राजस्थानराज्य

श्वेतांबर-दिगंबर विवाद पर SC की सख्त टिप्पणी, पूछा- भगवान क्या इससे खुश होंगे?

जयपुर
 सुप्रीम कोर्ट ने प्रसिद्ध 'श्री महावीर जी जैन मंदिर' के प्रबंधन और संचालन को लेकर जैन धर्म के श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदायों के बीच चल रहे विवाद पर बुधवार को सुनवाई पूरी कर ली। फैसला बाद में सुनाया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों को धार्मिक भावनाओं से जुड़े इस मामले में संयम बरतने की सलाह देते हुए कहा, जिस भगवान के नाम पर दोनों पक्ष लड़ रहे हैं, क्या वह इस तरह कानूनी लड़ाई से खुश होंगे?

न्यायाधीश जेबी पारदीवाला और न्यायाधीश के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस मामले पर बुधवार को सुनवाई की। दोनों पक्षों को आठ दिन के भीतर लिखित बहस पेश करने के निर्देश दिए हैं। लोक न्यास अधिनियम, 1959 के तहत कार्यवाही से विवाद शुरू हुआ था। मंदिर प्रबंधन से दिगंबर समिति अध्यक्ष और सचिव को हटाने तथा श्वेतांबर संप्रदाय की नई प्रबंध समिति बनाने की मांग की गई।

विवाद करें समाप्त
सुनवाई के दौरान न्यायाधीश पारदीवाला ने दोनों पक्षों से कहा, यह बहुत ही संवेदनशील मामला है और किसी भी पक्ष की भावनाओं को ठेस पहुंचाए बिना विवाद को समाप्त करने की जरूरत है। उन्होंने दोनों पक्षों से पूछा कि क्या ऐसा संभव है कि सुबह श्वेतांबर संप्रदाय अपनी परंपरा के अनुसार भगवान की पूजा करे और शाम को दिगंबर संप्रदाय भगवान के वस्त्र बदलकर अपनी पद्धति से पूजा करे। आप अनावश्यक मुकदमेबाजी कर भगवान को क्यों परेशान कर रहे हैं? क्या आपको लगता है भगवान इस सबसे खुश होंगे?

बताते चलें कि साल 1970 में एसडीएम ने दिगंबर समिति के खिलाफ प्रार्थना पत्र मंजूर किया। दिगंबर समिति की ओर से पूजा स्थल अधिनियम, 1991 के तहत पेश प्रार्थना पत्र के आधार पर अक्टूबर 1994 में ट्रायल कोर्ट ने रोक लगा दी। हाईकोर्ट में अपील दायर की गई, जिसका दिगंबर समिति ने विरोध किया कि 1991 के अधिनियम के तहत कार्यवाही समाप्त हो चुकी थी।

क्या है दोनों पक्षों की दलीलें?
वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान का तर्कः इस मामले में पूजास्थल परिवर्तन की कोई मांग नहीं की गई है, इसलिए पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 इस मामले में लागू नहीं होता है। उन्होंने कहा कि यह मामला केवल संपूर्ण जैन समुदाय के हित में मंदिर के प्रबंधन से जुड़ा है।

दिगंबर समिति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर्यमा सुंदरम का तर्क
हाईकोर्ट को अपील पर सुनवाई नहीं करनी चाहिए थी, क्योंकि 1991 के कानून के तहत कार्यवाही समाप्त कर दी गई और उसमें अपील का प्रावधान नहीं है। ऐसे में हाईकोर्ट में याचिका दायर होनी चाहिए थी। तथ्य यह है कि मूर्ति (देवता), मंदिर और उससे जुड़ी संपत्तियों का नियंत्रण, कब्जा और प्रबंधन दिगंबर जैन संप्रदाय के पास ही रहा है।

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