हिंसा में कई लोग घायल हो चुके हैं. अगस्त 2024 में शेख हसीना के तख्तापलट के बाद यह पहला बड़ा चुनाव है. शेख हसीना की पार्टी को चुनाव से बाहर कर दिया गया है. इसी वजह से इसे 2009 के बाद का सबसे निर्णायक चुनाव माना जा रहा है.
    चुनाव में किसके-किसके बीच है टक्कर?

    12 फरवरी को होने वाले चुनाव में 12.7 करोड़ से अधिक मतदाता वोट डालने के पात्र हैं. मुकाबला मुख्य रूप से BNP और जमात-नेतृत्व वाले गठबंधन के बीच माना जा रहा है. BNP प्रमुख तारिक रहमान ने दावा किया है कि उनकी पार्टी 300 में से 292 सीटों पर चुनाव लड़कर सरकार बनाने लायक बहुमत हासिल करेगी. अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने चुनाव को ‘न्यू बांग्लादेश का उत्सव’ बताते हुए इसे स्वतंत्र, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण कराने का वादा किया है. हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि लगातार हिंसा से प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है, खासतौर पर तब, जब सत्ता समीकरण उलट चुके हैं और सड़क पर दबदबा शेख हसीना के विपक्षी दलों का दिख रहा है.
    बवाल का अर्थव्यवस्था पर असर

    चुनाव का नतीजा देश की अर्थव्यवस्था के लिए अहम है. हालिया अशांति से गारमेंट जैसे प्रमुख उद्योग प्रभावित हुए हैं और बांग्लादेश को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से मदद की जरूरत पड़ी है. विदेश नीति के मोर्चे पर भी दिशा बदलने के संकेत हैं. विश्लेषकों के मुताबिक, BNP को भारत के प्रति अपेक्षाकृत संतुलित माना जाता है, जबकि जमात की भूमिका पाकिस्तान की ओर झुकाव की अटकलें बढ़ाती है.