
करनाल
देश में चीनी उद्योग और गन्ना किसान इस समय दोहरी चुनौती से जूझ रहे हैं। वर्षों तक उत्तर भारत के खेतों में राज करने वाली गन्ने की वंडर किस्म सीओ-0238 में रेड रॉट (लाल सड़न) बीमारी के तेजी से फैलने से पैदावार और चीनी उत्पादन पर बुरा असर पड़ा है।
दूसरी ओर, गन्ने का रकबा घटने से चीनी मिलों के पेराई सत्र प्रभावित हो रहे हैं। इस बढ़ते संकट के बीच भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के करनाल, लखनऊ संस्थान और महाराष्ट्र के वसंतदादा शुगर इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने ऐसी 6 उन्नत प्रजातियां तैयार की हैं, जो देश के चीनी उद्योग को नई संजीवनी देने जा रही हैं।
शोध और विकास के किस मुहाने पर खड़ी हैं नई प्रजातियां?
1.गन्ना प्रजनन अनुसंधान संस्थान करनाल l सीओ-16030: यह किस्म अंतिम रिलीज प्रक्रिया में है। चीनी मिलों में इसके शुद्ध बीज बढ़ाने का काम चल रहा है ताकि किसानों को जल्द व्यावसायिक रूप से उपलब्ध कराया जा सके। l
सीओ-17018: यह अगेती किस्म वर्तमान में अखिल भारतीय समन्वित गन्ना अनुसंधान परियोजना (एआइसीआरपी) के तहत एडवांस्ड वैराइटल ट्रायल के चरण में है। विज्ञानी इसके शर्करा प्रतिशत और रोग प्रतिरोधकता की गहन निगरानी कर रहे हैं।
2. भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान (आइआइएसआर) लखनऊ
सीओ-एलके14201: यह किस्म शोध का चरण सफलतापूर्वक पार कर भारत सरकार की केंद्रीय प्रजाति विमोचन समिति (सीवीआरसी) द्वारा नोटिफाइड हो चुकी है। वर्तमान में यह उत्तर प्रदेश व मध्य भारत में किसानों के खेतों तक पहुंच चुकी है।
सीओ-एलके 15201 : इस अगेती किस्म ने राष्ट्रीय परीक्षण पूरे कर लिए हैं। आइआइएसआर लखनऊ के फार्मों पर इसके शुद्ध बीजों का संवर्धन कर इसे राज्य स्तरीय मंजूरी के लिए प्रस्तुत किया गया है।
3. वसंतदादा शुगर इंस्टीट्यूट (वीएसआइ), पुणे महाराष्ट्र
वीएसआइ 434: महाराष्ट्र और प्रायद्वीपीय भारत के लिए यह उच्च-शर्करा किस्म आधिकारिक रूप से रिलीज हो चुकी है और चीनी मिलों के कमान क्षेत्रों में व्यापक रूप से बुआई शुरू कर दी गई है।
सीओ-एम12085: वीएसआइ के प्रयास से विकसित यह किस्म नोटिफाइड होकर महाराष्ट्र के किसानों के लिए उपलब्ध कराई जा रही है। यह विशेषकर पेड़ी फसल और जलभराव वाले क्षेत्रों के लिए वरदान साबित होगी।
देश में गिरते चीनी उत्पादन में संकटमोचन बनेंगी गन्ने की छह नई प्रजातियां
एसबीआइ करनाल से डॉ. रविंद्र ने बताया कि छह नई किस्मों को 14 प्रतिशत या इससे भी ऊपर रिकवरी रेट के साथ धरातल पर उतारने का प्रयास विज्ञानियों द्वारा किया जा रहा है। सीओ-16030, सीओएलके 14201 और वीएसआइ 434 जैसी अगेती किस्में 9 से 10 महीने में पककर तैयार हो जाती हैं। इनसे पेराई सत्र की शुरुआत में ही 14 प्रतिशत तक चीनी रिकवरी मिलेगी, कई क्षेत्रों में आंकड़ा इससे भी पार जा सकता है। खास बात ये भी है कि यह रेड राट से पूर्ण सुरक्षित है।
l आइसीएआर के एसबीआइ क्षेत्रीय केंद्र करनाल, आइआइएसआर लखनऊ और महाराष्ट्र के वसंतदादा शुगर इंस्टीट्यूट में तैयार की जा रही हैं यह अत्याधुनिक किस्में l सर्वाधिक 13 से 14 प्रतिशत रिकवरी देने वाली किस्म सीओ-15023 एकल किस्म पर निर्भरता जोखिम भरी, इसलिए छह नई प्रजातियां इस संकट का करेंगी स्थायी समाधान



